Chapter 17 of 20
अतीत का एक और सिरा और निशा का आगमन
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नीरू की गर्भावस्था के शुरुआती महीनों के साथ घर में एक नया ठहराव आ चुका था। माँ, नीरू और वह नन्हा बच्चा—हम सब अपनी इस बनाई हुई दुनिया में पूरी तरह ढल चुके थे। लेकिन बाहर की दुनिया से हमारे पुराने तारों का पूरी तरह कटना अभी बाकी था।
एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी। जब मैंने दरवाजा खोला, तो सामने एक १९ साल की लड़की खड़ी थी, जिसके कंधे पर एक भारी पिट्ठू बैग था और चेहरे पर लंबी यात्रा की धूल और गहरी उलझन। वह निशा थी—मेरी सबसे बड़ी बहन की बेटी, जो पुणे के एक कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। हॉस्टल की छुट्टियों और पारिवारिक परेशानियों के चलते वह कुछ दिनों के लिए अपने 'मामा' के इस आलीशान घर में रहने आई थी।
"मामा..." निशा ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, लेकिन जैसे ही उसकी नजरें मेरे पीछे खड़े दृश्य पर पड़ीं, उसकी मुस्कान वहीं जम गई।
लिविंग रूम में माँ बैठी थीं, जिनकी मांग में सिंदूर था और गोद में उनका छोटा बच्चा खेल रहा था। वहीं पास में नीरू बैठी थी, जिसके हाव-भाव और चेहरे पर गर्भावस्था का स्पष्ट सुकून और अधिकार झलक रहा था। निशा के लिए यह सब किसी भारी असमंजस से कम नहीं था। उसकी १९ साल की समझ में यह दृश्य किसी भी जाने-पहचाने पारिवारिक ढांचे में फिट नहीं बैठ रहा था।
"नानी... और नीरू मौसी?" निशा ने बैग नीचे रखते हुए, हैरान नज़रों से एक-एक करके सबको देखा। "यह सब क्या है? नानी, आपकी मांग में... और यह बच्चा?"
घर के भीतर एक बार फिर पुरानी मर्यादाओं और सवालों की गूंज लौट आई थी। माँ ने संकोचवश अपनी नजरें नहीं झुकाईं, बल्कि एक शांत गरिमा के साथ निशा को देखा। वहीं नीरू ने भी बिना किसी अपराधबोध के अपनी जगह से उठकर निशा की तरफ कदम बढ़ाया।
मैंने आगे बढ़कर निशा का बैग एक तरफ रखा और बहुत शांत लेकिन स्पष्ट लहजे में कहा, "अंदर आ जाओ, निशा। यह घर और यहाँ की ज़िंदगी वैसी नहीं है जैसी तुमने अपनी किताबों या दुनिया में देखी है। यहाँ सिर्फ वही नियम चलते हैं जो इस छत के नीचे तय होते हैं।"
निशा ने फटी आँखों से मुझे देखा। उसके मन में उठते अनगिनत सवालों, हैरानी और पारंपरिक संकोच की दीवारें साफ महसूस की जा सकती थीं। हमारे इस अपरंपरागत संसार में एक और नई पीढ़ी का प्रवेश हो चुका था, जिसके सामने इस नए सच को स्वीकार करने की एक नई चुनौती खड़ी थी।