अल्मोड़ा के एक सुदूर, शांत पहाड़ी गांव में माँ बिल्कुल अकेली रहती थीं। लगभग ५० वर्ष की उम्र, चेहरे पर वक्त और पहाड़ों की सख्त जिंदगी की लिखी कुछ महीन लकीरें, और एक ढहता हुआ पुराना मकान—यही उनकी कुल जमा पूंजी थी। उनका अपना कोई नहीं था, और जिंदगी बस ठहर सी गई थी। दूसरी तरफ मैं था—२८ साल का एक कॉर्पोरेट पेशेवर, जो मुंबई की गगनचुंबी इमारतों के बीच आलीशान जिंदगी तो जी रहा था, पर भीतर से उतना ही अकेला और खोया हुआ था। बचपन के एक पुराने जुड़ाव और माँ की इस बेबसी को देखकर मुझसे रहा नहीं गया। मैं उन्हें उस टूटते घर और तन्हाई से निकालकर जबरन अपने साथ मुंबई ले आया।
मैंने मुंबई के एक बेहद महंगे पेंटहाउस में उनके रहने का इंतजाम किया। घर में हर तरह की विलासिता थी, बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियां थीं जहां से पूरा शहर दिखता था। लेकिन मैंने इस बड़े से आलीशान अपार्टमेंट के बेडरूम में जानबूझकर सिर्फ एक सिंगल बेड रखा था। यह कोई कमी नहीं, बल्कि मेरी एक सोची-समझी जिद थी। मैं बचपन से अपनों के स्पर्श और आत्मीयता के लिए तरसा था; मैं नहीं चाहता था कि इतने बड़े घर में भी हम दोनों अलग-अलग कमरों के सन्नाटे में सोएं। मैं चाहता था कि रात के सन्नाटे में किसी के सांस लेने की आवाज मुझे महसूस हो, जो मुझे यह अहसास दिलाए कि मैं अकेला नहीं हूँ।