Chapter 17 of 30

तीसरे द्वार के पार

2.8k words

अंधेरा पूरी तरह शांत था। इतना शांत कि शौर्य को अपनी ही सांस की आवाज असामान्य रूप से तेज लग रही थी। उसकी हथेली के ऊपर नीली रोशनी अब भी स्थिर थी। छोटी। बहुत छोटी। लेकिन इस समय वही रोशनी उसके लिए पूरी दुनिया थी। उसके सामने लाल आकृति खड़ी थी। वही चेहरा। वही लाल आँखें। वही शांत भाव। लेकिन आज उसके पीछे एक दूसरी छाया भी थी। वह छाया कुछ दूरी पर खड़ी थी। उसका चेहरा पूरी तरह अंधेरे में था। शौर्य उसकी ऊर्जा महसूस कर सकता था। बहुत हल्की। लेकिन परिचित। उसे लगा जैसे उसने इस ऊर्जा को पहले कहीं महसूस किया है। नगर में। शायद उसी पुराने रास्ते पर। शायद उस पुल के पास। या शायद उससे भी पहले। शौर्य ने अपनी आंखें थोड़ी सिकोड़ लीं। उसने तुरंत कोई सवाल नहीं किया। वह पहले सामने की दोनों आकृतियों को समझना चाहता था। लाल आकृति ने उसकी तरफ देखा। "तुम्हारे मन में बहुत सारे प्रश्न हैं।" शौर्य ने शांत स्वर में कहा, "हाँ।" "लेकिन तुम अभी पूछ नहीं रहे।" "क्योंकि मुझे नहीं पता कि तुम्हारे किस उत्तर पर विश्वास करना चाहिए।" कुछ क्षण तक लाल आकृति उसे देखती रही। फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। "अच्छा।" शौर्य ने पूछा, "यह कौन है?" उसकी नजर दूसरी छाया पर थी। कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं मिला। फिर वह छाया एक कदम आगे बढ़ी। पत्थर के फर्श पर उसके पैर की आवाज गूंजी। टक। शौर्य का ध्यान तुरंत उसके पैरों की ओर गया। उसने देखा कि वह सामान्य तरीके से चल रहा था। न कोई ऊर्जा की लहर। न कोई विशेष शक्ति का प्रदर्शन। लेकिन जैसे ही वह एक कदम और आगे आया, शौर्य की हथेली के ऊपर की नीली रोशनी अचानक कांप उठी। शौर्य ने तुरंत ऊर्जा स्थिर कर ली। उसकी आंखों में सावधानी आ गई। छाया कुछ और कदम आगे बढ़ी। अब उसका चेहरा थोड़ा दिखाई दे रहा था। एक युवा चेहरा। शांत। थोड़ा थका हुआ। उसकी आंखों के नीचे हल्की काली छाया थी। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे। कपड़े पुराने थे। लेकिन उसकी मुद्रा में कमजोरी नहीं थी। वह शौर्य से लगभग कुछ दूरी पर रुक गया। शौर्य उसे देखता रहा। युवा ने भी उसे देखा। दोनों के बीच कुछ क्षण तक कोई शब्द नहीं था। फिर युवा ने कहा, "तुम्हें देखकर मुझे एक पुरानी बात याद आ गई।" शौर्य ने पूछा, "क्या?" युवा ने उत्तर देने से पहले लाल आकृति की तरफ देखा। लाल आकृति चुप रही। युवा ने वापस शौर्य की तरफ देखा। "जब पहली बार मुझे इस स्थान पर लाया गया था, तब मैं भी तुम्हारी तरह बहुत सारे सवाल पूछना चाहता था।" शौर्य ने पूछा, "तुम्हें कौन लाया था?" युवा ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोला, "मुझे नहीं पता।" शौर्य की भौंहें सिकुड़ गईं। "तुम्हें नहीं पता?" "नहीं।" "फिर तुम यहाँ कितने समय से हो?" युवा ने सिर थोड़ा नीचे