Chapter 21 of 30
उन दिनों की अधूरी आवाजें
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कमरे में कुछ देर तक कोई आवाज नहीं हुई।
शौर्य की नजर आर्यन पर थी।
आर्यन अब भी सिर झुकाए खड़ा था।
उसके चेहरे पर वर्षों का पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
शौर्य ने धीरे से पूछा, "उस रात के बाद क्या हुआ था?"
आर्यन ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने अपनी कलाई की तरफ देखा।
वही सातवाँ चिन्ह।
आज वह शांत था, लेकिन उसकी सतह पर हल्की नीली चमक अब भी मौजूद थी।
आर्यन ने अपनी उंगलियां उस चिन्ह पर रख दीं।
जैसे ही उसकी त्वचा ने चिन्ह को छुआ, कमरे की हवा बदल गई।
शौर्य ने देखा कि आर्यन की आंखों में अचानक एक हल्की चमक आई।
"तुम्हें जानना है?"
शौर्य ने सिर हिलाया।
आर्यन ने आंखें बंद कर लीं।
"तो मेरी बात मत सुनना।"
शौर्य थोड़ा चौंका।
आर्यन ने कहा, "जो देखो, उसे महसूस करना।"
अगले ही क्षण सातवें चिन्ह से बहुत हल्की रोशनी निकली।
वह रोशनी पहले आर्यन की हथेली पर ठहरी।
फिर धीरे-धीरे हवा में फैलने लगी।
कमरे की पत्थर की दीवारें उस रोशनी में धुंधली पड़ने लगीं।
शौर्य ने पीछे हटने की कोशिश नहीं की।
उसने केवल देखा।
रोशनी के भीतर एक छोटा-सा आंगन दिखाई दिया।
गीली मिट्टी।
बारिश के बाद की ठंडी हवा।
छत के किनारे से गिरती पानी की बूंदें।
टप।
टप।
टप।
और उन बूंदों के बीच एक बच्चा बैठा था।
छोटा आर्यन।
उसके हाथ में लकड़ी का एक टुकड़ा था।
वह मिट्टी पर कुछ बना रहा था।
शौर्य की नजर उस आकृति पर टिक गई।
एक वृत्त।
और उसके भीतर सात छोटी रेखाएं।
वर्तमान में आर्यन की उंगलियां अब भी उसी चिन्ह पर थीं।
अतीत में छोटा आर्यन उसी चिन्ह को मिट्टी में बना रहा था।
दोनों समय एक-दूसरे से जैसे जुड़ गए थे।
शौर्य ने धीरे से सांस ली।
और उसी सांस के साथ उसे ऐसा लगा जैसे वह केवल कोई पुरानी घटना नहीं देख रहा।
वह उस दिन को जी रहा था।
छोटा आर्यन अचानक रुक गया।
उसने सिर उठाया।
दरवाजे के पास उसकी मां खड़ी थी।
उसने कुछ देर तक मिट्टी में बने चिन्ह को देखा।
फिर पूछा, "फिर वही चिन्ह?"
आर्यन ने सिर उठाया।
"पता नहीं क्यों, मां। जब भी मैं आंखें बंद करता हूं, यही दिखाई देता है।"
उसकी मां धीरे-धीरे उसके पास आई।
वह उसके सामने बैठ गई।
उसकी नजर चिन्ह पर गई।
उसके चेहरे पर एक पल के लिए डर उभरा।
बहुत हल्का।
लेकिन छोटा आर्यन उसे देख चुका था।
"आप इसे जानती हैं?"
