Chapter 28 of 30

पहाड़ के नीचे छिपा दरवाजा

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सुरंग में फिर से शांति फैल गई। शौर्य की हथेली में रखा काला मोती धीरे-धीरे ठंडा हो चुका था। लेकिन उसके भीतर उठी बेचैनी कम नहीं हुई थी। उसने अपनी मां का पत्र फिर से देखा। कागज पर लिखे शब्द अब भी वही थे। फिर भी उसे लग रहा था जैसे उन शब्दों के पीछे कुछ और छिपा हो। कुछ ऐसा जिसे उसकी मां ने जानबूझकर सीधे शब्दों में नहीं लिखा था। आर्यन उसके पास खड़ा था। उसकी नजर पत्र पर थी। कुछ देर बाद उसने धीमे स्वर में पूछा, "तुम्हें लगता है कि वह जीवित हैं?" शौर्य ने उत्तर देने से पहले काफी देर तक सोचा। "मुझे नहीं पता।" "लेकिन?" शौर्य ने पत्र को मोड़ते हुए कहा, "अगर वह नहीं होतीं, तो उन्होंने यह पत्र क्यों छोड़ा होता?" आर्यन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। विराज अब तक कमरे के दूसरे हिस्से में खड़ा था। उसने एक पुराने पत्थर के स्तंभ को ध्यान से देखा। शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "अब आगे क्या?" विराज ने कहा, "अब हमें यहां से निकलना होगा।" आर्यन ने पूछा, "कहां?" "उत्तर की तरफ।" "तुमने कहा था कि पहाड़ के नीचे जाना है।" "हाँ।" विराज ने दीवार पर बने पुराने चिन्ह की ओर इशारा किया। "यह केवल पहला दरवाजा था।" शौर्य ने पूछा, "और दूसरा?" विराज ने कहा, "पहाड़ के भीतर।" वह कमरे से बाहर निकल गया। शौर्य और आर्यन उसके पीछे चल पड़े। नीरिका कुछ कदम पीछे थी। सुरंग पहले से अधिक संकरी हो गई थी। दीवारों पर जगह-जगह पुराने निशान बने थे। कहीं सात वृत्त। कहीं एक अकेला बिंदु। कहीं दो आपस में जुड़ी रेखाएं। शौर्य चलते हुए उन चिन्हों को देखता रहा। उसे बार-बार अपनी मां का पत्र याद आ रहा था। आर्यन भी चुप था। कुछ दूर चलने के बाद शौर्य ने पूछा, "आर्यन।" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "क्या?" "तुम्हें अपनी मां की कोई ऐसी बात याद है जो तुम्हें उस रात से जोड़ती हो?" आर्यन कुछ देर चुप रहा। "एक बात।" शौर्य रुका नहीं। "क्या?" "उन्होंने मुझे कभी उत्तर की तरफ जाने से मना किया था।" शौर्य ने धीरे से उसकी ओर देखा। "क्यों?" "उन्होंने कारण नहीं बताया।" "बस इतना कहा था कि जब तक मैं खुद को समझ न लूं, उत्तर के पहाड़ों के पास मत जाना।" शौर्य कुछ क्षण सोचता रहा। "और तुमने उनकी बात मानी?" आर्यन ने हल्की कड़वी मुस्कान के साथ कहा, "बहुत सालों तक।" "फिर?" "फिर तुम मेरी जिंदगी में आए।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। आर्यन ने कहा, "तुम्हारे बारे में सच्चाई जानने के बाद मैंने पहली बार सोचा कि शायद उनकी मनाही का कारण तुमसे जुड़ा था।" शौर्य ने पूछा, "तुम्हें ऐसा क्यों लगा?" "क्योंकि उन्होंने तुम्हारा नाम कभी नहीं लिया था।" "लेकिन जब भी उत्तर की बात होती, उनका चेहरा बदल जाता था।" सुरंग में चलते हुए शौर्य कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद वे एक खुले हिस्से में पहुंचे। वहां सुरंग समाप्त होती हुई लग रही थी। सामने केवल पत्थर की दीवार थी। विराज उसके पास गया। उसने दीवार पर तीन बार हाथ रखा। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने फिर दो बार दस्तक दी। इस बार भीतर से हल्की आवाज आई। शौर्य ने सांस रोक ली। दीवार के बीच एक पतली रेखा दिखाई दी। फिर वह रेखा धीरे-धीरे चौड़ी होती गई। पत्थर दो हिस्सों में अलग होने लगा। उसके पीछे अंधेरा था। बहुत गहरा अंधेरा। विराज ने कहा, "यहीं से रास्ता शुरू होता है।" आर्यन ने पूछा, "यहां से कोई प्रकाश क्यों नहीं आ रहा?" विराज ने उत्तर दिया, "क्योंकि वहां प्रकाश की जरूरत नहीं है।" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "इसका क्या मतलब है?" विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह भीतर चला गया। शौर्य उसके पीछे जाने लगा। लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम अंदर रखा, उसे अपने सीने में हल्का दर्द महसूस हुआ। उसने वहीं रुककर अपनी छाती पर हाथ रखा। आर्यन ने पूछा, "क्या हुआ?" "कुछ नहीं।" "शौर्य।" "मैं ठीक हूं।" आर्यन कुछ और पूछता, उससे पहले शौर्य ने अंदर कदम रख दिया। अंदर जाते ही हवा बदल गई। बाहर की ठंडी हवा की जगह यहां गर्म और भारी वातावरण था। कुछ कदम आगे बढ़ने पर जमीन पर छोटे-छोटे पत्थर चमकते दिखाई दिए। वे किसी दीपक की तरह नहीं थे। उनमें से बहुत हल्की प्राकृतिक रोशनी निकल रही थी। शौर्य ने नीचे झुककर एक पत्थर देखा। उसमें सात छोटी रेखाएं थीं। आर्यन ने कहा, "ये वही चिन्ह हैं।" विराज ने कहा, "नहीं।" दोनों ने उसकी तरफ देखा। विराज ने पत्थर उठाया। "यह सात शक्तियों का चिन्ह नहीं है।" उसने पत्थर को उलट दिया। पीछे केवल एक बिंदु था। "यह केंद्र का चिन्ह है।" शौर्य ने पूछा, "केंद्र?" विराज ने कहा, "वह स्थान जहां सभी शक्तियां मिल सकती हैं।" आर्यन ने पूछा, "क्या यही सातवें बंधन का मूल है?" विराज ने सिर हिलाया। "संभव है।" "तुम्हें पक्का नहीं पता?" "नहीं।" आर्यन के चेहरे पर असंतोष था। "तुम्हें आखिर कितना पता है?" विराज ने उसकी ओर देखा। "इतना कि तुम्हें यहां तक ला सकूं।" "लेकिन इतना नहीं कि यहां से तुम्हें सुरक्षित वापस ले जा सकूं।" यह सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए रुक गया। "तो फिर हम अंदर क्यों जा रहे हैं?" विराज ने उसकी तरफ देखा। "क्योंकि तुम्हारी मां ने रास्ता यहीं छोड़ा था।" शौर्य ने कुछ नहीं कहा। वे आगे बढ़ते रहे। सुरंग धीरे-धीरे एक विशाल गुफा में बदल गई। छत दिखाई नहीं दे रही थी। दूर कहीं पानी गिरने की आवाज आ रही थी। विराज अचानक रुक गया। उसने अपना हाथ उठाकर सबको रुकने का संकेत दिया। आर्यन ने धीमे स्वर में पूछा, "क्या हुआ?" विराज ने जवाब नहीं दिया। उसकी नजर सामने थी। वहां जमीन पर एक पुराना कपड़ा पड़ा था। विराज धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा। उसने कपड़ा उठाया। उस पर खून का बहुत पुराना दाग था। शौर्य ने उसे देखा। "यह..." विराज ने कुछ नहीं कहा। आर्यन आगे आया। "यह किसका है?" विराज ने कपड़े को उलटकर देखा। उसके पीछे एक छोटा चिन्ह बना था। तीन रेखाएं। एक बिंदु। वही चिन्ह। आर्यन की आंखें सिकुड़ गईं। "यह विराज का चिन्ह है।" विराज ने कहा, "हाँ।" "यह यहां कैसे?" विराज कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, "क्योंकि मैं यहां पहले भी आया था।" आर्यन ने उसे देखा। "कब?" "उस रात के बाद।" "किसके साथ?" विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। आर्यन ने उसका रास्ता रोक लिया। "किसके साथ?" विराज ने पहली बार नजरें झुका लीं। "तुम्हारी मां के साथ।" शौर्य ने सांस रोक ली। विराज ने कहा, "जन्म-रात्रि के तीन दिन बाद हम यहां आए थे।" आर्यन की आवाज धीमी हो गई। "और शौर्य की मां?" "वह हमारे साथ थीं।" "तो फिर तीनों यहां आए थे?" "हाँ।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "यहां क्यों?" विराज ने कहा, "तुम्हें यहां छिपाने के लिए।" शौर्य कुछ पल उसे देखता रहा। "मुझे?" "हाँ।" "लेकिन मैं तो..." विराज ने कहा, "तुम्हें यहां केवल कुछ समय के लिए रखा गया था।" "फिर तुम्हारी मां ने तुम्हें दूसरी जगह भेज दिया।" शौर्य ने पूछा, "क्यों?" विराज ने उत्तर दिया, "क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि यह स्थान भी सुरक्षित नहीं है।" शौर्य के भीतर बेचैनी बढ़ गई। "फिर मेरी मां मुझे कहां लेकर गईं?" विराज ने उसकी तरफ देखा। "मुझे नहीं पता।" आर्यन ने कहा, "तुम फिर वही कह रहे हो।" विराज ने कहा, "क्योंकि उसके बाद रास्ते अलग हो गए।" कुछ देर तक कोई नहीं बोला। विराज ने कपड़ा वापस जमीन पर रख दिया। फिर वह गुफा