कर लिया। "इतना समय हो गया है कि गिनना बंद कर दिया।" शौर्य ने उसकी बात को ध्यान से सुना। उसके चेहरे पर मजाक नहीं था। वह सच बोल रहा था। लेकिन शौर्य को उसके उत्तर में कुछ अधूरा लगा। उसने पूछा, "तुम बाहर क्यों नहीं जाते?" युवा ने इस बार तुरंत उत्तर नहीं दिया। उसकी आंखें कुछ क्षण दरवाजे की तरफ गईं। फिर वह बोला, "क्योंकि यह जगह मुझे जाने नहीं देती।" शौर्य ने सातवें चिन्ह की तरफ देखा। उसे अचानक समझ आया कि यह स्थान केवल एक प्रशिक्षण क्षेत्र नहीं था। यह किसी को रोकने के लिए भी बनाया गया था। उसने पूछा, "तुम कैदी हो?" युवा ने हल्की सांस ली। "शायद।" "शायद?" "क्योंकि मुझे यह भी नहीं पता कि मैं यहाँ कैद हूँ या किसी चीज की रक्षा कर रहा हूँ।" शौर्य चुप हो गया। लाल आकृति ने आखिरकार बोलना शुरू किया। "यही वह व्यक्ति है जिसके बारे में तुम्हें जानना था।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "क्या यह तीसरा धारक है?" लाल आकृति ने उत्तर नहीं दिया। उसने केवल दूसरी छाया की तरफ देखा। युवा ने धीरे से कहा, "नहीं।" शौर्य की नजर उसकी तरफ गई। युवा ने कहा, "मैं तीसरा धारक नहीं हूँ।" शौर्य ने धीरे से पूछा, "फिर कौन हो?" युवा ने कुछ क्षण आंखें बंद कीं। फिर बोला, "मुझे अपना नाम याद है।" शौर्य प्रतीक्षा करता रहा। "विराज।" नाम सुनते ही कमरे की हवा में हल्का कंपन हुआ। सातवें चिन्ह की नीली रोशनी एक क्षण के लिए तेज हुई। शौर्य ने तुरंत उस प्रतिक्रिया को नोट किया। विराज ने भी उसे देखा। उसके चेहरे पर बहुत हल्का बदलाव आया। "इसने तुम्हें स्वीकार कर लिया है।" शौर्य ने पूछा, "किसने?" विराज ने सातवें चिन्ह की तरफ देखा। "यह स्थान।" शौर्य ने धीरे से अपनी हथेली बंद कर ली। नीली रोशनी बुझ गई। अंधेरा थोड़ा गहरा हो गया। विराज ने कहा, "तुम्हें यहाँ इसलिए नहीं बुलाया गया कि तुम शक्ति प्राप्त करो।" शौर्य ने पूछा, "फिर?" "तुम्हें यह पता लगाने के लिए बुलाया गया है कि तुम्हारी शक्ति वास्तव में किसकी है।" शौर्य कुछ क्षण उसे देखता रहा। उसने कहा, "मेरी।" विराज ने सिर हिलाया। "तुम्हें ऐसा लगता है।" शौर्य की आंखों में सावधानी आ गई। "तुम कहना क्या चाहते हो?" विराज ने उत्तर देने से पहले फर्श की तरफ देखा। "तुम्हारे भीतर जो ऊर्जा है, वह पूरी तरह तुम्हारी नहीं है।" शौर्य का शरीर हल्का-सा तन गया। नीरिका उसके पास आ गई। जलछाया भी उसकी छाया से बाहर निकल आया। विराज ने दोनों को देखा। "यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है।" "और यही तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी भी।" शौर्य ने कहा, "साफ-साफ बोलो।" विराज ने उसकी आंखों में देखा। "तुम्हारी ऊर्जा किसी एक स्रोत से नहीं आती।" "तुमने दो बंधन बनाए हैं।" "एक जल से।" "एक छाया से।" "लेकिन इन दोनों के बीच तुम्हारी अपनी ऊर्जा भी है।" शौर्य ने अपनी छाती पर हाथ रखा। उसे अचानक अपनी ऊर्जा का प्रवाह महसूस हुआ। जलछाया की ऊर्जा अलग थी। नीरिका की अलग। लेकिन उनके बीच जो ऊर्जा बहती थी, वह उसकी अपनी थी। विराज ने कहा, "अभी तुम तीनों शक्तियों को अलग-अलग इस्तेमाल करते हो।" "इसीलिए तुम्हारी शक्ति बार-बार टूटती है।" शौर्य ने पूछा, "तो मुझे क्या करना चाहिए?" विराज ने सीधे उत्तर नहीं दिया। उसने कहा, "पहले तुम्हें यह समझना होगा कि बंधन क्या होता है।" शौर्य चुप रहा। विराज धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसने अपना हाथ उठाया। उसकी हथेली के ऊपर बहुत छोटी सफेद रोशनी दिखाई दी। वह नीली नहीं थी। लाल नहीं। सिर्फ सफेद। विराज ने उसे हवा में स्थिर रखा। "बंधन का अर्थ किसी शक्ति को अपने नियंत्रण में लेना नहीं है।" रोशनी धीरे-धीरे घूमने लगी। "बंधन का अर्थ है दो अलग अस्तित्वों के बीच एक ऐसा संबंध बनाना जिसमें दोनों की शक्ति एक-दूसरे को नष्ट न करे।" शौर्य ध्यान से सुन रहा था। विराज ने कहा, "अगर तुम नीरिका की शक्ति को केवल अपने आदेश से चलाओगे, तो एक सीमा के बाद वह कमजोर हो जाएगी।" नीरिका की ऊर्जा हल्की हुई। "अगर तुम जलछाया को केवल एक हथियार की तरह इस्तेमाल करोगे, तो वह भी तुम्हारी सीमा बन जाएगा।" जलछाया की आकृति थोड़ी बदल गई। "लेकिन अगर तुम दोनों की इच्छा को समझना सीखो, तो शक्ति तुम्हारे आदेश से नहीं, तुम्हारे साथ चलने लगेगी।" शौर्य ने धीरे से नीरिका की तरफ देखा। फिर जलछाया की तरफ। उसे अचानक कई छोटी-छोटी घटनाएं याद आने लगीं। जब नीरिका ने बिना आदेश दिए उसे खतरे से बचाया था। जब जलछाया ने खुद जमीन के नीचे जाकर रास्ता देखा था। जब दोनों ने कई बार उसके कहने से पहले ही खतरा पहचान लिया था। वह उन्हें नियंत्रित नहीं कर रहा था। वे उसके साथ चल रहे थे। शौर्य ने धीरे से कहा, "तो अब तक मैं गलत समझ रहा था।" विराज ने कहा, "गलत नहीं।" "अधूरा।" यह शब्द शौर्य के मन में अटक गया। अधूरा। उसने अपनी मुट्ठी बंद कर ली। "तो इस द्वार का उद्देश्य क्या है?" विराज ने पीछे देखा। अंधेरे में तीसरे द्वार का विशाल आकार दिखाई दे रहा था। "चुनाव।" शौर्य ने कहा, "किसका?" "तुम किस तरह का धारक बनना चाहते हो।" कुछ क्षण के लिए शांति रही। फिर लाल आकृति आगे आई। उसने पहली बार अपना हाथ तीसरे द्वार की तरफ उठाया। दरवाजे पर तीन चिन्ह दिखाई दिए। पहला। शक्ति। दूसरा। बंधन। तीसरा। स्वतंत्रता। शौर्य ने तीनों चिन्ह देखे। लाल आकृति ने कहा, "इनमें से एक चुनो।" शौर्य ने पूछा, "अगर मैंने शक्ति चुनी?" "तुम्हारी ऊर्जा बढ़ेगी।" "बंधन?" "तुम अपने बंधनों के साथ गहराई से जुड़ोगे।" "स्वतंत्रता?" लाल आकृति कुछ क्षण शांत रही। फिर बोली, "तुम अपने ऊपर लगे कुछ बंधनों को तोड़ सकोगे।