Chapter 29 of 30

अंधेरे के पीछे कौन था

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गुफा की सारी रोशनियां एक साथ बुझ गईं। एक पल पहले तक पत्थरों से निकल रही हल्की सफेद रोशनी पूरे स्थान को किसी पुराने मंदिर जैसा बना रही थी। अब वहां केवल अंधेरा था। इतना गहरा कि शौर्य को अपने सामने खड़े आर्यन का चेहरा भी दिखाई नहीं दे रहा था। उसने सहज रूप से अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी उंगलियां किसी चीज से टकराईं। आर्यन। "यहीं रहो।" आर्यन की आवाज बहुत धीमी थी। शौर्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। विराज की सांसों की आवाज दूसरी दिशा से आ रही थी। वह भी वहीं था। लेकिन उसकी सांसों में पहले जैसी स्थिरता नहीं थी। वह घबराया हुआ था। और शौर्य ने पहली बार महसूस किया कि विराज वास्तव में किसी चीज से डर रहा था। सिर्फ डर नहीं। पहचान का डर। जैसे वह अंधेरे में मौजूद किसी चीज को जानता हो। कुछ क्षण तक कोई नहीं हिला। फिर गुफा की गहराई से एक धीमी आवाज आई। "इतने वर्षों बाद।" आवाज पुरुष की थी। गहरी। शांत। लेकिन उसमें कोई क्रोध नहीं था। यही बात उसे और अधिक भयावह बना रही थी। "तुम आखिर यहां पहुंच ही गए।" शौर्य ने चारों ओर देखने की कोशिश की। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। "कौन हो तुम?" उसने पूछा। आवाज कुछ देर शांत रही। फिर उत्तर आया। "जिसे तुम्हारी मां सबसे अधिक डरती थीं।" शौर्य का शरीर एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया। "तुम मेरी मां को जानते थे?" "जानता था।" "कहां हैं वह?" इस बार जवाब आने में ज्यादा समय लगा। "यही सवाल तुम्हें सबसे पहले पूछना चाहिए था।" शौर्य की सांस तेज हो गई। "मैंने वही पूछा है।" अंधेरे में हल्की हंसी गूंजी। वह हंसी मजाक वाली नहीं थी। उसमें थकान थी। "तुम बिल्कुल अपनी मां की तरह हो।" शौर्य ने आंखें बंद कर लीं। उसे अपनी मां का चेहरा याद आया। वह चेहरा जिसे उसने वर्षों से केवल यादों में देखा था। उसने फिर पूछा, "वह जीवित हैं?" इस बार आवाज बिल्कुल पास से आई। "हां।" शौर्य की आंखें खुल गईं। उसे लगा जैसे उसके भीतर कई वर्षों से जमा कोई भारी पत्थर अचानक हट गया हो। लेकिन उसी क्षण आर्यन ने उसका हाथ पकड़ लिया। "जल्दी विश्वास मत करना।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उसकी आवाज में चेतावनी साफ थी। विराज ने धीमे स्वर में कहा, "आर्यन सही कह रहा है।" शौर्य ने उसकी ओर देखा। "तुम जानते हो वह कौन है।" विराज चुप रहा। "तुमने पहले कहा था कि तुम्हें नहीं पता।" "मैंने कहा था कि मुझे उसका नाम नहीं पता।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "तो तुम उसका चेहरा जानते हो?" विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। अचानक गुफा के दूसरी ओर एक छोटी रोशनी जली। फिर दूसरी। फिर तीसरी। धीरे-धीरे सात रोशनियां एक वृत्त में दिखाई देने लगीं। उनके बीच एक व्यक्ति खड़ा था। लंबा। काले वस्त्रों में। उसका चेहरा अभी भी छाया में था। लेकिन इस बार उसकी आकृति स्पष्ट थी। शौर्य ने उसे ध्यान से देखा। उसे उस व्यक्ति में कुछ जाना-पहचाना लगा। बहुत हल्का। जैसे उसने उसे पहले कभी देखा हो। लेकिन वह याद इतनी पुरानी थी कि पकड़ में नहीं आ रही थी। वह व्यक्ति आगे बढ़ा। उसके चेहरे पर रोशनी पड़ी। शौर्य अचानक स्थिर हो गया। उसकी आंखें फैल गईं। "तुम..." उसके मुंह से शब्द नहीं निकला। आर्यन ने भी उसे देखा। उसके चेहरे पर पहले आश्चर्य आया। फिर अविश्वास। फिर उसकी आंखों में क्रोध भर गया। "तुम यहां कैसे हो?" वह व्यक्ति रुका। उसने आर्यन को देखा। "क्योंकि मुझे कभी जाना ही नहीं था।" आर्यन आगे बढ़ा। विराज ने उसका हाथ पकड़ लिया। "नहीं।" आर्यन ने उसे झटक दिया। "मुझे मत रोको।" वह व्यक्ति शांत खड़ा रहा। "तुम्हें अभी भी जल्दी गुस्सा आता है।" आर्यन का चेहरा बदल गया। "तुम्हें मेरे बारे में बात करने का कोई अधिकार नहीं है।" शौर्य दोनों को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सामने खड़ा व्यक्ति कौन था। लेकिन आर्यन की प्रतिक्रिया ने उसे बता दिया था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। विराज ने बहुत धीमे स्वर में कहा, "हमें यहां से जाना चाहिए।" वह व्यक्ति मुस्कुराया। "भागकर कहां जाओगे?" विराज ने उसकी ओर देखा। "तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें फिर रोक सकता हूं।" "नहीं।" उस व्यक्ति ने शांत स्वर में कहा। "अब तुम मुझे नहीं रोक सकते।" फिर उसकी नजर शौर्य पर गई। शौर्य ने पहली बार उसकी आंखें देखीं। वे आंखें बहुत शांत थीं। लेकिन उनमें एक अजीब खालीपन था। "तुम शौर्य हो।" शौर्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। उस व्यक्ति ने कहा, "तुम्हारी मां तुम्हें इसी नाम से बुलाती थीं।" शौर्य की उंगलियां अनायास मुट्ठी में बदल गईं। "तुम मेरी मां को कैसे जानते हो?" "क्योंकि मैंने उन्हें बहुत करीब से देखा है।" "कितने करीब से?" उस व्यक्ति ने उत्तर नहीं दिया। आर्यन बीच में आ गया। "बस।" उसने शौर्य और उस व्यक्ति के बीच खड़े होते हुए कहा, "उससे दूर रहो।" वह व्यक्ति आर्यन को देखता रहा। फिर उसकी आंखों में हल्की उदासी आई। "तुम्हारी मां भी यही कहती थीं।" आर्यन एक पल के लिए चुप हो गया। "मेरी मां का नाम मत लेना।" "क्यों?" "क्योंकि तुमने उनका जीवन बर्बाद किया।" उस व्यक्ति की आंखें कुछ क्षण नीचे झुक गईं। "नहीं।" उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। "मैंने उनकी जिंदगी नहीं बर्बाद की।" "मैंने उनकी जिंदगी बचाई।" आर्यन ने कटु स्वर में कहा, "झूठ।" वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला। विराज ने धीरे से कहा, "उसे जाने दो।" "विराज।" "उसे जाने दो।" उस व्यक्ति ने विराज की ओर देखा। "तुम्हें अब भी लगता है कि तुम सबको बचा सकते हो।" विराज ने कहा, "कम से कम कोशिश तो कर सकता हूं।" "तुमने उस रात भी कोशिश की थी।" विराज का चेहरा कठोर हो गया। "उस रात का नाम मत लो।" "क्यों?" "क्योंकि तुम जानते हो कि क्या हुआ था।" वह व्यक्ति शांत रहा। फिर उसने शौर्य की ओर देखा। "लेकिन वह नहीं जानता।" शौर्य ने कहा, "तो मुझे बताओ।" आर्यन ने उसकी ओर