उसकी मां ने तुरंत नजरें हटा लीं।
"नहीं।"
आर्यन कुछ देर उसे देखता रहा।
वह अपनी मां को अच्छी तरह जानता था।
जब वह झूठ बोलती थी, तो उसकी आवाज थोड़ी धीमी हो जाती थी।
"आपने झूठ बोला।"
उसकी मां ने उसकी तरफ देखा।
कुछ क्षण तक वह चुप रही।
फिर उसके बालों पर हाथ फेरते हुए बोली, "हर सच हर उम्र में नहीं बताया जाता।"
छोटा आर्यन नाराज हो गया।
"लेकिन मैं अब छोटा नहीं हूं।"
उसकी मां मुस्कुरा दी।
"तुम अभी भी मेरे बच्चे हो।"
आर्यन ने मुंह फेर लिया।
"मुझे बच्चा मत कहिए।"
उसकी मां हल्का-सा हंस पड़ी।
उस हंसी को सुनकर आर्यन भी मुस्कुरा दिया।
शौर्य उस दृश्य को देखता रहा।
उसने वर्तमान में आर्यन की तरफ देखा।
लेकिन आर्यन अब वहां नहीं था।
वह उसी स्मृति में डूबा हुआ था।
शौर्य ने समझ लिया कि उसके लिए यह केवल अतीत नहीं था।
यह उसकी जिंदगी का वह हिस्सा था जिसे उसने वर्षों से अपने भीतर बंद कर रखा था।
दृश्य धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
छोटा आर्यन अब नदी के किनारे बैठा था।
उसकी हथेली के ऊपर पानी हवा में ठहरा हुआ था।
पहले पानी कांपा।
फिर धीरे-धीरे ऊपर उठ गया।
आर्यन की आंखों में खुशी चमक उठी।
"मैं कर सकता हूं।"
वह पीछे मुड़ा।
वह चाहता था कि कोई उसकी इस सफलता को देखे।
लेकिन नदी के किनारे कोई नहीं था।
उसकी मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।
वह कुछ क्षण पानी को देखता रहा।
फिर उसने उसे धीरे से वापस नदी में गिरा दिया।
और घर की तरफ दौड़ पड़ा।
उस दिन वह पहली बार अपनी मां को अपनी शक्ति दिखाना चाहता था।
लेकिन घर पहुंचकर उसे पता चला कि उसकी मां वहां नहीं थी।
वह दरवाजे पर बैठ गया।
सुबह बीती।
दोपहर बीती।
फिर शाम उतर आई।
हर बार दूर से कोई कदमों की आवाज आती, तो आर्यन उठकर दरवाजे की तरफ देखता।
लेकिन हर बार कोई और निकलता।
आखिरकार रात हो गई।
और तभी वह आवाज आई।
दरवाजे के बाहर कदमों की धीमी आहट।
आर्यन तुरंत उठ खड़ा हुआ।
उसकी मां सामने थी।
वह थकी हुई थी।
उसके कपड़े बारिश से भीगे हुए थे।
आर्यन दौड़कर उसके पास गया।
"आप इतनी देर से क्यों आईं?"
उसकी मां ने उसे गले लगा लिया।
"काम था।"
"आपने खाना खाया?"
उसकी मां मुस्कुराई।
"तुमने खाया?"
आर्यन ने सिर हिला दिया।
"नहीं।"
उसकी मां ने उसे देखा।
फिर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
आर्यन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"आप रो रही हैं?"
"नहीं।"
"झूठ।"
उसकी मां ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
कुछ देर तक दोनों वैसे ही खड़े रहे।
फिर उसकी मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "अगर कभी मैं तुम्हारे साथ न रहूं तो..."
आर्यन ने तुरंत उसकी बात काट दी।
"ऐसा मत बोलिए।"
उसकी मां चुप हो गई।
आर्यन ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"आप कहीं नहीं जाएंगी।"
उसकी मां ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने बस अपने बेटे को और कसकर गले लगा लिया।
वर्तमान में खड़ा शौर्य अचानक कांप गया।
उसे महसूस हुआ कि उसके अपने हाथ की उंगलियां भी अनजाने में मुट्ठी बन चुकी थीं।
उसने आर्यन की तरफ देखा।
आर्यन की आंखें बंद थीं।
उसके चेहरे पर वही दर्द था जो शौर्य ने अभी उस बच्चे के चेहरे पर देखा था।
लेकिन इससे पहले कि शौर्य कुछ पूछता, सातवें चिन्ह की रोशनी फिर बदल गई।
उस गर्म, शांत स्मृति के ऊपर धीरे-धीरे एक और दृश्य उभरने लगा।
इस बार वहां चार लोग थे।
आर्यन।
देव।
मीरा।
और अंश।
चारों एक पुराने पेड़ के नीचे बैठे थे।
देव हंसते हुए कह रहा था, "अगर तुम ऐसे ही चुप बैठे रहे तो दोस्ती कैसे होगी?"
आर्यन ने उसकी तरफ देखा।
"मुझे नहीं पता।"
मीरा हंस पड़ी।
"यह भी कोई जवाब है?"
अंश ने आर्यन को ध्यान से देखा।
"तुम्हारे सिर में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है, है ना?"
आर्यन पहली बार खुलकर मुस्कुराया।
"शायद।"
देव ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो हम चारों मिलकर जवाब ढूंढेंगे।"
वह छोटा-सा वाक्य हवा में ठहर गया।
शौर्य को लगा जैसे वर्तमान और अतीत के बीच कोई अदृश्य धागा खिंच गया हो।
क्योंकि कुछ ही समय बाद वही चार लोग एक-दूसरे से दूर होने वाले थे।
लेकिन अभी उन्हें इसका पता नहीं था।
वे हंस रहे थे।
साथ बैठ रहे थे।
एक-दूसरे के साथ अपनी छोटी-छोटी खुशियां बांट रहे थे।
बारिश के दिनों में एक ही छत के नीचे बैठते।
प्रशिक्षण के दौरान एक-दूसरे को चुनौती देते।
कभी हारने वाला खाना खिलाता।
कभी जीतने वाला बाकी तीनों के लिए पानी लाता।
उन दिनों आर्यन अकेला नहीं था।
उसके पास दोस्त थे।
एक घर था।
एक मां थी।
और भविष्य को लेकर बहुत सारे सपने थे।
फिर एक शाम देव ने पूछा, "अगर तुम्हें कभी इतनी शक्ति मिल जाए कि तुम सब कुछ बदल सको तो?"
