Chapter 25 of 30

वह रात जब सब बदला

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रात बहुत शांत थी। आकाश में बादल थे और चांद कभी दिखाई देता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता। पहाड़ों के बीच बनी वह पुरानी हवेली बाकी दुनिया से बिल्कुल अलग लग रही थी। हवेली के भीतर लगभग सभी कमरे अंधेरे में डूबे हुए थे। केवल सबसे अंदर वाले कमरे में एक दीपक जल रहा था। उस कमरे के बीचोंबीच शौर्य की मां खड़ी थीं। उनकी बाहों में एक नवजात बच्चा था। शौर्य। उसकी आंखें बंद थीं। उसकी सांस बहुत धीमी थी। वह दुनिया में आए अभी कुछ ही समय हुआ था। लेकिन उसकी मां के चेहरे पर मां बनने की खुशी जितनी थी, उससे कहीं ज्यादा चिंता थी। वह बार-बार बच्चे के चेहरे को देख रही थीं। फिर उसकी छोटी-सी हथेली को अपनी उंगली से छूतीं। शौर्य ने अपनी उंगलियां हल्की-सी मोड़ीं। उसकी मां के चेहरे पर तुरंत एक कमजोर मुस्कान आई। "तुम आ गए।" उनकी आवाज बहुत धीमी थी। "इतनी देर कर दी।" बच्चे ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह केवल शांत था। उसकी मां ने उसे अपने सीने से लगा लिया। कमरे के दूसरे कोने में आर्यन खड़ा था। उसकी उम्र तब आज से बहुत कम थी। लेकिन उसके चेहरे पर उस रात किसी बच्चे जैसी सहजता नहीं थी। वह लगातार दरवाजे की तरफ देख रहा था। कुछ देर बाद उसने पूछा, "वह अभी तक नहीं आईं?" शौर्य की मां ने सिर हिलाया। "नहीं।" आर्यन ने खिड़की की तरफ देखा। बाहर हवा तेज हो रही थी। "उन्हें आ जाना चाहिए था।" शौर्य की मां ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया। आर्यन ने उनकी तरफ देखा। "आप डरी हुई हैं।" शौर्य की मां ने मुस्कुराने की कोशिश की। "नहीं।" आर्यन ने धीरे से कहा, "आप भी झूठ बोलती हैं।" उनकी मुस्कान गायब हो गई। कुछ क्षण तक वह बच्चे को देखती रहीं। फिर उन्होंने कहा, "आर्यन, अगर आज रात कुछ भी हो जाए..." आर्यन ने तुरंत उनकी बात काट दी। "कुछ नहीं होगा।" "तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।" "क्यों?" "क्योंकि कभी-कभी हमें उस चीज के लिए भी तैयार रहना पड़ता है जिसे हम नहीं चाहते।" आर्यन कुछ कहने वाला था। तभी दरवाजे के बाहर कदमों की आवाज आई। दोनों चुप हो गए। कदम धीरे-धीरे करीब आ रहे थे। फिर दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई। ठक। ठक। ठक। आर्यन आगे बढ़ा। उसने दरवाजा खोला। सामने एक महिला खड़ी थीं। आर्यन की मां। उनके चेहरे पर थकान थी। लेकिन उनकी आंखें पूरी तरह जाग रही थीं। उन्होंने कमरे में प्रवेश करते ही सबसे पहले बच्चे को देखा। उनकी नजर कुछ क्षण शौर्य पर टिकी रही। फिर उन्होंने शौर्य की मां की तरफ देखा। "समय बहुत कम है।" आर्यन ने पूछा, "क्या हुआ?" उसकी मां ने उसकी तरफ देखा। "तुम्हें बाहर जाना होगा।" आर्यन कुछ समझ नहीं पाया। "क्यों?" "क्योंकि आगे जो होगा, वह तुम्हें नहीं देखना चाहिए।" आर्यन ने तुरंत सिर हिलाया। "नहीं।" "मैं बाहर नहीं जाऊंगा।" उसकी मां ने उसकी आंखों में देखा। "आर्यन।" उस आवाज में ऐसा अधिकार था कि आर्यन कुछ क्षण चुप हो गया। लेकिन फिर उसने कहा, "मैं भागने वाला नहीं हूं।" उसकी मां के चेहरे पर हल्की उदासी आई। "मैं जानती हूं।" "इसीलिए तुम्हें बाहर भेज रही हूं।" आर्यन ने कुछ नहीं कहा। शौर्य की मां ने धीरे से बच्चे को अपनी बाहों में थोड़ा ऊपर उठाया। "इसे देखो।" आर्यन ने बच्चे की तरफ देखा। वह बहुत छोटा था। इतना छोटा कि उसे देखकर आर्यन के चेहरे पर कुछ पल के लिए कठोरता टूट गई। उसने धीरे से कहा, "यह इतना