Chapter 18 of 20

सवालों का भंवर और नई कशमकश

495 words

​ड्राइंग रूम में पसरा सन्नाटा किसी भारी पत्थर की तरह महसूस हो रहा था। निशा सोफे के किनारे पर बिल्कुल सीधी बैठी थी, उसके दोनों हाथ उसके घुटनों पर जकड़े हुए थे। उसकी १९ साल की तीखी, समझदार आँखें लगातार कमरे के हर कोने, माँ की मांग के सिंदूर और नीरू के सहज, शांत चेहरे का मुआयना कर रही थीं। हॉस्टल और कॉलेज की खुली दुनिया से आई निशा के लिए यह सब कुछ किसी अकल्पनीय पहेली जैसा था। ​"मुझे कोई समझाएगा कि यहाँ चल क्या रहा है?" निशा की आवाज़ में घबराहट और एक दबी हुई बगावत साफ झलक रही थी। "माँ ने कहा था कि नानी मामा के पास मुंबई में रह रही हैं... पर यह माहौल? यह बच्चा किसका है? और नीरू मौसी... आप इस तरह क्यों बात कर रही हैं जैसे यह कोई आम बात हो?" ​नीरू ने आगे बढ़कर एक गिलास पानी निशा के सामने टेबल पर रखा। उसके चेहरे पर किसी तरह की झिझक या सफाई देने का भाव नहीं था। "यह आम बात नहीं है, निशा। यह इस घर की अपनी सच्चाई है। जब तुम दुनिया के बनाए चश्मे को उतारकर देखोगी, तभी समझ पाओगी कि यहाँ कोई किसी धोखे या मजबूरी में नहीं जी रहा।" ​"सच्चाई?" निशा ने झटके से पानी का गिलास परे धकेल दिया। "यह समाज के किसी नियम में नहीं आता! नानी की यह उम्र... और मामा, आप इतने बड़े पद पर होकर भी यह सब कैसे होने दे रहे हैं? क्या किसी को बाहर की दुनिया का ज़रा भी डर नहीं है?" ​मैं धीरे से चलकर उसके सामने आया और अपनी नजरें सीधे उसकी आँखों पर टिका दीं। "बाहर की दुनिया सिर्फ तब तक मायने रखती है निशा, जब तक तुम उनके टुकड़ों पर पलते हो। जब तुम उस अकेलेपन और संघर्ष से गुजरते हो जिससे हम सब गुजरे हैं, तब दुनिया का कोई नियम काम नहीं आता। इस घर की चारदीवारी के भीतर सिर्फ एक ही चीज़ की अहमियत है—यहाँ रहने वालों का आपसी विश्वास और एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण।" ​निशा ने फटी आँखों से मुझे देखा। उसके होंठ कुछ कहने के लिए खुले, पर मेरे लहजे की दृढ़ता और माँ-नीरू के चेहरों पर फैले अटल ठहराव ने उसके शब्दों को गले में ही रोक दिया। वह समझ चुकी थी कि यहाँ कोई अपराधबोध नहीं है, बल्कि एक ऐसा संगठित दायरा है जहाँ उसकी पुरानी समझ का कोई मोल नहीं था। ​"मुझे... मुझे थोड़ा वक्त चाहिए," निशा ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा और अपना बैग उठाकर गेस्ट रूम की तरफ बढ़ गई। ​कमरे का दरवाज़ा बंद होने के बाद, माँ ने मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, "वह अभी बहुत छोटी है... दुनिया के कायदों से बंधी है।" ​"वक्त हर नियम को बदल देता है, माँ," मैंने बहुत शांत भाव से जवाब दिया। "जब अकेलापन और हकीकत सामने आते हैं, तो बड़ी से बड़ी दीवारें पिघल जाती हैं। निशा भी धीरे-धीरे समझ जाएगी कि इस घर का दायरा बाहर के खोखले संसार से कहीं ज्यादा मजबूत और महफूज़ है।"

End of Chapter 18