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "कौन से?" लाल आकृति ने कहा, "यही चुनाव है।" शौर्य ने तीनों चिन्हों को देखा। वह जानता था कि शक्ति सबसे आसान उत्तर था। शक्ति मिलती। वह मजबूत होता। आगे के दुश्मनों का सामना करना आसान होता। लेकिन लाल आकृति ने पहले ही उसे चेतावनी दी थी। शक्ति हमेशा समाधान नहीं होती। बंधन। यह विकल्प उसे आकर्षित करता था। क्योंकि नीरिका और जलछाया के साथ उसका संबंध उसकी शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। लेकिन अगर उसने इसे चुना, तो क्या वह हमेशा बंधा रहेगा? स्वतंत्रता। यह शब्द सबसे अधिक खतरनाक था। क्योंकि वह नहीं जानता था कि कौन से बंधन टूटेंगे। और कौन से संबंध भी। शौर्य काफी देर तक कुछ नहीं बोला। विराज उसे देख रहा था। नीरिका शांत थी। जलछाया भी। अंततः शौर्य ने पूछा, "अगर मैं तीनों में से कोई नहीं चुनूं?" लाल आकृति की आंखों में पहली बार स्पष्ट रुचि दिखाई दी। विराज ने भी उसकी तरफ देखा। कुछ क्षण की शांति। फिर लाल आकृति ने कहा, "तब द्वार बंद रहेगा।" शौर्य ने पूछा, "और अगर मैं जबरदस्ती खोलूं?" विराज ने पहली बार गंभीर स्वर में कहा, "तो यह तुम्हें नष्ट कर देगा।" शौर्य ने दरवाजे को देखा। उसके सामने तीन रास्ते थे। लेकिन शायद चौथा रास्ता भी हो सकता था। उसने पूछा, "क्या किसी ने पहले तीनों को मिलाने की कोशिश की है?" लाल आकृति चुप हो गई। विराज की आंखें थोड़ी बदल गईं। यही उत्तर था। शौर्य समझ गया। "किसी ने कोशिश की थी।" विराज ने धीरे से कहा, "हाँ।" "कौन?" विराज ने उसकी तरफ देखा। "तुमसे पहले एक व्यक्ति ने।" "उसका क्या हुआ?" विराज ने उत्तर देने में कुछ समय लिया। "वह सफल हुआ।" शौर्य की आंखों में आश्चर्य आया। "तो फिर?" "वह इतना शक्तिशाली हो गया कि उसके अपने बंधन उसके आदेश का पालन करने लगे।" "फिर उसने सब कुछ खो दिया।" शौर्य चुप रहा। विराज ने कहा, "उसने शक्ति प्राप्त कर ली थी।" "लेकिन वह यह भूल गया कि शक्ति किसलिए थी।" कमरे में फिर शांति फैल गई। शौर्य ने अपनी हथेली देखी। उसने धीरे से उसे खोला। नीली ऊर्जा की छोटी रोशनी फिर बनी। इस बार उसने उसे बहुत ध्यान से देखा। इतनी छोटी। इतनी नाजुक। फिर भी उसी के भीतर कुछ ऐसा था जो उसे आगे बढ़ा सकता था। उसने नीरिका की तरफ देखा। "तुम क्या चाहती हो?" नीरिका की आंखों में हल्की नीली चमक आई। उसने अपना हाथ शौर्य की हथेली के पास रखा। वह बोल नहीं सकती थी। लेकिन उसकी ऊर्जा ने उत्तर दे दिया। शौर्य ने आंखें बंद कर लीं। उसे उसके भीतर एक भावना महसूस हुई। साथ। वह शब्द नहीं था। लेकिन अर्थ स्पष्ट था। शौर्य ने जलछाया की तरफ देखा। जलछाया कुछ क्षण स्थिर रहा। फिर उसकी छाया शौर्य के पैरों तक आकर रुक गई। वह भी वहीं रहा। शौर्य ने धीरे से सांस छोड़ी। उसे अपना उत्तर मिल गया। उसने तीसरे द्वार की तरफ देखा। फिर कहा, "मैं बंधन चुनता हूँ।" तीनों चिन्हों में से दूसरा चिन्ह चमक उठा। पूरा कमरा नीली रोशनी से भर गया। नीरिका की ऊर्जा अचानक बढ़ी। जलछाया की छाया भी कुछ क्षण के लिए