आर्यन कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला, "तो मैं चाहता हूं कि हम चारों में से कोई भी कमजोर न रहे।"
देव मुस्कुराया।
"यही सही जवाब है।"
अंश ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"तो वादा करो।"
मीरा ने भी हाथ रख दिया।
देव ने अपना हाथ उनके ऊपर रख दिया।
आर्यन कुछ क्षण उन तीनों को देखता रहा।
फिर उसने अपना हाथ सबसे ऊपर रख दिया।
"वादा।"
चारों हाथ कुछ क्षण वैसे ही रहे।
शौर्य ने उस दृश्य को देखा।
उसे पता था कि यही वादा बाद में आर्यन के लिए सबसे भारी बोझ बनने वाला था।
लेकिन आर्यन अभी यह नहीं जानता था।
और शायद यही अतीत की सबसे दुखद बात थी।
इंसान अक्सर उस क्षण की कीमत नहीं समझता जब वह भविष्य की नींव रख रहा होता है।
दृश्य फिर धुंधला हुआ।
इस बार परिवर्तन धीमा नहीं था।
बारिश की आवाज तेज हुई।
पेड़ गायब हुआ।
चारों दोस्त गायब हुए।
और उसकी जगह वही पुराना मंदिर उभर आया।
काला पत्थर।
सातवाँ चिन्ह।
और उसके सामने खड़ा आर्यन।
अब वह बड़ा हो चुका था।
उसके चेहरे पर वही बेचैनी थी जिसे शौर्य ने वर्तमान में भी देखा था।
आर्यन ने पत्थर की तरफ हाथ बढ़ाया।
फिर रुक गया।
उसकी उंगलियां कांप रही थीं।
उसके पीछे उसके दोस्तों की आवाजें जैसे दूर से सुनाई दे रही थीं।
"आर्यन, मत करो।"
"तुम्हें नहीं पता इसके अंदर क्या है।"
"हम तुम्हारे साथ हैं।"
आर्यन ने आंखें बंद कर लीं।
उसकी मुट्ठी कस गई।
"मुझे तुम लोगों को बचाना है।"
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
और इस बार काले पत्थर ने उसकी हथेली को छू लिया।
एक तेज रोशनी फूटी।
शौर्य ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे पूरा कमरा कांप गया हो।
लेकिन कुछ क्षण बाद जब उसने आंखें खोलीं, तो वह फिर वर्तमान में था।
उसके सामने आर्यन खड़ा था।
वही चेहरा।
वही आंखें।
लेकिन अब शौर्य उन आंखों के पीछे छिपा पूरा अतीत देख चुका था।
आर्यन ने धीरे से कहा, "यही वह क्षण था जब सब बदल गया।"
शौर्य ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हें लगा था कि तुम उन्हें बचा लोगे।"
आर्यन ने सिर झुका लिया।
"हाँ।"
"लेकिन तुमने खुद को खो दिया।"
आर्यन ने बहुत धीरे से कहा, "हाँ।"
कुछ देर दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।
फिर शौर्य ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
"अतीत को बदला नहीं जा सकता।"
आर्यन ने उसकी तरफ देखा।
शौर्य ने कहा, "लेकिन उसके बाद क्या करना है, यह अभी भी हमारे हाथ में है।"
आर्यन की आंखों में हल्की नमी आ गई।
वह कुछ बोलता, उससे पहले ही सातवें चिन्ह से एक हल्की कंपन निकली।
इस बार उसमें कोई भय नहीं था।
बल्कि ऐसा लगा जैसे वह किसी चीज को स्वीकार कर रहा हो।
दीवार पर धीरे-धीरे एक नई रेखा बनी।
एक रास्ता।
वह रास्ता अतीत की ओर नहीं जा रहा था।
वह वर्तमान से आगे जा रहा था।
शौर्य ने उसे देखा।
फिर आर्यन की तरफ देखा।
"अब?"
आर्यन ने उस रास्ते को देखा।
कई वर्षों से पहली बार उसके चेहरे पर डर के साथ एक और भावना दिखाई दी।
उम्मीद।
"अब," उसने धीमे से कहा, "जो अधूरा रह गया था, उसे पूरा करने का समय है।"
शौर्य ने एक कदम आगे बढ़ाया।
आर्यन उसके साथ चल पड़ा।
पीछे सातवें चिन्ह की रोशनी धीरे-धीरे मंद हो गई।
लेकिन इस बार अतीत ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
वह उनके पीछे रह गया।
एक स्मृति बनकर।
एक घाव बनकर।
और शायद पहली बार।
एक सबक बनकर।