Chapter 16 of 30

सातवें चिन्ह का रहस्य

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रात और दिन के बीच का अंतर इस गहरे नगर में लगभग समाप्त हो चुका था। ऊपर समुद्र की सतह पर शायद समय बदल रहा था, लेकिन नीचे पत्थरों से बने इस प्राचीन नगर में केवल नीली रोशनी की तीव्रता बदलती थी। कभी दीवारें हल्की चमकतीं। कभी वही रोशनी धीमी होकर लगभग बुझ जाती। और जब ऐसा होता, तो पूरे नगर पर एक अजीब-सी खामोशी छा जाती। शौर्य उस खामोशी के बीच आगे बढ़ रहा था। उसके सामने वही विशाल जीव चल रहा था। उसके भारी कदम जमीन पर पड़ते तो बहुत हल्का कंपन महसूस होता। धड़। फिर कुछ क्षण की शांति। फिर दूसरा कदम। धड़। शौर्य उसकी चाल को ध्यान से देख रहा था। वह बहुत तेज नहीं चल रहा था। जैसे जानबूझकर अपनी गति धीमी रख रहा हो। शौर्य भी उसके पीछे उसी गति से चल रहा था। नीरिका उसके बाईं तरफ थी। जलछाया उसकी छाया के साथ-साथ आगे बढ़ रहा था। काफी देर तक किसी ने कुछ नहीं कहा। शौर्य के मन में पिछले कुछ समय की सारी बातें घूम रही थीं। लाल आकृति। लाल क्रिस्टल। तीसरा धारक। सातवाँ चिन्ह। और अब यह जीव। उसने कई बार विशाल जीव के सीने पर बने चिन्ह को देखने की कोशिश की थी। हर बार उसे वही सातवाँ चिन्ह दिखाई देता। वही आकृति। वही हल्की नीली चमक। लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, उस चिन्ह की चमक थोड़ी बदलती जा रही थी। पहले वह बहुत हल्की थी। फिर थोड़ी तेज। फिर कुछ क्षण के लिए बिल्कुल गायब। फिर वापस। शौर्य ने यह बात नोट कर ली। उसने कदम थोड़ा धीमा किया। जीव भी उसी क्षण रुक गया। शौर्य कुछ कदम पीछे रह गया था। विशाल जीव ने अपना सिर घुमाकर उसे देखा। शौर्य ने उसकी आँखों में देखा। चारों आँखें एक साथ उसकी तरफ थीं। कुछ क्षण तक कोई हलचल नहीं हुई। फिर शौर्य ने धीरे से पूछा, "तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो?" जीव शांत रहा। शौर्य ने अपनी बात दोहराई नहीं। उसे अब समझ आने लगा था कि इस जीव से सामान्य तरीके से उत्तर नहीं मिलेगा। शायद वह बोल ही नहीं सकता था। या शायद वह किसी दूसरी भाषा में संवाद कर रहा था। शौर्य ने उसके सीने पर बने चिन्ह को देखा। फिर अपनी हथेली को। उसे याद आया कि लाल आकृति ने कहा था कि उसे अपनी ऊर्जा को शरीर के बाहर स्थिर करना सीखना होगा। शायद इसीलिए यह जीव उसे यहाँ लेकर जा रहा था। शौर्य ने धीरे से अपनी हथेली खोली। उसने अपनी ऊर्जा को बाहर लाने की कोशिश नहीं की। केवल उसे महसूस किया। उसके भीतर एक छोटी-सी नीली ऊर्जा की धड़कन महसूस हुई। वह ऊर्जा पहले से थोड़ी अधिक स्थिर थी। शौर्य ने उसे हथेली तक आने दिया। नीली रोशनी धीरे-धीरे बनी। इस बार वह पहले से कुछ बड़ी थी। जीव ने उसे देखा। वह अचानक रुक गया। शौर्य भी रुक गया। विशाल