Chapter 27 of 30
मां की आखिरी निशानी
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सुरंग के भीतर कदमों की आवाज धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।
विराज सबसे आगे चल रहा था।
उसके पीछे आर्यन था।
फिर नीरिका।
और सबसे पीछे शौर्य।
शौर्य की मुट्ठी अब भी बंद थी।
उसके भीतर काला मोती शांत पड़ा था।
कुछ देर पहले उसी मोती से उसे एक आवाज सुनाई दी थी।
मत आना।
वह आवाज इतनी परिचित थी कि शौर्य के भीतर कहीं बहुत गहराई में कुछ टूट-सा गया था।
उसे अपनी मां की आवाज याद थी।
बहुत धुंधली।
बहुत पुरानी।
लेकिन वह आवाज उसी जैसी थी।
फिर भी उसने किसी से कुछ नहीं कहा।
उसे डर था कि अगर उसने यह बात आर्यन को बताई, तो आर्यन शायद उसे आगे बढ़ने से रोक देगा।
और इस समय शौर्य रुकना नहीं चाहता था।
इतने वर्षों से उसके जीवन में उसकी मां की केवल अधूरी यादें थीं।
अब पहली बार उसे लगा था कि शायद उन यादों के पीछे कोई वास्तविक उत्तर मौजूद है।
वह उत्तर चाहे जितना कठिन क्यों न हो।
सुरंग धीरे-धीरे नीचे जा रही थी।
हर कुछ कदम पर दीवारों में पुराने पत्थर के दीपक लगे थे।
लेकिन उनमें आग नहीं थी।
फिर भी जब विराज उनके पास से गुजरता, एक-एक करके उनमें हल्की सफेद रोशनी जल उठती।
शौर्य यह देखकर कुछ देर तक चुपचाप चलता रहा।
आखिर उसने पूछा, "ये दीपक तुम्हें पहचानते हैं?"
विराज ने बिना पीछे देखे कहा, "नहीं।"
"फिर?"
"जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं, उसे तुम्हारी मां ने बनाया था।"
शौर्य कुछ क्षण चुप रहा।
"मेरी मां ने?"
"हाँ।"
"कब?"
विराज ने उत्तर देने से पहले कुछ पल सोचा।
"तुम्हारे जन्म से बहुत पहले।"
शौर्य ने फिर पूछा, "क्यों?"
विराज की चाल धीमी हो गई।
"क्योंकि उन्हें पता था कि एक दिन यह रास्ता तुम्हें यहां तक लाएगा।"
शौर्य रुक गया।
विराज भी रुक गया।
आर्यन ने पीछे मुड़कर देखा।
शौर्य ने पूछा, "मेरी मां को कैसे पता था कि मैं यहां आऊंगा?"
विराज ने उसकी आंखों में देखा।
"उन्हें भविष्य दिखाई नहीं देता था।"
"फिर?"
"वह केवल संभावनाएं देख सकती थीं।"
आर्यन ने बीच में पूछा, "तुमने मुझे यह कभी नहीं बताया।"
विराज ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि उस समय तुम्हें जानने की जरूरत नहीं थी।"
आर्यन के चेहरे पर नाराजगी आई।
"और अब है?"
"अब बहुत देर हो चुकी है।"
आर्यन कुछ बोलने वाला था, लेकिन शौर्य ने उसे रोक दिया।
"उसे बोलने दो।"
आर्यन शांत हो गया।
विराज फिर आगे बढ़ा।
कुछ कदम बाद उसने कहा, "तुम्हारी मां जानती थीं कि सातवां बंधन एक दिन फिर सक्रिय होगा।"
"लेकिन उन्हें नहीं पता था कि वह तुम्हें चुनेगा।"
शौर्य ने पूछा, "तो फिर जन्म-रात्रि में क्या हुआ?"
विराज कुछ देर चुप रहा।
"जिस प्रक्रिया के लिए हम वहां गए थे, उसका उद्देश्य तुम्हारे भीतर सातवें बंधन को डालना नहीं था।"
शौर्य के कदम धीमे हो गए।
"तो उद्देश्य क्या था?"
विराज ने कहा, "तुम्हें उससे बचाना।"
आर्यन तुरंत बोला, "लेकिन बंधन तो उसके भीतर चला गया।"
"हाँ।"
"फिर बचाने की कोशिश क्यों?"