विशाल हो गई। शौर्य को लगा जैसे उसके शरीर के भीतर कोई नया मार्ग खुल रहा हो। लेकिन उसने अपनी ऊर्जा को पकड़ने की कोशिश नहीं की। वह शांत रहा। उसने केवल उसे बहने दिया। उसकी सांस धीमी हो गई। हृदय की धड़कन स्थिर हुई। उसने नीरिका की ऊर्जा को अपनी ऊर्जा से जोड़ा। फिर जलछाया की ऊर्जा को। पहले दोनों दिशाएं अलग थीं। फिर धीरे-धीरे उनके बीच एक पतली रेखा बनी। शौर्य ने उसे महसूस किया। नीला। गहरा। स्थिर। लेकिन तभी उसके शरीर में तेज दर्द उठा। वह एक घुटने पर गिर गया। नीरिका तुरंत उसके पास आई। शौर्य ने हाथ उठाकर उसे रोका। "नहीं।" उसने दांत भींचे। दर्द बढ़ रहा था। लेकिन वह जानता था कि अभी उसे ऊर्जा को जबरदस्ती नियंत्रित नहीं करना है। उसे संतुलित करना है। उसने आंखें बंद कीं। नीरिका की ऊर्जा। जलछाया की ऊर्जा। उसकी अपनी ऊर्जा। तीनों धीरे-धीरे एक ही लय में आने लगीं। दर्द कम हुआ। शौर्य ने धीरे से सांस छोड़ी। उसके सामने एक नया संदेश दिखाई दिया। बंधन समन्वय। प्रथम चरण पूर्ण। शौर्य ने आंखें खोलीं। वह थका हुआ था। लेकिन उसके भीतर एक नई स्थिरता थी। उसने अपनी हथेली खोली। नीली रोशनी इस बार पहले से अधिक स्थिर थी। लेकिन उसमें नीरिका की हल्की जल-लहर भी थी। और उसके चारों ओर जलछाया की पतली काली रेखा घूम रही थी। शौर्य ने आश्चर्य से उसे देखा। विराज के चेहरे पर पहली बार हल्की मुस्कान आई। "अब तुम समझना शुरू कर रहे हो।" शौर्य ने पूछा, "यह कितनी शक्ति है?" विराज ने कहा, "शक्ति की बात अभी मत करो।" "क्यों?" "क्योंकि अभी तुम्हारे पास शक्ति नहीं बढ़ी।" "सिर्फ उसका नियंत्रण बढ़ा है।" शौर्य ने कुछ क्षण सोचा। यह बात उसे सही लगी। उसने कोई नया स्तर प्राप्त नहीं किया था। उसका शरीर अभी भी उतना ही कमजोर था। उसकी ऊर्जा की मात्रा भी लगभग वही थी। लेकिन अब वह उसे पहले से अधिक कुशलता से इस्तेमाल कर सकता था। विराज ने आगे कहा, "यही वास्तविक प्रगति है।" शौर्य ने दरवाजे की तरफ देखा। तीसरा द्वार अब आधा खुला था। लेकिन उसके पीछे अंधेरा नहीं था। वहाँ एक लंबा गलियारा दिखाई दे रहा था। गलियारे की दीवारों पर लाल रोशनी जल रही थी। शौर्य ने उस दिशा में देखा। "वहाँ क्या है?" विराज ने उत्तर दिया, "तुम्हारा अगला परीक्षण।" शौर्य ने पूछा, "और तुम?" विराज ने दरवाजे के बाहर की तरफ देखा। "मैं यहाँ से आगे नहीं जा सकता।" "क्यों?" विराज ने अपनी हथेली दिखाई। उसकी कलाई पर एक बहुत पुराना चिन्ह था। वही सातवाँ चिन्ह। लेकिन उसके ऊपर एक टूटी हुई रेखा थी। "मेरा बंधन यहाँ तक है।" शौर्य ने उस चिन्ह को देखा। "तुम भी किसी के बंधन में हो?" विराज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "शायद।