Chapter 24 of 30

तीसरा नाम

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कमरे में अंधेरा था। नीली रोशनी बुझ चुकी थी, लेकिन उसकी हल्की गर्मी अब भी पत्थर की दीवारों में महसूस हो रही थी। शौर्य उसी जगह खड़ा था। उसके हाथ में लकड़ी की वह माला थी। सात मोती। छह हल्के। और बीच में एक काला मोती। उसकी उंगलियां उस काले मोती को छूने से डर रही थीं। उसने धीरे से हाथ पीछे खींच लिया। सामने आर्यन जमीन पर बैठा था। वह कुछ नहीं बोल रहा था। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे वर्षों से जिस सच को वह भूलने की कोशिश करता रहा था, वह अचानक उसके सामने आकर खड़ा हो गया हो। नीरिका कुछ दूरी पर खड़ी थी। उसने अब तक कोई सवाल नहीं पूछा था। शायद इसलिए क्योंकि उसे समझ आ गया था कि इस समय आर्यन के पास सवालों से ज्यादा यादें थीं। काफी देर बाद शौर्य ने धीरे से पूछा, "तुम्हारी मां ने सातवां बंधन अपने पास रखा था?" आर्यन ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं। "हाँ।" "और फिर वह तुम्हारे पास आया?" "हाँ।" "लेकिन उन्होंने कहा था कि उन्होंने उसे तुम्हारे भीतर रखा।" आर्यन ने सिर झुका लिया। "मैंने भी यही समझा था।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "लेकिन अब तुम्हें शक है।" आर्यन ने कुछ देर तक कोई उत्तर नहीं दिया। फिर बोला, "क्योंकि मेरी मां कभी भी बिना वजह आधा सच नहीं बोलती थीं।" "अगर उन्होंने कहा कि बंधन मेरे भीतर आया, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरी शक्ति मेरे भीतर आई।" शौर्य ने पूछा, "तो कुछ हिस्सा बचा था?" "शायद।" "कहां?" आर्यन ने अपनी कलाई पर बने सातवें चिन्ह को देखा। "यही तो मुझे नहीं पता।" कमरे में फिर शांति फैल गई। शौर्य धीरे-धीरे पत्थर की मेज के पास गया। उसने माला को वहां रख दिया। कुछ क्षण तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। फिर काला मोती बहुत हल्के से चमका। एक बार। बस एक बार। लेकिन वह चमक इतनी स्पष्ट थी कि सभी ने उसे देख लिया। नीरिका आगे बढ़ी। "यह अभी भी सक्रिय है।" आर्यन तुरंत खड़ा हो गया। "पीछे हटो।" नीरिका वहीं रुक गई। शौर्य ने पूछा, "क्यों?" आर्यन ने कहा, "क्योंकि यह किसी साधारण वस्तु की प्रतिक्रिया नहीं है।" "यह पहचान रही है।" शौर्य ने पूछा, "किसे?" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "शायद तुम्हें।" शौर्य ने कुछ नहीं कहा। उसने माला को देखा। काला मोती फिर चमका। इस बार थोड़ी देर के लिए। और उसी क्षण शौर्य के मन में एक आवाज आई। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि उसे लगा शायद यह उसके मन की कल्पना है। लेकिन अगले ही क्षण वही आवाज दोबारा सुनाई दी। "इसे अपने पास रखो।" शौर्य का शरीर स्थिर हो गया। उसने तुरंत माला उठाई। आर्यन ने पूछा, "क्या हुआ?" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "इसने मुझसे बात की।" आर्यन के चेहरे पर तनाव आ गया। "क्या कहा?" शौर्य ने उत्तर दिया, "इसे अपने पास रखने को कहा।" आर्यन ने तुरंत सिर हिलाया। "नहीं।" शौर्य चौंका। "क्यों?" "क्योंकि अगर इसने तुमसे बात की है, तो यह सिर्फ तुम्हें पहचान नहीं रही।" "यह तुम्हें बुला रही है।" शौर्य ने माला को देखा। "किसलिए?" आर्यन ने धीमे स्वर में कहा, "यही हमें पता करना है।" वह आगे बढ़ा और माला को ध्यान से देखने लगा। उसकी उंगलियां काले मोती के ऊपर रुकीं। फिर उसने बहुत धीरे से कहा, "यह वही नहीं है।" शौर्य ने पूछा, "क्या?" "मेरी मां की पुरानी माला में यह काला मोती नहीं था।" नीरिका ने तुरंत उसकी तरफ देखा। "तुम्हें पूरा यकीन है?" "हाँ।" आर्यन ने अपनी आंखें बंद कर लीं। "मैंने इसे बचपन से देखा था।" "सात मोती थे।" "सभी सफेद।" शौर्य ने माला को फिर देखा। "तो यह काला मोती बाद में जोड़ा गया?" आर्यन ने सिर हिलाया। "संभव है।" "किसने?" आर्यन ने कोई उत्तर नहीं दिया। शौर्य ने पहली बार उसके चेहरे पर वास्तविक डर देखा। वह डर शक्ति से नहीं था। किसी व्यक्ति से था। "तुम किसी को जानते हो।" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "क्या?" "जिसने यह मोती जोड़ा।" आर्यन चुप रहा। शौर्य ने कहा, "तुम जानते हो।" कुछ पल तक आर्यन ने नजरें नहीं उठाईं। फिर उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, "एक नाम था।" शौर्य ने पूछा, "किसका?" आर्यन ने कहा, "विराज।" नीरिका ने तुरंत पूछा, "विराज कौन?" आर्यन ने दीवार की तरफ देखा। "मेरी मां का शिष्य।" "लेकिन वह तुम्हारा क्या था?" आर्यन कुछ क्षण चुप रहा। "मेरा भाई जैसा।" शौर्य ने पूछा, "और अब?" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "अब मुझे नहीं पता कि वह जीवित भी है या नहीं।" "क्यों?" आर्यन की आंखों में पुरानी याद उभरी। "क्योंकि आखिरी बार जब मैंने उसे देखा था, वह मेरी मां के साथ था।" "और उस रात के बाद मेरी मां गायब हो गईं।" कमरे की हवा अचानक भारी लगने लगी। शौर्य ने धीमे से पूछा, "तुम्हारी मां की मृत्यु नहीं हुई थी?" आर्यन ने सिर हिलाया। "नहीं।" "मुझे कभी उनकी मृत्यु का प्रमाण नहीं मिला।" "बस उनका कमरा खाली मिला था।" शौर्य के हाथ से माला लगभग छूट गई। "तो तुम इतने सालों से..." "उन्हें मृत समझते रहे?" आर्यन ने कहा, "नहीं।" उसने सिर उठाया। "मैंने उन्हें मृत नहीं माना।" "मैंने बस यह मान लिया कि वह वापस नहीं आएंगी।" नीरिका ने धीरे से पूछा, "क्या तुम्हें लगता है कि वह अभी भी जीवित हैं?" आर्यन ने कोई उत्तर नहीं दिया। शौर्य ने माला को देखा। फिर काले मोती पर नजर टिक गई। "अगर वह जीवित हैं..." आर्यन ने उसकी बात पूरी की। "तो संभव है कि उन्होंने ही यह माला यहां छोड़ी हो।" शौर्य ने कहा, "और अगर ऐसा है, तो उन्होंने तुम्हें क्यों नहीं बुलाया?" आर्यन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। वह पत्थर की मेज के पास बैठ गया। उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। कुछ देर तक वह वैसे ही बैठा रहा। फिर उसने कहा, "क्योंकि शायद उन्हें पता था कि मैं उनके पास वापस आऊंगा।" शौर्य ने पूछा, "कब?" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "जब सातवां बंधन जागेगा।" शौर्य का दिल तेज धड़कने लगा। "और वह अब जाग चुका है।" आर्यन ने सिर हिलाया। "हाँ।" "तो वह जानती होंगी कि हम यहां हैं।" "शायद।" "और अगर वह जानती हैं..." शौर्य रुक गया। उसके मन में एक और सवाल आया। "तो मेरी मां?" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसके चेहरे पर कोई भ्रम नहीं था। "तुम्हारी मां इस कहानी की अगली कड़ी नहीं थीं।" शौर्य चुप रहा। आर्यन ने कहा, "वह अलग रास्ते पर थीं।" "लेकिन वही रास्ता सातवें बंधन तक आता था।" शौर्य ने पूछा, "उनका आर्यन की मां से क्या संबंध था?" आर्यन ने बहुत देर बाद उत्तर दिया। "दोनों एक-दूसरे को जानती थीं।" "कितना?" "इतना कि तुम्हारी मां ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल दी थी।" शौर्य ने गहरी सांस ली। अब उसे समझ आने लगा था कि उसकी मां का रहस्य केवल उसके जन्म से जुड़ा नहीं था। उसका संबंध आर्यन के अतीत से भी था। लेकिन रक्त-संबंध के रूप में नहीं। किसी पुराने समझौते के रूप में। आर्यन ने धीरे से कहा, "तुम्हारी मां ने मुझे एक बार कहा था कि अगर सातवां बंधन कभी तुम्हारे पास पहुंचे, तो मुझे तुम्हें सच बताना होगा।" शौर्य ने पूछा, "कौन सा सच?" आर्यन ने उसकी आंखों में देखा। "कि तुम्हारे जन्म की रात मैं अकेला नहीं था।" शौर्य की सांस रुक गई। "वहां कौन था?" आर्यन ने उत्तर देने से पहले बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी। फिर उसने कहा, "तुम्हारी मां।" "मैं।" "और विराज।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "और?" आर्यन ने नजरें झुका लीं। "एक चौथा व्यक्ति।" कमरे में सन्नाटा छा गया। शौर्य ने कहा, "कौन?" आर्यन ने सिर उठाया। "उसका नाम मुझे कभी नहीं बताया गया।" "तुम्हारी मां उसे नाम से नहीं बुलाती थीं।" "वह उसे केवल एक शब्द से बुलाती थीं।" शौर्य ने पूछा, "क्या?" आर्यन ने कहा, "संरक्षक।" नीरिका ने धीरे से कहा, "किसका संरक्षक?" आर्यन ने उसकी ओर देखा। "सातवें बंधन का।" कुछ क्षण कोई नहीं बोला। शौर्य के मन में अचानक एक विचार आया। "क्या वही व्यक्ति मेरे जन्म के समय बंधन को मेरे भीतर ले गया?" आर्यन ने सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता।" "लेकिन इतना जानता हूं कि उसने तुम्हें छुआ था।" शौर्य ने अपनी हथेली देखी। उसे अचानक बचपन की एक धुंधली स्मृति याद आई। एक अजनबी हाथ। बहुत ठंडा। उसकी हथेली पर रखा हुआ। और फिर नीली रोशनी। वह स्मृति इतनी पुरानी थी कि उसने हमेशा उसे सपना समझा था। लेकिन अब वह समझ रहा था। वह सपना नहीं था। वह उसकी सबसे पहली स्मृति थी। शौर्य की उंगलियां कांपने लगीं। आर्यन ने पूछा, "क्या याद आया?" शौर्य ने धीरे से कहा, "एक हाथ।" "किसका?" "पता नहीं।" "लेकिन वह मेरे जन्म के समय मेरे पास था।" आर्यन तुरंत उसके पास आया। "कैसा हाथ?" शौर्य ने आंखें बंद कर लीं। "बहुत ठंडा।" "उंगलियों पर एक चिन्ह था।" आर्यन का चेहरा बदल गया। "कैसा चिन्ह?" शौर्य ने अपनी उंगलियों से हवा में आकृति बनाने की कोशिश की। एक वृत्त। उसके भीतर तीन रेखाएं। और नीचे एक छोटा बिंदु। आर्यन ने वह आकृति देखते ही पीछे कदम रखा। "यह..." उसकी आवाज कांप गई। शौर्य ने पूछा, "तुम इसे जानते हो?" आर्यन ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। नीरिका ने पूछा, "आर्यन?" आर्यन ने धीरे से कहा, "यह मेरी मां का चिन्ह नहीं है।" "यह सातवें बंधन का भी मूल चिन्ह नहीं है।" शौर्य ने