Chapter 14 of 20

नए बंधन का स्वीकार

486 words

लिविंग रूम में पसरी वह मद्धम रोशनी अब किसी नए सवेरे की शुरुआत जैसी लग रही थी। नीरू का सिर मेरी छाती पर टिका हुआ था, और उसकी अनियंत्रित सांसें धीरे-धीरे एक शांत लय में बदलने लगी थीं। बरसों से अपने भीतर दबाए रखे गए दर्द, धोखे और अकेलेपन के आंसू अब उसकी पलकों से बहकर मेरी शर्ट को भिगो रहे थे। यह सिर्फ एक टूटे हुए दिल का रोना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी पहचान और समाज की झूठी बंदिशों को हमेशा के लिए त्यागने की प्रक्रिया थी। मैंने अपने दोनों हाथों से उसे पूरी तरह अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। उसकी पीठ को हौले से सहलाते हुए मैंने कहा, "अब किसी डर की कोई जगह नहीं है, नीरू। जो कल तक तुम्हारा अतीत था, वह इस दहलीज के बाहर ही छूट गया।" नीरू ने धीरे से अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी कजरारी, नम आँखों में अब कोई बगावत या नफ़रत नहीं थी; वहाँ सिर्फ एक गहरा ठहराव और अनकहा समर्पण था। उसने भर्राई आवाज़ में पूछा, "माँ... क्या माँ मुझे इस रूप में स्वीकार कर पाएंगी? क्या वह मुझे अपने इस नए संसार में जगह देंगी?" इससे पहले कि मैं कुछ कहता, बेडरूम का दरवाज़ा खुला। माँ बच्चे को पालने में सुलाकर बाहर आ चुकी थीं। उनके चेहरे पर वही शांत, गरिमामयी सौम्यता थी जो पिछले कुछ महीनों में उनकी पहचान बन चुकी थी। उनकी मांग का गहरा लाल सिंदूर हॉल की हल्की रोशनी में एक अटल सच्चाई की तरह चमक रहा था। माँ बिना कुछ बोले आगे बढ़ीं और सोफे के पास आकर खड़ी हो गईं। नीरू ने घबराकर मेरी पकड़ से खुद को थोड़ा ढीला करना चाहा, लेकिन माँ ने खुद आगे बढ़कर अपना कोमल हाथ नीरू के सिर पर रख दिया। "इस घर में जो भी इस छत के नीचे आता है, वह किसी अजनबी की तरह नहीं, बल्कि एक हिस्से की तरह रहता है," माँ की आवाज़ में किसी पुरानी कटुता का कोई अंश नहीं था। "मैंने भी बहुत वक्त गंवाया था उस दुनिया के खौफ में, नीरू। पर जब सच को अपनाया, तभी असल ज़िंदगी शुरू हुई। अगर तूने इस राह को चुन लिया है, तो अब पीछे मुड़कर मत देखना।" माँ की यह बात सुनते ही नीरू के भीतर बची आखिरी हिचकिचाहट भी पूरी तरह पिघल गई। उसने झुककर माँ के दोनों हाथ थाम लिए और अपने माथे से लगा लिए। मैंने दोनों को एक साथ देखा—एक तरफ ५० वर्ष की वह स्त्री, जिसने मेरे प्रेम में अपने पूरे जीवन को एक नया रूप दिया था, और दूसरी तरफ २४ साल की यह युवती, जिसने दुनिया के सारे झूठे दायरों को छोड़कर मेरे अधिकार में अपनी हिफ़ाज़त तलाश ली थी। इस पेंटहाउस की ऊंची दीवारों के बीच हमारा यह अपरंपरागत परिवार अब पूरी तरह एक अटूट सूत्र में बंध चुका था। बाहर का शहर अपनी अंधी दौड़ में चाहे जो भी नियम बनाए, इस घर के भीतर सिर्फ हमारा अपना सच और हमारा अपना कानून था।

End of Chapter 14

Chapter 14: नए बंधन का स्वीकार - Do Kinaron ka Milan | Novel AI Studio