Chapter 6 of 20
गृहस्थी का पहला कदम और नया संसार
256 words
उसी भावुक सुबह के बाद, मांग में सजे लाल सिंदूर और एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास ने माँ के भीतर के सारे संकोच को हमेशा के लिए एक शांत गौरव में बदल दिया था। वह धीरे से बिस्तर से उठीं और अपनी उस गुलाबी सिल्क साड़ी को पूरी शालीनता और सलीके से अपने बदन पर लपेट लिया। अब वह इस आलीशान घर की सिर्फ एक मेहमान नहीं, बल्कि इसकी मालकिन और धड़कन बन चुकी थीं।
"अब मुझे रसोई में जाने दो," उन्होंने शीशे के सामने खड़े होकर, अपने बिखरे बालों को एक गरिमापूर्ण जूड़े में बांधते हुए मुस्कुराकर कहा। उनकी आवाज़ में अब एक पत्नी का सहज अधिकार था।
मैंने पीछे से जाकर उन्हें अपनी बाहों के घेरे में लिया और शीशे में हमारी जोड़ी को देखा—एक २८ साल का युवा और ५० वर्ष की वह परिपक्व, सौम्य महिला, जिन्होंने दुनिया की परवाह किए बिना मेरे अकेलेपन को अपना लिया था।
"मुंबई की इस रसोई में तुम्हें गाँव की तरह परेशान होने की जरूरत नहीं है, यहाँ सब आधुनिक मशीनें हैं," मैंने उनके कानों के पास हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।
"मशीनें जो भी करें, पर तुम्हारे लिए चाय तो मैं अपने हाथों से ही बनाऊँगी। पहाड़ों की चाय का स्वाद इन मशीनों में कहाँ," उन्होंने मुड़कर मेरे सीने पर अपना हाथ रखते हुए बड़े प्यार से कहा।
जब वह रसोई की तरफ बढ़ीं, तो उनके पाजेब की हल्की छनक पूरे पेंटहाउस के सन्नाटे को दूर कर रही थी। मुंबई के इस आलीशान अपार्टमेंट को आज पहली बार एक 'घर' होने का अहसास मिल रहा था।