Chapter 3 of 20
संवाद के पुल और काठ का पिघलना
285 words
हफ़्तों का समय बीत गया। रोज़ रात को हम दोनों इसी तरह बैठते। धीरे-धीरे, रात की खामोशी में संवाद के पुल और गहरे होने लगे। मैं उन्हें शहर की इस अंधी भागदौड़, कॉर्पोरेट दुनिया के खोखलेपन और अपनी व्यस्तताओं के पीछे छिपा अकेलापन बताता।
"यहाँ लोग तो बहुत हैं," मैंने एक रात उनके घुटनों के पास बैठते हुए कहा, "पर कोई ऐसा नहीं है जिसके सामने मैं अपना मुखौटा उतार सकूं। सब एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं।"
माँ ने बड़े लाड़ से मेरे सिर पर हाथ रखा। इस बार उनके स्पर्श में हिचकिचाहट कम थी। "पहाड़ों में भी ऐसा ही होता है। जब तेरे बाबूजी शांत हुए, तो मुझे लगा दुनिया खत्म हो गई। लोग आते थे, पर सिर्फ यह देखने कि यह अकेली जान कब टूटती है। मैंने अपनी जवानी के सारे ख्वाब उन सूनी वादियों में दफन कर दिए। कभी किसी से अपनी बात कहने की फुर्सत ही नहीं मिली... और न ही कोई सुनने वाला था।"
"अब मैं हूँ," मैंने उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा। "आपके हर अधूरे ख्वाब को पूरा करने के लिए।"
"तू बहुत भोला है," वह मंद सा मुस्कुराईं, "पर तेरी इस ज़िद ने मेरे भीतर के काठ को पिघला दिया है। मुझे लगने लगा है कि शायद मेरी भी कोई अहमियत है।"
उस सिंगल बेड की सीमित दूरी में रहकर भी हमारी रूहें करीब आने लगीं। उम्र का फासला, समाज के बनाए नियम और हिचकिचाहट धीरे-धीरे उस अपनेपन की गरमाहट में पिघलने लगे। मुझे उनमें सिर्फ एक माँ का अक्स नहीं, बल्कि एक प्रेमिका, एक दोस्त और एक रूहानी साथी का रूप दिखने लगा था। एक ऐसा रिश्ता आकार ले रहा था जो पुराने सभी बंधनों को तोड़कर एक नए वजूद की मांग कर रहा था।