Chapter 4 of 20
संवाद, संशय और समर्पण की वह रात
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रात का वो आखिरी पहर था जब मुंबई की रफ्तार पूरी तरह थम चुकी थी। गगनचुंबी पेंटहाउस की विशाल कांच की खिड़की के पार बाहर का आसमान गहरा स्याह था, जिस पर शहर की बत्तियां किसी धुंधले ख्वाब जैसी तैर रही थीं। कमरे के भीतर, side table पर जल रहा मद्धम पीली रोशनी का वॉर्म लैंप पूरे माहौल में एक मखमली सिहरन बिखेर रहा था। हवा में हल्की ठंडक थी, जिसने कमरे के सन्नाटे को और गहरा कर दिया था।
उस छोटे से सिंगल बेड पर हम दोनों इतने करीब बैठे थे कि सांसों की आवाजाही एक-दूसरे की त्वचा को सहला रही थी। माँ मेरी छाती से पूरी तरह टिककर बैठी हुई थीं। उनकी महीन, नाजुक उंगलियां मेरी शर्ट के ऊपर के खुले हुए कॉलर्स को बेहद हौले से सहला रही थीं, जैसे वो यकीन करना चाह रही हों कि मैं सच में वहीं उनके पास हूं, कोई छलावा नहीं। लेकिन जैसे ही मेरे पोरों ने उनके खुले हुए, हल्के घुंघराले बालों को समेटकर उनके गोरे कंधे के पीछे किया और उनकी गर्दन का ढलान लैंप की रोशनी में चमक उठा, वह अचानक बुरी तरह चौंक गईं।
जैसे कोई करंट लगा हो, माँ ने तुरंत अपनी उंगलियां मेरी शर्ट से खींच लीं और बिस्तर के बिल्कुल आखिरी कगार पर खिसक गईं। उन्होंने अपने दोनों हाथों से साड़ी के पल्लू को छाती पर कस लिया।
"तुम कांप रही हो..." मैंने अपने चेहरे को उनके चेहरे के करीब लाते हुए, अपनी गर्म सांसें उनके गालों पर छोड़ते हुए फुसफुसाया।
"नहीं... दूर हट!" माँ की आवाज़ में इस बार एक तीव्र छटपटाहट और घबराहट थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और उनका पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था। "यह... यह क्या अनर्थ है? तू भूल रहा है कि मैं कौन हूँ? होश में आ! मैं तेरी माँ हूँ... और तू मेरा बेटा है! इस पवित्र रिश्ते की दुहाई देती हूँ तुझे, इस मर्यादा को पैरों तले मत रौंद!"
"मर्यादा?" मैंने उनके कांपते हुए घुटनों के पास बैठते हुए उनके हाथ को थामने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"हाँ, मर्यादा!" माँ की आँखों से आँसू बहने लगे, उनकी आवाज़ में चीख और बेबसी दोनों घुल चुकी थीं। "तू मुझे पहाड़ों के उस नरक से यहाँ यह पाप करने के लिए लाया था? अगर समाज को इस बात की भनक भी लगी, तो धरती फट जाएगी। लोग कहेंगे कि एक माँ ने अपने ही बेटे के साथ... नहीं! मैं यह कलंक लेकर नहीं जी पाऊंगी। अगर तुझमें ज़रा सा भी बेटे का फर्ज बाकी है, तो अपने कदम पीछे हटा ले। मुझे इसी वक्त वापस अल्मोड़ा छोड़ आ, मैं भूखी-प्यासी उसी टूटते घर में मर जाऊँगी, पर इस लोक-लाज और धर्म को नहीं छोड़ सकती।"
उनकी इस दुहाई ने कमरे के सन्नाटे को और गहरा कर दिया। उनकी आँखों में मेरे लिए ममता भी थी, और उस ममता के खो जाने का एक भयंकर खौफ भी।
मैंने बहुत शांति से, बिना किसी जल्दबाजी के, उनके दोनों पैरों के पास घुटनों के बल बैठकर अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। "माँ... आप जिस रिश्ते की दुहाई दे रही हैं, क्या उसने कभी हमारी रूह के इस सूनेपन को भरा? जब मैं बचपन में अपनों के स्पर्श के लिए तरसता था, तब कहाँ थी यह दुनिया? और जब बाबूजी शांत हुए, तब किस समाज ने आकर आपकी जवानी के उन घुटते हुए ख्वाबों को सहारा दिया?"
