Chapter 12 of 20
दरकती दीवारें और अनकहे अहसास
421 words
उस रात के बाद पेंटहाउस की हवा में तनाव की जगह एक अजीब, भारी सन्नाटे ने ले ली थी। नीरू अब पहले की तरह तल्खी से बात नहीं कर रही थी; उसकी आँखों में गुस्से की जगह एक गहरा संशय और बेचैनी तैरने लगी थी। वह अक्सर लिविंग रूम के कोने में बैठकर माँ को देखती, जो अपने नन्हे बेटे को गोद में लिए लोरी गा रही थीं। उस दृश्य में किसी पाप की दुर्गंध नहीं, बल्कि एक असीम, शांत मातृत्व की महक थी जिसने नीरू के सारे पारंपरिक तर्कों को उलझा कर रख दिया था।
एक दोपहर जब मैं बालकनी में खामोश खड़ा था, नीरू दबे पाँवों वहाँ आई। उसके चेहरे पर रात भर जागने की थकान और भीतर चल रहे घमासान के निशान साफ थे। उसने कुछ देर शहर की अंधी दौड़ को देखा, फिर बेहद धीमी, कांपती आवाज़ में बोली, "तुम दोनों इतने शांत कैसे रह सकते हो, भाई? दुनिया अगर इस सच को जान गई, तो पैरों तले की ज़मीन खींच लेगी... क्या तुम्हें ज़रा भी खौफ नहीं होता?"
मैंने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए उसकी तरफ रुख किया और उसकी आँखों में सीधे देखा। "खौफ उस चीज़ का होता है जिसे इंसान छुपाना चाहता हो, नीरू। हमने जो चुना है, वह किसी से छीनकर नहीं, बल्कि अपने वीराने को भरकर बनाया है। जब तू दिल्ली में उस बनावटी रिश्ते के धोखे में तिल-तिल मर रही थी, तब दुनिया का कौन सा कानून तुझे बचाने आया था?"
नीरू ने अपनी पलकें झुका लीं, उसकी आँख के कोने से एक आंसू की बूंद ढलक गई। उसकी आधुनिकता और अहंकार की आखिरी परत भी अब टूटने लगी थी। "मैं बहुत थक गई हूँ... खुद से, इस झूठी दुनिया से।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाकर उसके कांपते हाथों को अपनी हथेलियों में थाम लिया। इस बार उसने हाथ पीछे नहीं खींचा। "तो इस थकावट को यहीं छोड़ दे। इस घर की चारदीवारी के भीतर समाज का कोई नियम नहीं चलता। यहाँ सिर्फ एक सच है—समर्पण और अपनापन। अगर तू इस दायरे का हिस्सा बनना चाहती है, तो तुझे उन पुराने खोखले बंधनों को हमेशा के लिए त्यागना होगा।"
नीरू ने सिर उठाकर मुझे देखा; उसकी आँखों में डर, विवशता और एक अनजानी कशमकश का सैलाब था। उसी पल माँ कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं। उनकी मांग का गहरा सिंदूर और चेहरे का ठहराव नीरू के लिए एक मूक संदेश था कि यह नया संसार अब अपनी पूरी मजबूती के साथ स्थापित हो चुका है, और उसमें शामिल होने के लिए सिर्फ एक आखिरी कदम की दरकार थी।