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। विराज ने कहा, "हर बंधन कैद नहीं होता।" "कुछ बंधन हमें उस जगह से जोड़ते हैं जहाँ हमारी जरूरत होती है।" शौर्य ने यह बात याद रख ली। फिर उसने लाल आकृति की तरफ देखा। "और तुम?" लाल आकृति कुछ दूर खड़ी थी। उसकी लाल आंखें शांत थीं। "मेरा रास्ता अलग है।" "लेकिन मैं तुम्हें तीसरे द्वार के पार नहीं रोकूंगा।" शौर्य ने उसकी बात पर भरोसा नहीं किया। फिर भी वह आगे बढ़ा। नीरिका उसके साथ। जलछाया उसके पीछे। तीसरे द्वार के पार जाते हुए उसने आखिरी बार पीछे देखा। विराज वहीं खड़ा था। लाल आकृति भी। दोनों उसे देख रहे थे। दरवाजा धीरे-धीरे बंद होने लगा। लेकिन इस बार शौर्य ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। वह आगे बढ़ता रहा। गलियारा लंबा था। बहुत लंबा। उसकी दीवारों पर कई चित्र बने थे। कुछ योद्धा। कुछ विशाल जीव। कुछ लोग। और हर चित्र में सात चिन्ह दिखाई दे रहे थे। शौर्य चलते-चलते एक चित्र के सामने रुक गया। उसमें एक व्यक्ति सातों शक्तियों के बीच खड़ा था। उसके आसपास छह अलग-अलग ऊर्जा धाराएँ थीं। लेकिन सातवीं ऊर्जा उसके भीतर नहीं थी। वह उसके सामने खड़ी थी। जैसे कोई अलग अस्तित्व। शौर्य ने चित्र को ध्यान से देखा। नीचे कुछ लिखा था। "सातवीं शक्ति शक्ति नहीं है।" शौर्य की नजर अगले शब्द पर गई। "सातवीं शक्ति चुनाव है।" उसने धीरे से सांस ली। अब उसे कुछ समझ आने लगा था। सातवाँ चिन्ह शायद कोई तत्व नहीं था। वह किसी व्यक्ति की शक्ति नहीं। वह निर्णय था। संयोजन था। संभावना थी। लेकिन तभी गलियारे के अंत से एक आवाज आई। बहुत धीमी। बहुत परिचित। "शौर्य।" वह तुरंत रुक गया। उस आवाज में कुछ ऐसा था जिसे वह पहचानता था। नीरिका भी स्थिर हो गई। जलछाया जमीन पर फैल गया। शौर्य ने आगे देखा। लाल रोशनी के बीच एक आकृति खड़ी थी। लेकिन इस बार वह लाल आकृति नहीं थी। यह कोई और था। एक चेहरा। एक ऐसा चेहरा जिसे शौर्य ने बहुत पहले देखा था। उसकी सांस अचानक रुक गई। आवाज फिर आई। "तुम यहाँ तक आ गए।" शौर्य की उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं। वह आकृति आगे आई। रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी। शौर्य की आंखें फैल गईं। वह व्यक्ति जीवित था। जिसे शौर्य मृत समझ चुका था। जिसके बारे में उसने सोचा था कि वह कभी वापस नहीं आएगा। वह सामने खड़ा था। और उसकी आंखों में वही सातवाँ चिन्ह चमक रहा था। शौर्य के होंठों से केवल एक शब्द निकला। "तुम।" आकृति ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने केवल शौर्य को देखा। फिर बहुत धीरे से कहा। "अब असली कहानी शुरू होती है।" गलियारे की सारी लाल रोशनियाँ एक साथ जल उठीं। और शौर्य को पहली बार महसूस हुआ कि तीसरे द्वार के पार आने का अर्थ आगे बढ़ना नहीं था। इसका अर्थ था। उस दुनिया में प्रवेश करना जहाँ उसके पुराने प्रश्नों के उत्तर उसका इंतजार कर रहे थे। लेकिन उन उत्तरों के साथ। कुछ ऐसे सच भी आने वाले थे। जिन्हें जानने के बाद शायद उसके लिए वापस लौटना संभव नहीं होगा।

End of Chapter 17