विराज ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि बंधन अपने आप तुम्हारे पास नहीं आया था।"
आर्यन चुप हो गया।
विराज ने आगे कहा, "जन्म-रात्रि में जो शक्ति तुम्हारे आसपास आई थी, वह सातवां बंधन नहीं था।"
शौर्य ने धीरे से पूछा, "तो वह क्या थी?"
विराज ने कहा, "उसका नाम हमें तब भी नहीं पता था।"
"हमने उसे केवल बाहरी शक्ति कहा था।"
"वह सातवें बंधन को खोज रही थी।"
शौर्य ने माला को देखा।
"और वह बंधन मेरी मां के पास था?"
विराज ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"उस समय वह आर्यन की मां के पास था।"
आर्यन ने उसकी तरफ देखा।
"तो फिर मेरी मां ने उसे शौर्य के पास क्यों पहुंचने दिया?"
विराज ने कहा, "उन्होंने नहीं पहुंचाया।"
"उस रात परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हो गई थीं।"
सुरंग में कुछ देर तक केवल कदमों की आवाज सुनाई देती रही।
फिर वे एक बड़े पत्थर के दरवाजे के सामने पहुंच गए।
विराज रुक गया।
उसने अपनी हथेली दरवाजे पर रखी।
पत्थर पर हल्की सफेद रोशनी फैली।
फिर दरवाजे पर एक वृत्त उभरा।
उसके भीतर सात छोटे बिंदु दिखाई दिए।
विराज ने शौर्य की तरफ देखा।
"अपना हाथ आगे करो।"
शौर्य ने कुछ पल उसे देखा।
फिर उसने हाथ आगे कर दिया।
विराज ने उसके हाथ को दरवाजे के बीच रखा।
कुछ नहीं हुआ।
एक पल।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
अचानक काला मोती गर्म हो गया।
शौर्य ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।
लेकिन देर हो चुकी थी।
दरवाजे पर सातों बिंदु एक साथ चमक उठे।
भारी आवाज के साथ पत्थर पीछे हटने लगा।
दरवाजे के पीछे एक गोल कमरा था।
कमरे के बीच एक छोटा पत्थर का मंच था।
उस पर एक कपड़ा रखा था।
सफेद।
बहुत पुराना।
विराज धीरे-धीरे अंदर गया।
उसने कपड़ा उठाया।
नीचे एक छोटी लकड़ी की पेटी थी।
आर्यन आगे बढ़ा।
"यह क्या है?"
विराज ने कहा, "तुम्हारी मां की आखिरी निशानी।"
आर्यन कुछ पल उसे देखता रहा।
उसने पेटी को छूने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन विराज ने रोक दिया।
"पहले शौर्य।"
आर्यन ने उसकी तरफ देखा।
विराज ने कहा, "यह उसके लिए छोड़ी गई है।"
शौर्य धीरे-धीरे आगे आया।
उसके कदम बहुत धीमे थे।
जैसे वह किसी ऐसी चीज के पास जा रहा हो जिसका उत्तर पाने की इच्छा भी थी और डर भी।
उसने पेटी के सामने घुटने टेक दिए।
पेटी पर कोई ताला नहीं था।
उसने ढक्कन उठाया।
अंदर एक कपड़ा था।
कपड़े के ऊपर एक छोटा चांदी का लॉकेट रखा था।
शौर्य ने उसे देखते ही पहचान लिया।
उसकी आंखें फैल गईं।
"यह..."
उसकी आवाज रुक गई।
आर्यन ने पूछा, "तुम इसे पहचानते हो?"