शांत क्यों है?" शौर्य की मां ने कहा, "क्योंकि अभी इसे कुछ पता नहीं है।" "क्या?" "दुनिया के बारे में।" आर्यन चुप रहा। उसकी मां ने धीरे से कहा, "और यही इसकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।" बाहर अचानक हवा तेज हो गई। दीपक की लौ कांपी। शौर्य की मां ने तुरंत कमरे के फर्श की ओर देखा। वहां पहले से बना हुआ एक बड़ा वृत्त था। उसके चारों ओर सात छोटे चिन्ह बने थे। आर्यन की नजर उन चिन्हों पर पड़ी। वह तुरंत समझ गया कि कुछ असाधारण होने वाला है। "मां।" उसकी मां ने कहा, "बाहर जाओ।" "लेकिन..." "अभी।" आर्यन ने शौर्य की मां की तरफ देखा। उन्होंने भी सिर हिला दिया। आर्यन धीरे-धीरे दरवाजे की ओर चला। लेकिन दरवाजे तक पहुंचने से पहले वह रुक गया। उसने पीछे मुड़कर देखा। अपनी मां को। फिर शौर्य की मां को। फिर उस बच्चे को। उसने पूछा, "क्या यह सुरक्षित रहेगा?" उसकी मां ने उत्तर दिया। "मैं पूरी कोशिश करूंगी।" आर्यन ने कहा, "आपने पूरी बात नहीं बताई।" उसकी मां ने नजरें झुका लीं। "कुछ बातें सही समय से पहले बताने पर खतरा बन जाती हैं।" आर्यन कुछ और पूछना चाहता था। लेकिन उसकी मां ने दरवाजा खोल दिया। "जाओ।" आर्यन बाहर चला गया। दरवाजा धीरे से बंद हो गया। अब कमरे में केवल दो महिलाएं और एक नवजात बच्चा था। कुछ क्षण तक कोई नहीं बोला। शौर्य की मां ने पूछा, "क्या वह सच जानता है?" आर्यन की मां ने सिर हिलाया। "नहीं।" "उसे कब बताओगी?" "जब वह इतना मजबूत हो जाए कि सच उसे तोड़ न सके।" शौर्य की मां ने बच्चे को देखा। "और यह?" आर्यन की मां ने उसकी तरफ देखा। "इसके बारे में?" "यह कब जानेगा?" आर्यन की मां ने कुछ देर तक बच्चे को देखा। "शायद कभी नहीं।" शौर्य की मां की आंखें नम हो गईं। "तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।" आर्यन की मां ने धीमे से कहा, "कभी-कभी किसी बच्चे को बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि उसे कुछ सच्चाइयों से दूर रखा जाए।" कमरे में फिर शांति फैल गई। कुछ समय बाद शौर्य की मां ने पूछा, "क्या बंधन तैयार है?" आर्यन की मां ने सिर हिलाया। "हाँ।" "और अगर प्रक्रिया असफल हुई?" "तो हम उसे रोक देंगे।" "और अगर वह सफल हुई?" आर्यन की मां ने बच्चे की ओर देखा। "तो वह जीवन भर अकेला नहीं रहेगा।" शौर्य की मां ने उसकी तरफ देखा। "तुमने यह बात पहले नहीं कही थी।" आर्यन की मां ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने फर्श पर बने सात चिन्हों के बीच कदम रखा। उनके हाथ में वही सात मोतियों वाली माला थी। उस समय सभी मोती सफेद थे। उन्होंने माला को फर्श के वृत्त के बीच रखा। फिर दोनों हाथ जोड़कर आंखें बंद कर लीं। कमरे की हवा धीरे-धीरे भारी होने लगी। दीपक की लौ सीधी हो गई। बाहर हवा की आवाज बंद हो गई। शौर्य की मां ने बच्चे को अपनी बाहों में और कसकर पकड़ लिया। तभी दरवाजा खुला। आर्यन फिर अंदर आ गया। उसकी मां ने आंखें खोलीं। "मैंने तुम्हें बाहर जाने को कहा था।" आर्यन ने कहा, "मैं जा नहीं सका।" उसकी मां ने गहरी सांस ली। "तो जो देखोगे, उसे कभी किसी से मत कहना।" आर्यन ने सिर हिलाया। वह कमरे के कोने में खड़ा हो गया। तभी दूसरी आवाज सुनाई दी। दरवाजे के बाहर कोई और था। एक व्यक्ति। उसका चेहरा कपड़े से ढका हुआ था। वह धीरे-धीरे कमरे में आया। आर्यन ने उसे देखते ही पहचान लिया। "विराज?" विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने सीधे आर्यन की मां की तरफ देखा। "समय आ गया है।" आर्यन की मां ने कहा, "अभी नहीं।" विराज ने कहा, "अब इसे और टाला नहीं जा सकता।" शौर्य की मां ने पूछा, "क्या बाहर सब सुरक्षित है?" विराज ने सिर हिलाया। "फिलहाल।" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। विराज ने पहली बार उसकी ओर देखा। "तुम्हें यहां नहीं होना चाहिए था।" आर्यन ने कहा, "मैं अपनी मां को अकेला नहीं छोड़ूंगा।" विराज ने कुछ नहीं कहा। आर्यन की मां ने दोनों को देखा। "बस।" उसकी आवाज में कठोरता थी। "आज कोई पुरानी बात नहीं होगी।" विराज ने सिर झुका लिया। वह फर्श के वृत्त के पास गया। उसने अपनी हथेली आगे की। उसकी हथेली पर वही चिन्ह था जिसे शौर्य ने अपनी स्मृति में देखा था। तीन रेखाएं। और नीचे एक बिंदु। आर्यन ने उसे देखा। "यह चिन्ह..." उसकी मां ने तुरंत कहा, "आर्यन।" वह चुप हो गया। विराज ने शौर्य की मां की ओर देखा। "क्या आप तैयार हैं?" उन्होंने बच्चे को देखा। कुछ क्षण तक उनकी आंखों में आंसू थे। फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया। "हाँ।" उन्होंने बच्चे को वृत्त के बीच रखा। शौर्य बहुत शांत था। उसकी आंखें बंद थीं। आर्यन की मां ने माला उठा ली। उन्होंने उसके सातों मोतियों को अपनी हथेली में रखा। फिर उन्होंने एक-एक करके मंत्र जैसे शब्द बोलने शुरू किए। उनकी आवाज बहुत धीमी थी। लेकिन कमरे में मौजूद हर व्यक्ति उन्हें साफ सुन सकता था। पहला मोती चमका। फिर दूसरा। फिर तीसरा। आर्यन की सांस रुक गई। चौथा मोती चमका। पांचवां। छठा। सातवां मोती चमकने ही वाला था कि अचानक शौर्य रोने लगा। शौर्य की मां ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन आर्यन की मां ने उसे रोक दिया। "अभी नहीं।" "वह डर रहा है।" "नहीं।" आर्यन की मां ने बच्चे की तरफ देखा। "वह किसी और चीज को महसूस कर रहा है।" शौर्य की मां रुक गईं। कमरे में अचानक बहुत ठंड हो गई। विराज पीछे हट गया। "यह अपेक्षित नहीं था।" आर्यन की मां ने उसकी तरफ देखा। "तुमने क्या महसूस किया?" विराज ने कहा, "कुछ और है।" "क्या?" विराज ने कमरे के ऊपर की ओर देखा। "कोई हमें देख रहा है।" आर्यन ने तुरंत चारों ओर देखा। लेकिन वहां कोई नहीं था। फिर शौर्य के शरीर के आसपास हल्की नीली रोशनी बनने लगी। आर्यन की मां का चेहरा बदल गया। उन्होंने माला अपनी मुट्ठी में कस ली। "नहीं।" शौर्य की मां ने पूछा, "क्या हुआ?" आर्यन की मां ने कहा, "बंधन यहां नहीं होना चाहिए।" विराज ने पूछा, "फिर कहां है?" उन्होंने उत्तर नहीं दिया। उनकी नजर बच्चे पर थी। नीली रोशनी धीरे-धीरे शौर्य की छाती के पास जमा होने लगी। फिर एक पल के लिए वह रोशनी ऊपर उठी। कमरे की छत के पास जाकर ठहर गई। और वहां एक आकृति दिखाई दी। बहुत धुंधली। चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उसकी उपस्थिति इतनी शक्तिशाली थी कि सभी पीछे हट गए। आर्यन की मां ने तुरंत कहा, "इसे मत छूना।" विराज ने पूछा, "आप इसे पहचानती हैं?" उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। वह आकृति धीरे-धीरे नीचे आने लगी। शौर्य की मां ने बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। आर्यन अपनी मां के सामने खड़ा हो गया। "मैं इसे रोकूंगा।" उसकी मां ने कहा, "नहीं।" "मां।" "आर्यन, पीछे हटो।" लेकिन आर्यन नहीं हटा। आकृति और करीब आई। फिर अचानक उसने अपना हाथ शौर्य की ओर बढ़ाया। उसकी उंगलियां बच्चे की हथेली से कुछ इंच दूर रुक गईं। शौर्य शांत हो गया। उसका रोना बंद हो गया। और उसी क्षण उसके हाथ पर एक बहुत छोटा चिन्ह उभरा। तीन रेखाएं। नीचे एक बिंदु। विराज ने धीमे स्वर में कहा, "यह मेरे चिन्ह जैसा है।" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "तुमने क्या किया?" विराज ने तुरंत कहा, "मैंने कुछ नहीं किया।" आर्यन की मां ने उसकी ओर देखा। उनकी आंखों में पहली बार अविश्वास था। "विराज।" "मैंने कुछ नहीं किया।" "तो यह चिन्ह यहां कैसे आया?" विराज के पास कोई उत्तर नहीं था। आकृति धीरे-धीरे पीछे हट गई। नीली रोशनी समाप्त हो गई। शौर्य फिर शांत हो गया। कमरे में सब कुछ सामान्य लगने लगा। लेकिन अब कुछ बदल चुका था। आर्यन की मां ने माला को देखा। उसका सातवां मोती अब सफेद नहीं था। वह काला हो चुका था। उन्होंने उसे अपनी हथेली में बंद कर लिया। शौर्य की मां ने पूछा, "क्या हुआ?" आर्यन की मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "बंधन ने अपना धारक चुन लिया।" शौर्य की मां ने बच्चे को देखा। "शौर्य?" आर्यन की मां ने सिर हिलाया। "हाँ।" आर्यन ने पूछा, "लेकिन आपने कहा था कि यह मेरे भीतर जाएगा।" उसकी मां ने उसकी तरफ देखा। उनकी आंखों में दर्द था। "मैंने गलत समझा था।" आर्यन की आंखें फैल गईं। "तो अब?" उसकी मां ने बच्चे की ओर देखा। "अब हमें इसे बचाना होगा।" शौर्य की मां ने पूछा, "किससे?" आर्यन की मां ने दरवाजे की तरफ देखा। "उससे जिसने इसे चुना है।" आर्यन ने पूछा, "कौन?" उन्होंने उत्तर नहीं दिया। क्योंकि उसी क्षण दूर कहीं बहुत भारी आवाज हुई। हवेली की दीवारें कांप गईं। विराज खिड़की की तरफ दौड़ा। बाहर आकाश में एक विशाल काली रेखा बन चुकी थी। आर्यन की मां ने तुरंत माला आर्यन के हाथ में रख दी। "इसे संभालकर रखना।" आर्यन ने पूछा, "क्यों?" "क्योंकि अगर मैं वापस नहीं आई..." वह रुक गईं। आर्यन की आंखें भर आईं। "आप वापस आएंगी।" उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा। "मुझे उम्मीद है।" फिर उन्होंने शौर्य की मां की ओर देखा। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में कुछ ऐसा समझा जिसे शब्दों की जरूरत नहीं थी। शौर्य की मां ने बच्चे को उठाया। "हमें जाना होगा।" आर्यन ने पूछा, "कहां?" उसकी मां ने कहा, "जहां यह शक्ति हमें नहीं ढूंढ पाएगी।" आर्यन ने माला को देखा। काला मोती उसकी हथेली में शांत पड़ा था। उसे तब नहीं पता था कि वह छोटी-सी माला आने वाले वर्षों में उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य बनने वाली है। उसे यह भी नहीं पता था कि जिस व्यक्ति पर वह उस रात सबसे ज्यादा भरोसा कर रहा था, वही एक दिन उसके अतीत के सबसे बड़े सवालों के बीच खड़ा मिलेगा। और उसे बिल्कुल नहीं पता था कि शौर्य की जन्म-रात्रि में हुआ यह बंधन केवल शौर्य का भाग्य नहीं बदलने वाला था। यह आर्यन का भाग्य भी बदल चुका था। वर्तमान में लौटने पर शौर्य की आंखें खुलीं। वह अभी भी उसी पत्थर के कमरे में खड़ा था। उसकी हथेली में माला थी। आर्यन सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर कोई रंग नहीं था। शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "तुम्हें यह सब याद था?" आर्यन ने धीरे से कहा, "कुछ हिस्सा।" "और जो आज देखा?" आर्यन ने सिर हिलाया। "वह मुझे भी नहीं पता था।" शौर्य ने माला की तरफ देखा। काला मोती अब भी शांत था। लेकिन अब शौर्य जानता था कि उसकी कहानी उसके जन्म के बाद शुरू नहीं हुई थी। उसकी कहानी उसी रात शुरू हो गई थी। और उस रात वहां केवल चार लोग नहीं थे। एक पांचवीं शक्ति भी मौजूद थी। जिसने शौर्य को चुना था। लेकिन अभी तक उसका नाम किसी को नहीं पता था।

End of Chapter 25

Chapter 25: वह रात जब सब बदला - समंदर का Sikandar | Novel AI Studio