मैंने धीरे से अपना सिर उठाया और सीधे उनकी रोती हुई आँखों में देखा। "मैं किसी रिश्ते को रौंद नहीं रहा हूँ। मैं तो उस झूठे मुखौटे को उतार रहा हूँ जिसे ओढ़कर हम दोनों बरसों से अकेलेपन में मर रहे थे। क्या एक पुरुष और एक स्त्री का एक-दूसरे की रूह को मुकम्मल करना पाप है? इस बिस्तर के बाहर का समाज सिर्फ नाम देना जानता है, दर्द बांटना नहीं।"
"पर यह समाज जीने नहीं देगा..." माँ ने सिसकते हुए अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लिया। "तू २८ साल का युवा है, तेरी रगों में गर्म खून है। मैं ५0 की ढलती उम्र पर खड़ी औरत हूँ। कल को लोग तुझ पर थूकेंगे... मुझे कुलटा कहेंगे। मैं इस उम्र में अपनी ममता और तेरी साख का सौदा कैसे कर दूँ?"
मैंने आगे बढ़कर, बेहद सलीके और हौले से उनकी हथेलियों को उनके चेहरे से हटाया। इस बार मेरे हाथों की पकड़ में एक ठोस भरोसा था, जिसने उन्हें पीछे हटने नहीं दिया।
"उम्र सिर्फ सालों की गिनती है, माँ। आपकी आँखों का यह सूनापन और मेरे भीतर का यह खालीपन, दोनों एक ही उम्र के हैं। मैं आपकी साख का सौदा नहीं कर रहा, मैं आपको एक ऐसा अधिकार दे रहा हूँ जो इस दुनिया में आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया। मुझे बाहर के किसी नाम की परवाह नहीं है। मेरे होने का इकलौता सच बस आप हैं। क्या आप इस दुनिया के खोखले नियमों के लिए मुझे फिर से उसी अंधी भागदौड़ और तन्हाई के कुएँ में ढकेल देंगी?"
मेरी आवाज़ में छिपे उस गहरे दर्द और अडिग ज़िद ने माँ के भीतर की आखिरी दीवार को हिलाकर रख दिया। वह चुपचाप, फटी आँखों से मेरी तरफ देखती रहीं, जैसे मेरे भीतर के उस अकेले लड़के को पढ़ रही हों जो बरसों से सिर्फ उनका होना चाहता था। उनके चेहरे का वह पारंपरिक संकोच, वह माँ-बेटे के रिश्ते की दुहाई, और समाज का वह खौफ... सब कुछ मेरे इस निश्छल समर्पण के आगे धीरे-धीरे पिघलने लगा।
"तू... तू सचमुच नहीं मानेगा?" माँ ने हांफते हुए, एक बेहद कमजोर और आत्मसमर्पण के भाव से पूछा। उनकी आँखों की नमी में अब डर की जगह एक अजीब सा अधिकार और प्रेम तैरने लगा था।
"तभी मानूँगा, जब आप अपने इस प्रेमी को स्वीकार करेंगी," मैंने उनके चेहरे के बिल्कुल करीब जाकर फुसफुसाया।
माँ ने एक लंबी, कांपती हुई सांस ली। उन्होंने खुद आगे बढ़कर, अपनी कांपती हथेलियों से मेरे चेहरे को अपने हाथों के प्याले में भर लिया।
"नहीं... अब मैं तुझे और खुद को उस सन्नाटे में नहीं जाने दूँगी," माँ की आवाज़ में अब एक औरत का मुकम्मल अधिकार था।
