महीने अपनी शांत रफ्तार से बीतते गए। उस पेंटहाउस की दुनिया में अब किसी संशय, हिचकिचाहट या पुराने समाज के नियमों का कोई नामोनिशान नहीं बचा था। घर का कोना-कोना एक गहरी आत्मीयता और साझा ज़िम्मेदारियों से भर चुका था। माँ अपने छोटे बेटे की परवरिश में व्यस्त रहती थीं, और नीरू ने भी पूरी तरह से इस नए संसार के तौर-तरीकों और इसके नियमों को आत्मसात कर लिया था।
एक शाम, जब मुंबई के आसमान में नारंगी किरणें बिखर रही थीं, नीरू बालकनी में खड़ी थी। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था, और उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जिसमें घबराहट से ज़्यादा एक गहरा, शांत गौरव छिपा था। जब मैं उसके करीब पहुँचा, तो उसने बिना कुछ कहे वह मेडिकल रिपोर्ट मेरी तरफ बढ़ा दी।
रिपोर्ट पर साफ अक्षरों में दर्ज था कि नीरू माँ बनने वाली थी।
मेरी नज़रें रिपोर्ट से उठकर नीरू के चेहरे पर टिकीं। उसकी आँखों में एक हल्की सी नमी थी, पर इस बार वह किसी पुरानी टूटन की नहीं, बल्कि अपने भीतर पनप रहे नए जीवन के अहसास की थी।
"क्या तुम सच में तैयार हो, नीरू?" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए, सीधे उसकी आँखों में झाँककर पूछा।
"जब मैंने इस घर की दहलीज पर कदम रखा था, तभी मैंने अपने पुराने वजूद को पीछे छोड़ दिया था," नीरू ने एक दृढ़ लेकिन कोमल स्वर में कहा। उसने मेरा हाथ थामकर अपने पेट पर रख दिया। "अब यही मेरा सच है, यही मेरा परिवार है। इस बच्चे के रूप में हमारा यह दायरा अब हमेशा के लिए अटूट हो जाएगा।"
उसी समय माँ भी अपने बेटे को गोद में लिए बालकनी में आ पहुँचीं। जब उन्होंने नीरू की रिपोर्ट और हमारे बीच के इस भावुक पल को देखा, तो उनके चेहरे पर एक ममतामयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने आगे बढ़कर नीरू के माथे को चूमा और कहा, "इस घर की खुशियाँ अब पूरी तरह मुकम्मल हो गई हैं। तूने जो फैसला लिया है, वही इस नए संसार की सबसे बड़ी ताकत बनेगा।"
उस शाम, बालकनी से दिखते शहर के विशाल विस्तार के सामने, हमारा यह छोटा सा, अपरंपरागत दायरा पूरी तरह संगठित हो चुका था। माँ की मांग का सिंदूर, गोद में खेलता नन्हा बच्चा, और अब नीरू के भीतर धड़कता एक नया जीवन—यह सब मिलकर एक ऐसी हकीकत बन चुके थे, जिसे बाहर की दुनिया का कोई भी सवाल या नियम कभी हिला नहीं सकता था।