Chapter 10 of 20

अतीत की दस्तक और नीरू का आगमन

587 words

बच्चे के जन्म के बाद पेंटहाउस की दुनिया में एक ठहराव और गहरा सुकून आ चुका था। लेकिन नियति ने हमारे इस नए और अपरंपरागत संसार के लिए एक और परीक्षा तय कर रखी थी। एक दोपहर, जब मैं ऑफिस के काम में व्यस्त था, मेरे फोन की स्क्रीन पर एक ऐसा नाम चमका जिसे मैंने बरसों से पीछे छोड़ दिया था—'नीरू'। नीरू, मेरी २४ साल की सगी छोटी बहन। जब मैं सालों पहले पहाड़ों और परिवार के बिखराव को पीछे छोड़कर मुंबई भाग आया था, तब नीरू बहुत छोटी थी। बाद में वह दिल्ली चली गई और अपनी पढ़ाई पूरी करके एक स्वतंत्र कॉर्पोरेट लाइफ जीने लगी। हमारे बीच बातचीत लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन आज अचानक उसका फोन आना किसी अनहोनी का संकेत था। मैंने फोन उठाया, तो दूसरी तरफ से उसकी सिसकियों की आवाज़ आई। "भाई... मैं मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर हूँ। मेरा सब कुछ खत्म हो गया..." नीरू की आवाज़ में गहरा बिखराव और खौफ था। मैं बिना एक पल गंवाए उसे लेने स्टेशन पहुँचा। नीरू एक बेंच पर अपना बैग पकड़े बैठी थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, चेहरे पर दिल्ली की उस तथाकथित आधुनिक दुनिया का दिया हुआ धोखा और टूटन साफ दिख रही थी। वह जिस लड़के से प्यार करती थी, उसने उसे एक बड़े धोखे और कर्ज के जाल में फंसाकर बीच राह छोड़ दिया था। मुंबई में उसका मेरे अलावा कोई नहीं था। जब मैं उसे लेकर पेंटहाउस पहुँचा, तो वह यहाँ की विलासिता देखकर हैरान रह गई। लेकिन असली तूफ़ान तब आया जब लिविंग रूम में उसकी मुलाक़ात माँ से हुई। माँ की मांग में गहरा लाल सिंदूर, उनकी गोद में एक नवजात बच्चा और उनके चेहरे पर एक शादीशुदा औरत का गौरव देखकर नीरू के पैरों तले से जमीन खिसक गई। "यह... यह सब क्या है, भाई?" नीरू ने फटी आँखों से पहले माँ को देखा और फिर मेरी तरफ मुड़ी। "माँ की मांग में सिंदूर? और यह बच्चा? तुम दोनों... तुम दोनों ने यह क्या घिनौना मजाक बना रखा है?" माँ ने संकोच और डर से बच्चे को अपने सीने से और कस लिया। उनकी आँखों में पुरानी हिचकिचाहट और समाज का खौफ एक बार फिर लौट आया। वह बिना कुछ बोले अपनी नजरें झुकाकर बेडरूम की तरफ बढ़ने लगीं। "रुको, नीरू!" मैंने कड़े और ऊंचे स्वर में कहा। "इस घर में पैर रखने से पहले तुम्हें यहाँ के नियमों को समझना होगा। यह कोई मज़ाक नहीं है। यह मेरी पत्नी हैं, और यह मेरा बेटा है। आज से तुम इसी हकीकत के साथ इस घर में रहोगी।" "पत्नी? तुम पागल हो गए हो क्या?" नीरू चिल्लाई, उसकी आवाज़ में दिल्ली की आधुनिकता और समाज की बंदिशों का वही पुराना मिश्रण था। "यह तुम्हारी माँ हैं! समाज थूकेगा तुम पर! तुम दोनों ने सारे पवित्र रिश्तों का कत्ल कर दिया है। मैं इस पाप के घर में एक पल भी नहीं रह सकती!" "तो जा सकती हो," मैंने बहुत शांत लेकिन बर्फ जैसी ठंडी आवाज़ में कहा। "जब तुम दिल्ली में अकेली टूट रही थीं, जब उस समाज ने तुम्हें नोचकर फेंक दिया, तब कोई मर्यादा काम नहीं आई। आज तुम्हें सिर छुपाने के लिए मेरा यह 'पाप का घर' चाहिए, लेकिन यहाँ के सुकून से तुम्हें दिक्कत है? जाना है तो जा सकती हो, लेकिन अगर रहना है... तो मर्यादा की परिभाषा मैं तय करूँगा, यह समाज नहीं।" मेरी इस कठोरता और सीधे प्रहार ने नीरू को भीतर तक हिला दिया। उसके पास बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था। वह रोती हुई हॉल के कोने वाले सोफे पर बैठ गई।

End of Chapter 10

Chapter 10: अतीत की दस्तक और नीरू का आगमन - Do Kinaron ka Milan | Novel AI Studio