Chapter 13 of 20

आत्मसमर्पण की दहलीज

444 words

शाम ढलते-ढलते पेंटहाउस की खिड़कियों पर बारिश की नन्हीं बूंदें फिसलने लगी थीं। घर के भीतर का सन्नाटा अब किसी तूफान से पहले की खामोशी जैसा भारी था। माँ बच्चे को सुलाकर बेडरूम में ही थीं, और लिविंग रूम की मद्धम रोशनी में सोफे पर सिर्फ नीरू बैठी थी। उसके सामने टेबल पर रखा पानी का गिलास अब भी अछूता था। मैं धीरे से जाकर उसके करीब बैठ गया। मेरे बैठने से सोफे पर जो हल्की हलचल हुई, उसने नीरू के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी। उसने अपनी हथेलियों को घुटनों पर कसकर भींच लिया। "कब तक इस अजनबीपन की ओट में खुद को छुपाओगी?" मैंने उसकी ओर झुकते हुए धीमी, पर गहरी आवाज़ में कहा। "दिल्ली की उस भीड़ ने तुम्हें सिर्फ दर्द दिया, और यहाँ तुम उस सुकून से भाग रही हो जो तुम्हें बिना किसी शर्त के मिल रहा है।" नीरू ने अपनी नम आँखें उठाईं। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी, "भाई... यह सब इतना आसान नहीं है। बचपन से जो देखा, जो सीखा... उन सबको एक झटके में भुला देना क्या मुमकिन है? मेरे भीतर का इंसान रोज़ खुद से लड़ता है।" "उस लड़ाई का कोई नतीजा नहीं निकलेगा जब तक तुम उस सच को स्वीकार नहीं करोगी जो तुम्हारे सामने है," मैंने आगे बढ़कर उसके चेहरे पर बिखरी लटों को धीरे से हटाया। उसकी त्वचा मेरी उंगलियों के स्पर्श से हल्की सी कांप उठी, लेकिन इस बार उसने पीछे हटने की कोई कोशिश नहीं की। "माँ ने भी शुरुआत में यही लड़ाई लड़ी थी," मैंने उसके करीब आते हुए फुसफुसाया। "पर जब उन्होंने उस झूठे समाज के डर को पीछे छोड़ा, तभी उन्हें यह शांति और अपना संसार मिला। क्या तुम अपनी ज़िंदगी भर उस तन्हाई का बोझ ढोना चाहती हो?" नीरू की सांसें तेज हो गईं। उसने अपने होंठ भींच लिए, जैसे अपने भीतर की आखिरी हिचकिचाहट को थामने की नाकाम कोशिश कर रही हो। "अगर मैंने... अगर मैंने यह दायरा चुन लिया, तो मेरा क्या वजूद रहेगा?" "तुम्हारा वजूद इस घर की सबसे महफूज़ पनाह बनेगा," मैंने उसका हाथ अपनी मजबूत पकड़ में लेते हुए कहा। "यहाँ तुम्हें किसी के सामने साबित करने की ज़रूरत नहीं होगी। तुम्हें सिर्फ इस रिश्ते के अधिकार और मेरी हिफ़ाज़त को पूरी तरह अपनाना होगा।" नीरू ने एक गहरी, लड़खड़ाती सांस ली और अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी पलकों से फिसला एक आंसू सीधे मेरी कलाई पर गिरा। उस एक पल में, उसके भीतर की बगावत और समाज के बनाए सारे तर्कों ने दम तोड़ दिया था। उसने धीरे से अपना सिर मेरी छाती पर टिका दिया—यह उसका पहला, बिना किसी शर्त का आत्मसमर्पण था, जिसने इस घर की एक नई दास्तान की नींव रख दी।

End of Chapter 13