Chapter 8 of 20

हिफाज़त का दायरा

255 words

५० की इस उम्र में दोबारा माँ बनना शारीरिक रूप से एक बेहद नाजुक सफर था। डॉक्टर ने साफ तौर पर कहा था कि अगले कुछ महीने बहुत सावधानी, मानसिक शांति और पूरी देखभाल के हकदार हैं। अब मेरी दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी थी। सुबह की पहली किरण के साथ जब मेरी आँखें खुलतीं, तो मेरा पहला हाथ उनके पेट पर जाता, जहाँ जीवन धीरे-धीरे धड़क रहा था। "तुम अब ऑफिस के काम से ज्यादा घर के चक्कर काटने लगे हो," एक दोपहर जब मैं लंच के समय अचानक घर पहुँचा, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उनके चेहरे पर अब गर्भावस्था की शुरुआती चमक साफ दिखाई देने लगी थी। "जब तक मेरा पूरा संसार इस घर के भीतर है, मेरा मन बाहर कैसे लगेगा?" मैंने उन्हें सोफे पर बिठाते हुए कहा। मैंने सेब के टुकड़े एक प्लेट में सजाए और अपने हाथों से उन्हें खिलाना शुरू किया। उनके हाव-भाव में अब एक अद्भुत ठहराव था। "कभी-कभी मुझे डर लगता है कि जब हम इस बच्चे को लेकर बाहर निकलेंगे, तो दुनिया की नजरें... समाज के सवाल हमारे इस फैसले को कैसे देखेंगे?" उन्होंने मेरे कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए पूछा। मैंने उनके हाथ को अपने हाथों में भींचा और मजबूत लहजे में कहा, "समाज की नजरें कभी किसी का पेट नहीं भरतीं। यह बच्चा हमारा सच है, हमारा आने वाला कल है। बाहर की दुनिया में चाहे जो भी हलचल हो, इस घर के भीतर हमारी मोहब्बत और हमारी हिफाज़त का दायरा इतना मजबूत है कि कोई भी सवाल इसे छू नहीं पाएगा।

End of Chapter 8

Chapter 8: हिफाज़त का दायरा - Do Kinaron ka Milan | Novel AI Studio