Chapter 2 of 20
संकोच की दीवारें और खामोश गुफ़्तगू
395 words
शुरुआत में माँ इस 'कांच के पिंजरे' जैसी आधुनिक दुनिया में बेहद असहज थीं। गांव की खुली, बेबाक हवा से आकर इस बंद आलीशान कमरे में रहना, और ऊपर से अपने बेटे के साथ एक ही सिंगल बेड साझा करना उनके पारंपरिक संकोच और लोक-लाज के डर को कचोटता था। वह रात भर बिस्तर के बिल्कुल आखिरी कोने में सिमटकर सोती थीं, इस डर से कि कहीं उनका कोई अंग मुझसे छू न जाए।
रातें गुजरती रहीं, पर वह दूरी कम नहीं हो रही थी। एक रात, जब घड़ी में दो बज रहे थे, मैंने देखा कि वह अब भी जाग रही थीं और उनकी पीठ मेरी तरफ थी। उनका शरीर बिस्तर के कगार पर इस तरह सिमटा था मानो ज़रा सी हलचल से वह नीचे गिर जाएंगी।
"माँ... आप सोई नहीं?" मैंने करवट बदलते हुए धीमी आवाज़ में पूछा।
वह चौंक गईं, अपने पल्लू को और कसते हुए बोलीं, "नहीं, बस... नींद आ जाएगी। तू सो जा, सुबह दफ्तर जाना है ना तुझे।"
"इस बिस्तर पर आप रोज़ ऐसे सोती हैं जैसे यहाँ कोई अजनबी बैठा हो। क्या आपको मुझसे डर लगता है?" मेरे स्वर में एक अजीब सी तड़प थी।
माँ ने धीरे से मुड़कर मेरी तरफ देखा, आँखों में पहाड़ों जैसा गहरा संशय था। "डर तुझसे नहीं है रे... डर इस रीति-रिवाज से है। लोग क्या कहेंगे? एक जवान बेटा और आधी उम्र पार कर चुकी उसकी माँ... भले ही हम इस बड़े शहर में अकेले हों, पर समाज की आँखें बहुत गंदी होती हैं। और यह एक बिस्तर..."
मैंने उठकर सिरहाने का सहारा लिया। "समाज कहाँ था जब आप उस ढहते मकान में अकेले रातें काट रही थीं? कहाँ था समाज जब मैं मुंबई की इन बड़ी इमारतों में हर रात अकेलेपन से घुट रहा था? जिस समाज की आप बात कर रही हैं, उसने हमें सिर्फ तन्हाई दी है।"
माँ की आँखें सजल हो गईं। उन्होंने भर्राए गले से कहा, "तू नहीं समझेगा। औरत की साख पहाड़ों की बर्फ जैसी होती है, ज़रा सी धूप लगी नहीं कि पिघल कर मिट्टी हो जाती है। मुझे अपनी परवाह नहीं, पर तेरे इस ऊँचे नाम पर कोई उंगली उठाए, यह मुझसे नहीं देखा जाएगा।"
"मुझे अपने नाम की कोई परवाह नहीं है, माँ," मैंने उनका हाथ थामने की कोशिश की, पर उन्होंने संकोचवश अपनी उंगलियां पीछे खींच लीं। वह हिचकिचाहट इतनी गहरी थी कि उसे पिघलने में अभी और वक्त चाहिए था।