शौर्य ने सिर हिलाया।
"मां के पास था।"
वह लॉकेट उसने बचपन में कई बार देखा था।
उसे पूरी तरह याद नहीं था कि उसकी मां उसे कब पहनती थीं।
लेकिन उस छोटे-से चांदी के लॉकेट की आकृति उसकी स्मृति में कहीं बहुत गहराई से बसी हुई थी।
उसने उसे उठाया।
जैसे ही उसकी उंगलियां लॉकेट से मिलीं, कमरे की हवा बदल गई।
हल्की गर्मी उसके हाथ से होती हुई पूरे शरीर में फैल गई।
उसने आंखें बंद कर लीं।
और इस बार कोई आवाज नहीं आई।
केवल एक दृश्य।
एक कमरा।
एक महिला।
उसकी मां।
वह एक खिड़की के पास बैठी थीं।
उनकी गोद में शौर्य था।
वह बहुत छोटा था।
शायद जन्म के कुछ महीने बाद का।
उसकी मां उसके माथे पर हाथ फेर रही थीं।
उनकी आंखों में आंसू थे।
वह धीरे से कह रही थीं, "एक दिन तुम मुझसे पूछोगे कि मैं कहां गई थी।"
दृश्य में शौर्य ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
वह सो रहा था।
उसकी मां मुस्कुराईं।
"और शायद उस दिन मैं तुम्हारे सामने नहीं रहूंगी।"
उनकी उंगलियां उसके बालों में धीरे-धीरे चलती रहीं।
"लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि मैंने तुम्हें छोड़ दिया।"
शौर्य की आंखों से आंसू निकल आए।
दृश्य आगे बढ़ा।
अब कमरे में कोई दूसरा व्यक्ति था।
आर्यन की मां।
दोनों महिलाएं आमने-सामने बैठी थीं।
आर्यन की मां ने कहा, "तुम्हें जाना होगा।"
शौर्य की मां ने पूछा, "कितने समय के लिए?"
"जब तक यह सुरक्षित न हो जाए।"
"और अगर मैं वापस न आई?"
आर्यन की मां ने कुछ नहीं कहा।
शौर्य की मां ने शौर्य की ओर देखा।
"तब इसे सच मत बताना।"
आर्यन की मां ने पूछा, "कब तक?"
"जब तक यह खुद पूछने की उम्र तक न पहुंच जाए।"
आर्यन की मां ने सिर झुका लिया।
फिर शौर्य की मां ने एक बात कही।
"और अगर कभी यह सातवें बंधन तक पहुंच जाए..."
आर्यन की मां ने पूछा, "तब?"
उन्होंने उत्तर दिया।
"इसे यह मत कहना कि मैंने इसे बचाया था।"
आर्यन की मां ने चौंककर देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि इसे अपने जीवन को किसी ऋण की तरह नहीं जीना चाहिए।"
दृश्य धीरे-धीरे धुंधला हो गया।
शौर्य ने आंखें खोल दीं।
उसके हाथ में लॉकेट था।
आर्यन उसके पास खड़ा था।
"क्या देखा?"
शौर्य ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने लॉकेट को अपनी हथेली में बंद कर लिया।
"मां।"
आर्यन कुछ नहीं बोला।
शौर्य ने धीरे से कहा, "वह मुझे छोड़कर नहीं गई थीं।"
विराज ने आंखें बंद कर लीं।
जैसे यह बात सुनकर उसके भीतर भी कोई पुराना घाव खुल गया हो।
शौर्य ने उसकी तरफ देखा।
"तुम जानते थे।"
विराज ने कहा, "हाँ।"
"फिर तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि तुम्हें यह बात किसी और की आवाज में नहीं सुननी चाहिए थी।"
शौर्य ने पूछा, "किसकी आवाज में?"
विराज ने कहा, "अपनी मां की।"
कमरे में फिर शांति छा गई।
आर्यन ने पेटी के भीतर देखा।
वहां एक और चीज थी।
एक मुड़ा हुआ पत्र।
उस पर कोई नाम नहीं लिखा था।
आर्यन ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन शौर्य ने कहा, "रुको।"
उसने पत्र उठा लिया।
कागज बहुत पुराना था।
उसने धीरे से उसे खोला।
पहली पंक्ति पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
पत्र में लिखा था।
"शौर्य के लिए।"
उसका दिल तेज धड़कने लगा।
उसने आगे पढ़ना शुरू किया।
"अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुमने वह रास्ता चुन लिया है जिसे मैंने तुम्हारे लिए कभी नहीं चुना था।"
शौर्य कुछ क्षण रुक गया।
फिर आगे पढ़ा।
"मैं चाहती थी कि तुम्हारा जीवन सामान्य हो।"
"लेकिन कुछ जन्म अपने साथ ऐसी जिम्मेदारियां लेकर आते हैं जिन्हें मां अपने बच्चे से छिपा तो सकती है, मिटा नहीं सकती।"
शौर्य की आंखें धुंधली होने लगीं।
वह आगे पढ़ता रहा।
"तुम्हें सातवें बंधन से डरना नहीं है।"
"लेकिन उस व्यक्ति पर भी तुरंत विश्वास मत करना जो तुम्हें इसे समझाने का दावा करे।"
शौर्य की नजर अनायास विराज पर चली गई।
विराज शांत खड़ा था।
पत्र में अगली पंक्ति थी।
"क्योंकि सातवें बंधन को समझने वाले बहुत कम हैं।"
"और उनमें से कुछ उसे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।"
आर्यन ने पूछा, "क्या आगे कुछ है?"