देखा। "शौर्य।" "नहीं।" शौर्य ने पहली बार उसकी बात काट दी। "अब मैं सुनना चाहता हूं।" उसकी आवाज कांप रही थी। लेकिन वह पीछे नहीं हटा। "मेरी मां कहां हैं?" उस व्यक्ति ने कहा, "जीवित हैं।" "कहां?" "एक ऐसी जगह जहां वह तुम्हें देख सकती हैं।" शौर्य का चेहरा बदल गया। "क्या मतलब?" उस व्यक्ति ने उत्तर नहीं दिया। शौर्य ने फिर पूछा। "क्या वह यहां हैं?" कुछ पल तक केवल गुफा की हवा सुनाई देती रही। फिर उस व्यक्ति ने कहा, "नहीं।" शौर्य ने निराश होकर आंखें बंद कर लीं। लेकिन उसी क्षण उस व्यक्ति ने कहा। "वह यहां थीं।" शौर्य ने आंखें खोल दीं। "कब?" "बहुत समय पहले।" "क्यों गईं?" "क्योंकि उन्हें जाना पड़ा।" "किसने भेजा?" वह व्यक्ति कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने कहा। "मैंने।" आर्यन आगे बढ़ा। "तुमने उन्हें भेजा?" "हां।" "कहां?" "उस जगह जहां सातवां बंधन तुम्हें नहीं ढूंढ सकता था।" शौर्य ने तुरंत कहा, "लेकिन उसने मुझे ढूंढ लिया।" वह व्यक्ति मुस्कुराया। "क्योंकि तुम उसे ढूंढ रहे थे।" शौर्य कुछ नहीं बोला। वह बात उसके भीतर उतर गई। क्या यह सच था? क्या इतने वर्षों में वह स्वयं उस शक्ति को अपने पास बुलाता रहा था? क्या उसकी बेचैनी, उसके सपने और उसकी मां की यादें किसी अदृश्य बंधन का हिस्सा थीं? विराज ने कहा, "उसे भ्रमित मत करो।" वह व्यक्ति उसकी ओर मुड़ा। "मैं उसे भ्रमित नहीं कर रहा।" "मैं केवल वह बता रहा हूं जो तुमने उससे छिपाया।" विराज चुप हो गया। आर्यन ने पूछा, "क्या छिपाया?" विराज ने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में पछतावा था। लेकिन इस बार उसने कोई उत्तर नहीं दिया। आर्यन ने कहा, "विराज।" विराज ने आखिरकार कहा, "तुम्हारी मां ने उसे कभी सातवें बंधन से पूरी तरह अलग करने की कोशिश नहीं की थी।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "क्यों?" "क्योंकि वह जानती थीं कि अगर बंधन पूरी तरह टूट गया, तो तुम मर सकते हो।" शौर्य के चेहरे पर कोई भाव नहीं रहा। "तो उन्होंने मुझे उसके साथ रहने दिया?" "उन्होंने तुम्हें उसके साथ जीना सिखाने की कोशिश की।" शौर्य ने धीरे से पूछा, "किसके साथ?" विराज ने उसकी ओर देखा। "उस शक्ति के साथ।" अचानक गुफा की दीवारों पर रोशनी फिर से फैल गई। सातों वृत्त चमक उठे। शौर्य ने अपने सीने में हल्का दबाव महसूस किया। वह व्यक्ति सामने से बोला। "अब तुम्हें समझ आने लगा है।" शौर्य ने कहा, "नहीं।" उसकी आवाज इस बार मजबूत थी। "मुझे अभी भी बहुत कुछ नहीं पता।" वह व्यक्ति मुस्कुराया। "यही कारण है कि तुम्हें अभी जाना नहीं चाहिए।" आर्यन ने तुरंत पूछा, "क्यों?" "क्योंकि बाहर वे लोग इंतजार कर रहे हैं।" विराज ने पूछा, "कौन?" "जिनसे तुम इतने वर्षों से भागते रहे हो।" विराज का चेहरा बदल गया। "वे यहां तक पहुंच गए?" वह व्यक्ति बोला, "तुम्हें क्या लगा था?" "कि पहाड़ उन्हें रोक देगा?" विराज ने शौर्य की तरफ देखा। "हमें तुरंत निकलना होगा।" लेकिन इससे पहले कि कोई आगे बढ़ता, गुफा के बाहर से भारी आवाज सुनाई दी। एक विस्फोट। पत्थर की दीवारें कांप उठीं। ऊपर से