दिन बीतने लगे, पर पेंटहाउस के भीतर एक भारी तनाव पसरा रहता था। नीरू घर के दूसरे कोने के कमरे में रहती थी। वह खाना खाने भी तभी बाहर आती जब मैं घर पर होता। वह माँ को लगातार नफ़रत और हिकारत भरी नज़रों से देखती, जिससे माँ बहुत आहत होती थीं।
एक रात, जब पूरा घर सो रहा था, मैं बालकनी में खड़ा सिगरेट पी रहा था। नीरू दबे पाँवों वहाँ आई। उसके हाथ में शराब का एक ग्लास था, जो उसने मेरी बार-कैबिनेट से निकाली थी। उसकी आधुनिकता के पीछे का अकेलापन और हताशा अब धीरे-धीरे बाहर आ रही थी।
"तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती, भाई?" नीरू ने ग्लास से एक घूंट लेते हुए, खिड़की के पार दिखती मुंबई की बत्तियों को देखते हुए पूछा।
"शर्म किस बात की, नीरू? अपनी रूह को मुकम्मल करने की? या किसी अकेले को सहारा देने की?" मैंने सिगरेट का धुआँ हवा में उड़ाते हुए कहा।
"यह सहारा नहीं है, यह वासना है! यह विकृति है!" नीरू ने कड़वाहट से कहा। "तुमने माँ के साथ जो किया... मैं सोच भी नहीं सकती।"
मैंने मुड़कर सीधे उसकी आँखों में देखा। लैंप की मद्धम रोशनी में उसका २४ साल का युवा, निखरा हुआ चेहरा और उसकी आँखों की सूनी बगावत साफ दिख रही थी। "तुम सिर्फ बाहर का ढांचा देख रही हो, नीरू। तुमने कभी इस पेंटहाउस के भीतर के अकेलेपन को महसूस किया है? जब मैं यहाँ हर रात घुटता था, तब तुम कहाँ थीं? और जब माँ उस पहाड़ी गांव में अकेले मरने की कगार पर थीं, तब तुम्हारी यह 'मर्यादा' कहाँ सोई थी?"
मैंने एक कदम उसके करीब बढ़ाया। "तुम खुद को बहुत आधुनिक मानती हो ना? दिल्ली की पार्टियों में जाना, शराब पीना, मर्दों के साथ घूमना... क्या मिला तुम्हें इससे? सिवाय एक धोखे और टूटे हुए दिल के? तुम्हारी उस आधुनिक दुनिया ने तुम्हें सिर्फ इस्तेमाल किया और फेंक दिया। लेकिन इस घर में, जिसे तुम पाप का घर कह रही हो, हर एक धड़कन सुरक्षित है।"
नीरू ने अपनी आँखें झुका लीं। उसके होठ कांप रहे थे। "पर भाई... भाई-बहन का रिश्ता, माँ-बेटे का रिश्ता... ये सब तो समाज की बुनियाद हैं। अगर ये ही टूट गए, तो बचेगा क्या?"
"बचेगा सिर्फ वजूद, नीरू," मैंने उसके हाथ से शराब का ग्लास ले लिया और उसे साइड टेबल पर रख दिया। मैंने उसकी ठुड्डी को अपनी उंगलियों से हल्के से छुआ। वह चौंकी, पर उसने मेरा हाथ हटाया नहीं। "इस घर के भीतर सिर्फ एक ही नियम चलता है—जो पूरी तरह समर्पित होगा, वही सुरक्षित रहेगा। माँ ने इस सच को स्वीकार कर लिया है, इसलिए वह आज इस घर की मालकिन हैं। अब तुम्हारी बारी है... तुम इस घर में एक कैदी बनकर रहना चाहती हो, या अपने इस भाई के वजूद में विलीन होकर अपनी हिफाज़त का नया दायरा चुनना चाहती हो?"
मेरी इस बात ने नीरू के भीतर एक नया और गहरा कंपन पैदा कर दिया। उसके भाई का यह रूप, उसकी यह चुंबकीय और प्रभुत्वशाली ज़िद उसके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित थी। वह बिना कुछ बोले, कांपते कदमों से अपने कमरे की तरफ भाग गई।
लेकिन मैं जानता था कि पहला तीर निशाने पर लग चुका था। समाज का डर और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की जो दुहाई वह दे रही थी, उसके पीछे छिपा उसका अपना अकेलापन और टूटन अब धीरे-धीरे मेरी ज़िद के आगे पिघलने के लिए तैयार हो रही थी। नीरू का यह संशय ही उसकी पराजय और मेरे अगले विजय की शुरुआत थी।