शौर्य ने पढ़ना जारी रखा।
"आर्यन पर विश्वास करना।"
आर्यन ने जैसे सांस रोक ली।
शौर्य ने अगली पंक्ति पढ़ी।
"लेकिन उसकी मां की हर बात पर नहीं।"
आर्यन का चेहरा गंभीर हो गया।
शौर्य ने पत्र नीचे कर दिया।
"यह क्यों लिखा?"
विराज ने कहा, "क्योंकि वह जानती थीं कि तुम्हें एक दिन चुनाव करना पड़ेगा।"
"किसके बीच?"
विराज ने उत्तर नहीं दिया।
शौर्य ने फिर पत्र उठाया।
अंतिम पंक्तियां थीं।
"जब तुम्हें लगे कि कोई तुम्हें तुम्हारी मां तक ले जा सकता है, तो उससे पहले यह पूछना कि वह तुम्हें वहां क्यों ले जाना चाहता है।"
"क्योंकि कभी-कभी मंजिल से ज्यादा खतरनाक वह व्यक्ति होता है जो तुम्हें वहां तक लेकर जाता है।"
पत्र यहीं समाप्त हो गया।
शौर्य ने धीरे से उसे मोड़ दिया।
कमरे में मौजूद तीनों लोगों के बीच एक लंबी चुप्पी फैल गई।
आर्यन ने विराज की तरफ देखा।
"तुम्हें यह पत्र पता था?"
विराज ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"तुम झूठ बोल रहे हो?"
"नहीं।"
शौर्य ने पहली बार विराज की आंखों में ध्यान से देखा।
उसे वहां झूठ नहीं दिखा।
लेकिन डर जरूर दिखाई दे रहा था।
शौर्य ने पूछा, "तुम किससे डरते हो?"
विराज ने उत्तर देने में काफी समय लिया।
फिर उसने कहा, "उससे जिसने तुम्हारी मां को आखिरी बार देखा था।"
"कौन?"
विराज ने दरवाजे की तरफ देखा।
"मुझे नहीं पता।"
आर्यन ने कहा, "तुम फिर वही कह रहे हो।"
विराज ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि यही सच है।"
"मुझे केवल इतना पता है कि तुम्हारी मां जिस रात गईं, उसके बाद मुझे एक संदेश मिला था।"
"क्या संदेश?"
विराज ने धीरे से कहा।
"सिर्फ तीन शब्द।"
शौर्य ने पूछा, "क्या?"
विराज ने उसकी तरफ देखा।
"बंध रुका नहीं।"
शौर्य के हाथ से पत्र लगभग गिर गया।
"इसका मतलब?"
विराज ने कहा, "हमने सोचा था कि जन्म-रात्रि में जो कुछ हुआ, वह वहीं समाप्त हो गया।"
"लेकिन वह केवल शुरुआत थी।"
"सातवां बंधन तुम्हारे भीतर जागा था।"
"और उसी के साथ किसी और चीज की नींद भी टूटी थी।"
शौर्य ने अपनी हथेली में बंद काले मोती को देखा।
वह अब फिर गर्म हो रहा था।
बहुत धीरे।
जैसे किसी दूर की धड़कन के साथ।
धक।
धक।
धक।
शौर्य ने आंखें बंद कर लीं।
उसे फिर वही आवाज सुनाई दी।
इस बार केवल एक शब्द।
"मां।"
उसकी आंखें तुरंत खुल गईं।
वह चारों ओर देखने लगा।
आर्यन ने पूछा, "क्या हुआ?"
शौर्य ने कुछ नहीं कहा।
उसने पहली बार महसूस किया कि आवाज बाहर से नहीं आई थी।
वह उसके भीतर से आई थी।
और वह आवाज उसे किसी जगह की ओर नहीं बुला रही थी।
वह उसे किसी व्यक्ति की ओर बुला रही थी।
उसकी मां की ओर।
लेकिन अगर उसकी मां अब भी जीवित थीं, तो सबसे बड़ा सवाल यह नहीं था कि वह कहां थीं।
सबसे बड़ा सवाल यह था कि वह अब तक शौर्य के सामने क्यों नहीं आई थीं।
और शायद उस सवाल का उत्तर सातवें बंधन से भी ज्यादा खतरनाक था।