मुंबई की सुबह खिड़की के पार एक नए रंग में रंगी थी। जब भोर की पहली उजली किरण कांच को चीरकर सीधे उस छोटे से सिंगल बेड पर पड़ी, तो माँ की पलकें धीरे से खुलीं।
उजाले की उस साफ रोशनी में माँ ने जैसे ही खुद को मेरी बाहों के घेरे में पाया, उनके चेहरे पर पारंपरिक संकोच की एक गहरी सुर्खी दौड़ गई। उन्होंने अपनी नजरें तुरंत झुका लीं और बिस्तर पर बिखरी सफेद सूती चादर को समेटकर खुद को ढकने की कोशिश करने लगीं। ५० वर्ष की उम्र में जीवनभर संजोया गया उनका पारंपरिक संकोच इस उजली सुबह में दोबारा जाग उठा था।
"सुनो..." मैंने बेहद धीमी और भारी आवाज में पुकारा और उनकी ठुड्डी को उंगलियों के पोरों से थामकर उनका चेहरा ऊपर उठाया। "इस ऊंचाई पर हमारे अलावा और कोई नहीं है। और अब कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं है।"
मैंने बिना किसी जल्दबाजी के, अपनी उंगलियों को उनके कंधों और बाहों की मखमली त्वचा पर धीरे-धीरे फिराना शुरू किया। जब सुबह की उस साफ और उजली रोशनी में हमारे जिस्म दोबारा एक-दूसरे में विलीन हुए, तो वह रात की मदहोशी से बिल्कुल अलग था। यह बेहद धीमा, गहरा और एक-दूसरे के वजूद को पूरी तरह आत्मसात करने का अहसास था।
काफी देर बाद, जब दोनों की सांसें सामान्य हुईं, तो मैंने side table पर रखी सिंदूर की छोटी सी डिब्बी उठाई। मैंने अपनी उंगली में थोड़ा सा लाल सिंदूर लिया और उनकी मांग के ठीक बीचों-बीच, उसे सलीके से भर दिया।
सिंदूर की वह लाल रेखा सुबह की धूप में चमक उठी। माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थामकर कहा, "अब मैं कभी पहाड़ों की उस तन्हाई में वापस नहीं जा पाऊंगी..."
"तुम्हें जाना भी नहीं है," मैंने उनके हाथों को चूमते हुए कहा। "अब से तुम्हारा हर सफर, हर सुबह और हर रात इसी घर से शुरू होगी। तुम मेरी पत्नी हो।"