धूल गिरने लगी। शौर्य ने संतुलन बनाए रखने के लिए दीवार पकड़ ली। आर्यन ने उसे संभाला। दूसरी आवाज पहले से ज्यादा पास आई। फिर तीसरी। विराज ने तुरंत कहा, "वे आ गए।" आर्यन ने पूछा, "कितने?" विराज ने आंखें बंद कीं। कुछ पल बाद उसने कहा, "बहुत।" सामने खड़ा व्यक्ति शांत था। शौर्य ने उसे देखा। "तुम कुछ कर क्यों नहीं रहे?" उसने कहा, "क्योंकि यह तुम्हारी लड़ाई है।" "मेरी?" "हां।" "लेकिन मुझे लड़ना नहीं आता।" "तुम्हें लड़ना नहीं है।" वह व्यक्ति शौर्य के पास आया। आर्यन तुरंत बीच में आ गया। "एक कदम और नहीं।" वह व्यक्ति रुक गया। उसने आर्यन की आंखों में देखा। "तुम्हारी मां ने तुम्हें यही सिखाया था?" आर्यन ने कहा, "मेरी मां ने मुझे तुमसे दूर रहना सिखाया था।" "उन्होंने तुम्हें अधूरा सच सिखाया।" आर्यन ने अपनी शक्ति सक्रिय करने की कोशिश की। उसके चारों ओर हल्की ऊर्जा फैलने लगी। शौर्य ने पहली बार महसूस किया कि आर्यन की शक्ति पहले से बहुत अधिक बदल चुकी थी। लेकिन सामने वाला व्यक्ति अब भी शांत था। उसने केवल अपना हाथ उठाया। आर्यन की ऊर्जा तुरंत रुक गई। आर्यन पीछे हट गया। विराज ने कहा, "आर्यन, नहीं।" आर्यन ने दांत भींच लिए। "मैं इसे यहां नहीं रहने दूंगा।" वह व्यक्ति बोला, "तुम अभी भी मुझे समझ नहीं पाए।" फिर उसने शौर्य की तरफ देखा। "तुम्हारी मां ने मुझे दुश्मन नहीं माना था।" शौर्य ने पूछा, "तो क्या माना था?" उसने उत्तर दिया। "एक रास्ता।" शौर्य चुप हो गया। "किस चीज का रास्ता?" "तुम तक पहुंचने का।" गुफा फिर कांपी। इस बार पत्थर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। विराज ने कहा, "समय खत्म हो रहा है।" वह व्यक्ति पीछे हट गया। "तुम्हें जाना होगा।" शौर्य ने पूछा, "और मेरी मां?" "उसे खोजो।" "कहां?" वह व्यक्ति कुछ क्षण शौर्य को देखता रहा। फिर उसने कहा। "जहां पहली बार सातवां बंधन टूटा था।" शौर्य ने पूछा, "वह जगह कौन सी है?" लेकिन वह व्यक्ति पीछे हट चुका था। उसकी आकृति धीरे-धीरे अंधेरे में घुलने लगी। शौर्य ने उसे रोकने के लिए आगे बढ़ना चाहा। लेकिन आर्यन ने उसका हाथ पकड़ लिया। "अभी नहीं।" "लेकिन..." "अगर हम यहां रुके तो बाहर वाले हम तक पहुंच जाएंगे।" विराज ने सिर हिलाया। "आर्यन सही कह रहा है।" शौर्य ने आखिरी बार उस व्यक्ति की ओर देखा। "तुम्हारा नाम क्या है?" वह व्यक्ति रुका। कुछ पल बाद उसने कहा। "तुम्हारी मां मुझे एक नाम से बुलाती थीं।" शौर्य ने पूछा, "क्या नाम?" उसने उत्तर दिया। "अयन।" और फिर वह अंधेरे में गायब हो गया। शौर्य ने उस नाम को मन में दोहराया। अयन। उसे लगा जैसे उसने यह नाम कभी पहले सुना हो। लेकिन कहां? उसे याद नहीं आया। विराज ने कहा, "चलो।" चारों गुफा के दूसरे रास्ते की ओर दौड़ने लगे। अब पीछे से पत्थर टूटने की आवाजें लगातार आ रही थीं। सुरंग में धूल भरती जा रही थी। शौर्य कई बार फिसला। आर्यन हर बार उसे संभालता। कुछ दूर जाने के बाद उन्हें एक संकरा रास्ता मिला। विराज सबसे पहले अंदर गया। नीरिका उसके पीछे गई। आर्यन ने शौर्य को आगे धकेला। "जाओ।" शौर्य अंदर चला गया। लेकिन जैसे ही आर्यन जाने वाला था, पीछे से एक तेज आवाज आई। पत्थर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। आर्यन पीछे रह गया। "आर्यन!" शौर्य चिल्लाया। धूल का बादल उठ गया। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। शौर्य वापस जाने लगा। विराज ने उसे रोक लिया। "नहीं।" "वह पीछे है।" "वह संभाल लेगा।" "लेकिन..." "अगर तुम वापस गए तो दोनों फंस जाओगे।" शौर्य ने विराज को धक्का देने की कोशिश की। "मुझे जाने दो।" तभी धूल के भीतर से आर्यन की आवाज आई। "शौर्य।" शौर्य रुक गया। "मैं ठीक हूं।" कुछ क्षण बाद आर्यन दिखाई दिया। उसके माथे पर हल्की चोट थी। लेकिन वह चल सकता था। शौर्य ने राहत की सांस ली। आर्यन उसके पास आया। "तुम ठीक हो?" शौर्य ने सिर हिलाया। फिर दोनों कुछ क्षण चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे। आर्यन ने कहा, "अयन पर भरोसा मत करना।" शौर्य ने पूछा, "तुम उसे जानते हो?" आर्यन ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। फिर उसने कहा, "नहीं।" "लेकिन मेरी मां जानती थीं।" "हां।" "तो शायद हमें जानना होगा कि वह कौन है।" आर्यन ने सिर हिलाया। "लेकिन उससे पहले हमें तुम्हारी मां को ढूंढना होगा।" शौर्य ने अपनी मुट्ठी खोली। काला मोती अब बिल्कुल शांत था। लेकिन उसके साथ रखा चांदी का लॉकेट हल्की रोशनी दे रहा था। शौर्य ने उसे देखा। लॉकेट के पीछे एक नया चिन्ह उभर आया था। एक छोटा वृत्त। उसके भीतर उत्तर दिशा की ओर जाती हुई एक रेखा। विराज ने उसे देखते ही कदम रोक दिए। उसका चेहरा बदल गया। "यह तो..." आर्यन ने पूछा, "क्या?" विराज ने उत्तर नहीं दिया। शौर्य ने कहा, "बोलो।" विराज ने आखिरकार कहा। "यह तुम्हारी मां का आखिरी संकेत है।" "यह हमें कहां ले जाएगा?" विराज ने बहुत धीमे स्वर में उत्तर दिया। "उस जगह जहां उन्होंने आखिरी बार किसी को बचाया था।" शौर्य ने पूछा, "किसे?" विराज ने उसकी आंखों में देखा। "मुझे।" शौर्य कुछ पल उसे देखता रहा। "तुम्हें?" विराज ने सिर हिलाया। "हां।" फिर वह आगे बढ़ा। "और शायद उसी जगह हमें यह भी पता चलेगा कि तुम्हारी मां ने मुझसे क्या छिपाया था।" सुरंग के अंत में पहली बार बाहर की हल्की सुबह दिखाई दे रही थी। रात समाप्त होने वाली थी। लेकिन शौर्य को पता था कि उसके जीवन की सबसे लंबी रात अभी शुरू हुई थी। उसने पीछे मुड़कर आखिरी बार उस अंधेरी सुरंग को देखा। वहां अब कोई नहीं था। न अयन। न वह अजीब आवाज। न सात रोशनियां। लेकिन उसके मन में एक बात साफ हो चुकी थी। उसकी मां ने उसे कभी छोड़ा नहीं था। उन्होंने उसे किसी चीज से बचाया था। और अब उसे पहली बार यह जानना था कि वह चीज आखिर थी क्या। सूरज की पहली किरण पहाड़ के ऊपर दिखाई दी। शौर्य ने अपनी मुट्ठी बंद की। फिर वह आर्यन और विराज के साथ आगे बढ़ गया। उसे नहीं पता था कि अगला रास्ता उसे उसकी मां तक ले जाएगा या किसी और गहरे रहस्य तक। लेकिन इस बार वह पीछे नहीं हटने वाला था। क्योंकि अब यह केवल उसके अतीत की खोज नहीं थी। यह उस सच की खोज थी जिसने उसके जन्म से पहले ही उसकी पूरी जिंदगी तय कर दी थी।

End of Chapter 29