Chapter 9 of 20
नए जीवन का आगमन और मुकम्मल संसार
353 words
देखते ही देखते नौ महीनों का वह लंबा, नाजुक सफर अपने अंतिम पड़ाव पर आ पहुँचा। वह रात मुंबई की आम रातों जैसी नहीं थी; आसमान में काले बादलों का डेरा था। पेंटहाउस के भीतर का सन्नाटा अचानक माँ की धीमी कराह और लेबर पेन के दर्द से टूट गया।
अस्पताल के लेबर रूम के बाहर का गलियारा बेहद ठंडा और खामोश था। ५० वर्ष की उम्र में इस प्रसव वेदना को झेलना माँ के लिए उनके वजूद की सबसे बड़ी लड़ाई थी। तभी, भोर की पहली उजली किरण के साथ, लेबर रूम का भारी दरवाजा खुला और डॉक्टर ने आकर कहा, "बधाई हो, एक स्वस्थ बेटे का जन्म हुआ है। और आपकी पत्नी भी पूरी तरह सुरक्षित हैं।"
जब मैं कमरे के भीतर दाखिल हुआ, तो सफेद चादरों के बीच थकी हुई, पीली पड़ी लेकिन बेहद शांत माँ लेटी हुई थीं। उनकी मांग का सिंदूर पसीने की बूंदों के बीच भी साफ चमक रहा था। उनके सीने से लिपटा हुआ एक छोटा सा, मखमली जीवन हल्की-हल्की सांसें ले रहा था।
मैंने बिना कुछ बोले झुककर माँ के माथे को चूमा। उनकी आँखों से आंसू की एक बूंद छलक कर सीधे उस बच्चे के गाल पर गिरी। "देखो... यह तुम्हारा सच है," माँ ने बेहद कमजोर, लड़खड़ाती लेकिन ममता से भरी आवाज में फुसफुसाया।
मैंने उस छोटे से जीव को बेहद हौले से अपनी गोद में उठाया। उसकी नन्हीं धड़कनें सीधे मेरे दिल की धड़कनों से जा मिलीं। इस बच्चे के रूप में हमारे अकेलेपन का अंत हो चुका था।
"आज से हमारी यह दुनिया सिर्फ मुकम्मल नहीं हुई है," मैंने बच्चे को वापस माँ की बाहों के सुरक्षित घेरे में लिटाया और उनके हाथों को चूमते हुए कहा, "बल्कि इसे एक नया इतिहास मिल गया है। अब कोई भी ताकत हमसे हमारा यह सच नहीं छीन सकता।"
खिड़की के पार सुबह का सूरज पूरी भव्यता के साथ उग रहा था, जिसकी सुनहरी किरणें उस नन्हें जीवन पर पड़ रही थीं। दो अकेले किनारों ने मिलकर आखिरकार एक ऐसे समंदर का निर्माण कर लिया था, जिसकी कोई सीमा नहीं थी। हमारी गृहस्थी का यह नया सूरज अब हमेशा के लिए उग चुका था।