मैंने धीरे से अपना चेहरा और आगे बढ़ाया। हमारी सांसें आपस में उलझ गईं और मैंने झुककर उनके होठों पर अपने होठ रख दिए। वो चुंबन धीमा, गहरा और प्यासा था—उसमें वासना से ज्यादा एक-दूसरे को अपने भीतर सोख लेने की और पुराने सारे दुखों को हमेशा के लिए मिटा देने की तड़प थी। माँ के होंठ पहले तो थरथराए, पर अगले ही पल उन्होंने पुराने समाज के सारे बंधनों को पीछे छोड़ते हुए पूरी शिद्दत से मेरे चुंबन का जवाब दिया।
मैंने धीरे से उनकी उस चमकीली, गुलाबी सिल्क साड़ी के सुनहरे गोटे वाले पल्लू को उनके दाहिने कंधे से नीचे सरका दिया। लैंप की उस सुनहरी रोशनी में ५० की उम्र को छूता उनका परिपक्व बदन किसी ढलती हुई दोपहर की शांत धूप जैसा अलौकिक और जादुई लग रहा था।
जब मेरा बदन धीरे से उनके ऊपर आया, तो उस सिंगल बेड की वो सीमित जगह भी हमारे लिए एक असीम ब्रह्मांड जैसी फैल गई। माँ ने अपने दोनों हाथों से मेरी पीठ को कसकर थाम लिया और अपनी उंगलियां मेरी त्वचा में गड़ा दीं। सालों का संचित दर्द, अधूरी ख्वाहिशें और समाज की बनाई हुई तमाम बंदिशों के धागे—सब कुछ उस एक तीव्र, आत्मीय पल में पिघलकर बह गए।
उसी चरम क्षण में, मैंने माँ के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उनके होठों के करीब अपने होठ लाते हुए कहा, "मैं सिर्फ आज की रात के लिए तुम्हारे पास नहीं आया हूँ... मैं तुम्हारे साथ एक बिल्कुल नया परिवार शुरू करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे बच्चे की माँ बनो... क्या तुम मुझे यह हक दोगी?"
मेरी यह बात सुनते ही माँ की आँखें सजल हो गईं, जिनमें एक अजीब सी ममता और असीम प्रेम का सैलाब उमड़ पड़ा। ५० की इस उम्र में दोबारा माँ बनने की इस कल्पना ने उनके भीतर के स्त्रीत्व को पूरी तरह जगा दिया। उन्होंने अपनी कांपती लेकिन दृढ़ उंगलियों से हमारे बीच बची आखिरी दूरी को हमेशा के लिए हटा दिया।
मैंने उनके कान के पास अपनी भारी आवाज में कहा, "आज से समाज के सारे नियम, सारी बंदिशें पीछे छूट गईं... आज से तुम मेरी बीवी हो और मैं तुम्हारा पति हूँ..."
"कहो... अपने मुंह से कहो कि तुम मेरी हो," मैंने एक प्रेमी की जिद से कहा।
माँ ने हांफते हुए सीधे मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा, "आज से... आज से मैं तुम्हारी बीवी हूँ... और तुम मेरे पति हो..."
वह सिर्फ दो जिस्मों का मिलना नहीं था; वह हमारे आने वाले कल, एक नए जीवन और एक मुकम्मल परिवार की पवित्र बुनियाद थी। काफी देर बाद, जब वह तीव्र उफान धीरे-धीरे शांत हुआ, तो मैंने उन्हें अपनी दाहिनी बांह का तकिया बनाया और अपने सीने से सटाकर लेटा लिया। खिड़की के बाहर रात का गहरा अंधेरा अब धीरे-धीरे छंटने लगा था और भोर की पहली हल्की किरणें कांच को छू रही थीं, पर उस कमरे के भीतर हमारी अपनी एक अटूट और नई दुनिया चैन की नींद सो रही थी।