के बीच चला गया। वहां जमीन पर एक बड़ा गोल निशान बना था। उसके चारों ओर सात खाली स्थान थे। लेकिन एक स्थान बाकी छह से अलग था। विराज ने शौर्य की ओर देखा। "वहां खड़े हो जाओ।" शौर्य ने उस खाली स्थान को देखा। "क्यों?" "क्योंकि यही कारण है कि तुम्हारी मां ने तुम्हें यहां भेजा था।" शौर्य ने धीरे से कदम बढ़ाया। जैसे ही उसने वृत्त में प्रवेश किया, जमीन हल्की-सी कांपी। काला मोती गर्म हो उठा। फिर सातों खाली स्थानों में से केवल एक स्थान चमका। शौर्य का। विराज पीछे हट गया। आर्यन ने अपनी सांस रोक ली। गुफा की दीवारों पर एक के बाद एक चित्र उभरने लगे। पहला चित्र। एक महिला। शौर्य की मां। दूसरा चित्र। आर्यन की मां। तीसरा। विराज। चौथा। एक बच्चा। शौर्य। पांचवां चित्र धुंधला था। चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उसके पीछे सात वृत्त थे। शौर्य ने उसे देखा। "यही वह शक्ति है?" विराज ने कहा, "शायद।" अचानक पांचवां चित्र बदल गया। अब उसमें एक दरवाजा था। दरवाजे के सामने शौर्य की मां खड़ी थीं। उनके हाथ में वही चांदी का लॉकेट था। वह पीछे मुड़कर किसी को देख रही थीं। फिर चित्र में आर्यन की मां दिखाई दीं। उन्होंने कुछ कहा। लेकिन आवाज नहीं थी। शौर्य ने ध्यान से देखा। फिर उसे समझ आया। आर्यन की मां के हाथ में एक बच्चा था। आर्यन। और दूसरी तरफ शौर्य की मां के हाथ में वह था। दोनों महिलाएं कुछ देर तक एक-दूसरे को देखती रहीं। फिर उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे की ओर बढ़ाया। शौर्य की सांस अटक गई। वह आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन चित्र वहीं रुक गया। विराज ने कहा, "यह हिस्सा कभी किसी ने नहीं देखा था।" आर्यन ने पूछा, "क्या?" विराज ने कहा, "तुम दोनों को उस रात अलग-अलग नहीं किया गया था।" "तुम दोनों को एक साथ बचाने की योजना थी।" आर्यन ने धीरे से शौर्य की तरफ देखा। शौर्य भी उसकी तरफ देख रहा था। दोनों के बीच कई वर्षों से मौजूद एक अनकहा सवाल अचानक और गहरा हो गया। विराज ने कहा, "लेकिन योजना पूरी नहीं हुई।" "क्यों?" गुफा में अचानक वही आवाज गूंजी। "क्योंकि मैंने उसे रोक दिया था।" सब जम गए। वह आवाज कहीं बहुत दूर से आ रही थी। लेकिन स्पष्ट थी। विराज का चेहरा सफेद पड़ गया। आर्यन ने पूछा, "कौन है?" कोई उत्तर नहीं आया। फिर वही आवाज आई। "विराज।" विराज ने आंखें बंद कर लीं। शौर्य ने देखा कि उसके हाथ कांप रहे थे। "तुमने कहा था कि तुम्हें उसका नाम नहीं पता।" विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। आवाज फिर आई। "तुमने झूठ बोला।" आर्यन ने विराज की तरफ देखा। "तुम इसे जानते हो।" विराज ने बहुत धीमे स्वर में कहा, "हाँ।" शौर्य ने पूछा, "कौन है?" विराज ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में पछतावा था। "तुम्हारी मां ने जिस व्यक्ति से तुम्हें बचाया था..." वह कुछ पल रुका। "...वही व्यक्ति अब तुम्हें वापस बुला रहा है।" गुफा में फिर शांति फैल गई। शौर्य की मुट्ठी में काला मोती जलने लगा। इस बार उसने आवाज सुनी। लेकिन वह आवाज उसकी मां की नहीं थी। वह एक पुरुष की आवाज थी। बहुत धीमी। बहुत शांत। और केवल एक वाक्य। "शौर्य, तुम्हारी मां ने तुम्हें मुझसे नहीं बचाया था।" "उन्होंने तुम्हें मेरे लिए तैयार किया था।" शौर्य की आंखें फैल गईं। आर्यन तुरंत उसके पास आया। "क्या हुआ?" शौर्य ने उत्तर नहीं दिया। वह केवल उस अंधेरे दरवाजे को देख रहा था जो गुफा के दूसरी तरफ धीरे-धीरे खुल रहा था। विराज ने पीछे हटते हुए कहा, "हमें यहां से जाना होगा।" आर्यन ने पूछा, "क्यों?" विराज ने पहली बार अपना डर छिपाने की कोशिश नहीं की। "क्योंकि अब उसे पता चल गया है कि तुम यहां हो।" और अगले ही क्षण गुफा के भीतर सभी रोशनियां एक साथ बुझ गईं।

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