उस रात के बाद पेंटहाउस का पूरा माहौल पूरी तरह बदल गया था। घर में अब कोई अलग कोना या किसी के भीतर कोई परायापन नहीं बचा था। सुबह जब धूप की उजली किरणें विशाल कांच की खिड़कियों से छनकर लिविंग रूम के फर्श पर फैलीं, तो रसोई से चाय और मसालों की मिली-जुली खुशबू पूरे घर में तैर रही थी।
माँ और नीरू दोनों रसोई में एक साथ थीं। जहाँ कुछ दिन पहले तक एक भारी खामोशी और तनाव की दीवारें थीं, वहाँ अब बर्तनों की धीमी खनक और एक सहज अपनापन था। नीरू चाय के कप ट्रे में सजा रही थी, और माँ पालने से जाग चुके नन्हे बच्चे को दूध पिलाने की तैयारी कर रही थीं। दोनों के बीच कोई पुरानी कड़वाहट या सवाल बाकी नहीं था; सब कुछ एक शांत, गहरे ठहराव में ढल चुका था।
जब मैं कमरे से बाहर आया, तो नीरू ने मुस्कुराते हुए चाय का कप मेरी तरफ बढ़ाया। उसकी आँखों में अब वह पुरानी कॉर्पोरेट दुनिया की थकान या दिल्ली की टूटन का कोई नामोनिशान नहीं था। उसकी कलाई में एक सादा सा धागा था और चेहरे पर एक ऐसा सुकून, जो सिर्फ पूरी तरह समर्पित हो जाने के बाद ही किसी के चेहरे पर आता है।
"आज से ऑफिस का काम थोड़ा हल्का रखना," नीरू ने धीमी आवाज़ में, अपने सहज अधिकार के साथ कहा। "माँ कह रही थीं कि शाम को हम सब बालकनी में साथ बैठेंगे।"
मैंने कप थामते हुए उसका हाथ हल्के से सहलाया। नीरू ने नजरें नहीं चुराईं, बल्कि एक शांत मुस्कान के साथ मेरी आँखों में देखा।
माँ ने बच्चे को गोद में लेकर मेरे पास आकर कहा, "पहाड़ों की उस तन्हाई से लेकर मुंबई के इस ऊंचे आसमान तक का सफर बहुत लंबा था। पर आज जब मैं इस घर को देखती हूँ, तो लगता है कि किनारे सिर्फ दो नहीं थे... वे सब मिलकर एक ऐसा समंदर बन गए हैं जहाँ कोई लहर किसी दूसरी लहर से अलग नहीं है।"
मैंने एक हाथ से माँ के कंधे को थामा और दूसरे हाथ से नीरू की हथेली को अपनी मजबूत पकड़ में लिया। पालने में खेलता वह नन्हा जीवन, ५० वर्ष की उम्र में अपनी गृहस्थी को संवारती माँ, और २४ साल की नीरू—यह दुनिया भले ही बाहर के समाज के संकीर्ण नियमों के खिलाफ थी, लेकिन इस चारदीवारी के भीतर यह हमारा अपना, सबसे सुरक्षित और मुकम्मल सच था। अब किसी समाज की नजरें या पुरानी रीतियां हमारे इस बनाए हुए दायरे को कभी छू भी नहीं सकती थीं।