पूछा, "तो किसका है?" आर्यन ने उस आकृति को देखते हुए कहा, "विराज का।" कमरे की हवा जैसे अचानक जम गई। शौर्य ने माला को कसकर पकड़ लिया। "विराज ने मुझे छुआ था?" आर्यन ने सिर हिलाया। "अगर तुम्हारी याद सही है, तो हां।" "लेकिन क्यों?" आर्यन ने कोई उत्तर नहीं दिया। क्योंकि उसके चेहरे पर पहली बार एक ऐसा भाव आया था जो शौर्य ने पहले कभी नहीं देखा था। पछतावा नहीं। डर नहीं। बल्कि विश्वास टूटने का भाव। "विराज मेरी मां का सबसे भरोसेमंद शिष्य था।" "मैंने उस पर अपने भाई से ज्यादा भरोसा किया।" "और अगर वही तुम्हारे जन्म के समय वहां था..." आर्यन की आवाज धीमी हो गई। "तो शायद मैं वर्षों से गलत व्यक्ति पर शक करता रहा हूं।" शौर्य ने पूछा, "तुम किस पर शक करते थे?" आर्यन ने उसकी तरफ देखा। "अपने ऊपर।" कुछ पल वह चुप रहा। "मुझे लगता रहा कि तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं।" "लेकिन शायद मैं सिर्फ उस योजना का एक हिस्सा था जिसे किसी और ने बहुत पहले शुरू किया था।" शौर्य ने माला को देखा। काला मोती अब चमक नहीं रहा था। लेकिन उसके भीतर से हल्की गर्मी निकल रही थी। जैसे वह किसी उत्तर का इंतजार कर रहा हो। शौर्य ने धीरे से उसे अपनी हथेली में रख लिया। इस बार कोई आवाज नहीं आई। कोई रोशनी नहीं हुई। लेकिन उसके भीतर एक अजीब शांति उतर आई। आर्यन ने उसे देखा। "क्या महसूस हुआ?" शौर्य ने कहा, "कुछ नहीं।" फिर कुछ क्षण बाद उसने जोड़ा। "बस ऐसा लगा जैसे यह मुझे पहचानता है।" आर्यन ने सिर झुका लिया। "यही बात मुझे सबसे ज्यादा डराती है।" शौर्य ने पूछा, "क्यों?" आर्यन ने कहा, "क्योंकि शक्ति तुम्हें पहचानती है।" "और शायद तुम भी उसे पहले से पहचानते हो।" शौर्य ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने माला अपनी मुट्ठी में बंद कर ली। दूर कहीं पत्थर के भीतर से धीमी आवाज आई। धक। सबने एक साथ उस दिशा में देखा। फिर दूसरी बार। धक। इस बार आवाज के साथ दीवार पर एक नई रेखा उभरी। तीन रेखाएं। वही चिन्ह जो शौर्य ने अपनी स्मृति में देखा था। आर्यन ने उसे देखते ही कहा, "वह हमें बुला नहीं रहा।" शौर्य ने पूछा, "तो?" आर्यन ने कहा, "वह रास्ता खोल रहा है।" शौर्य ने पूछा, "कहां का?" आर्यन ने उस चिन्ह को देखा। उसकी आंखों में वर्षों बाद एक स्पष्ट उद्देश्य दिखाई दिया। "विराज के पास।" और उसी क्षण दीवार धीरे-धीरे खुलने लगी। उसके पीछे कोई अंधेरी सुरंग नहीं थी। वहां दूर एक हल्की सफेद रोशनी दिखाई दे रही थी। और उस रोशनी के बीच किसी व्यक्ति की परछाईं खड़ी थी। परछाईं बिल्कुल स्थिर थी। लेकिन उसके हाथ में कुछ था। एक सात मोतियों वाली माला। और उसके बीच का मोती काला था। आर्यन की सांस रुक गई। उसने केवल एक शब्द कहा। "विराज।" परछाईं ने सिर उठाया। लेकिन चेहरा अब भी दिखाई नहीं दे रहा था। फिर एक आवाज आई। "बहुत देर कर दी, आर्यन।" आर्यन कुछ बोल नहीं पाया। शौर्य ने उसकी तरफ देखा। उसे पहली बार समझ आया कि सातवें बंधन का रहस्य केवल अतीत में छिपा हुआ नहीं था। उसका अतीत अभी जीवित था। और वह उन्हें देख रहा था। उनका इंतजार कर रहा था।

End of Chapter 24

Chapter 24: तीसरा नाम - समंदर का Sikandar | Novel AI Studio