जीव ने अपना सिर थोड़ा नीचे किया। उसके सीने का सातवाँ चिन्ह हल्का चमका। शौर्य की हथेली की नीली रोशनी भी उसी समय चमकी। शौर्य ने तुरंत अपनी हथेली की तरफ देखा। दोनों रोशनियों के बीच जैसे कोई संबंध बन गया था। कुछ क्षण के लिए उसे लगा कि उसकी हथेली से एक बहुत पतली ऊर्जा की रेखा निकलकर उस जीव की तरफ जा रही है। लेकिन जैसे ही उसने उसे समझने की कोशिश की, वह रेखा गायब हो गई। शौर्य ने आंखें सिकोड़ लीं। उसने दोबारा कोशिश की। इस बार कुछ नहीं हुआ। जीव फिर आगे बढ़ गया। शौर्य उसके पीछे चल पड़ा। लेकिन अब उसकी चाल पहले जैसी नहीं थी। उसके भीतर जिज्ञासा बढ़ गई थी। वे एक संकरे रास्ते में प्रवेश कर गए। दोनों तरफ बहुत ऊँची पत्थर की दीवारें थीं। दीवारों पर पुराने चिन्ह बने हुए थे। कुछ टूट चुके थे। कुछ पर पानी की मोटी परत थी। कुछ इतने पुराने लग रहे थे कि उनके आकार तक पहचानना मुश्किल था। शौर्य धीरे-धीरे उन चिन्हों को देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। अचानक उसकी नजर एक चिन्ह पर टिक गई। वह सातवें चिन्ह जैसा था। लेकिन पूरी तरह वैसा नहीं। उसके बीच में सात बिंदु बने थे। शौर्य रुक गया। उसने दीवार के पास जाकर उसे ध्यान से देखा। नीरिका भी उसके पास आ गई। शौर्य ने उंगली से चिन्ह को छुआ। जैसे ही उसकी उंगली पत्थर से लगी, दीवार के भीतर हल्की ऊर्जा दौड़ गई। एक बहुत धीमी आवाज सुनाई दी। शौर्य तुरंत पीछे हट गया। लेकिन आवाज बहुत अस्पष्ट थी। जैसे किसी ने बहुत दूर से कुछ कहा हो। उसने दोबारा पत्थर को छुआ। इस बार कोई आवाज नहीं आई। शौर्य ने भौंहें सिकोड़ लीं। "यह जगह हमें पहचानती है।" नीरिका की ऊर्जा हल्के से हिली। वह भी कुछ महसूस कर रही थी। शौर्य ने आगे देखा। विशाल जीव रास्ते के अंत में खड़ा था। वह उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। शौर्य ने दीवार को आखिरी बार देखा और फिर आगे बढ़ गया। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता खुल गया। उनके सामने एक विशाल गोल मैदान था। मैदान के चारों ओर सात ऊँचे पत्थर के स्तंभ खड़े थे। हर स्तंभ पर एक अलग चिन्ह। पहले स्तंभ पर अग्नि जैसा चिन्ह। दूसरे पर जल। तीसरे पर हवा। चौथे पर पृथ्वी। पाँचवें पर प्रकाश। छठे पर छाया। और सातवें पर वही रहस्यमय चिन्ह। शौर्य की सांस धीमी हो गई। वह सातवें स्तंभ को देखता रहा। उसके ऊपर कोई आग नहीं थी। कोई पानी नहीं। कोई स्पष्ट तत्व नहीं। बस एक गहरी नीली रोशनी। विशाल जीव मैदान के बीच जाकर बैठ गया। उसका सीना हल्का उठता और गिरता। शौर्य कुछ दूर खड़ा रहा। फिर उसने पूछा, "यही जगह है?" जीव ने अपना सिर नीचे किया। शौर्य ने इसे उत्तर माना। वह धीरे-धीरे मैदान के बीच गया। नीरिका उसके साथ थी। जलछाया उसकी छाया से निकलकर थोड़ी दूर फैल गया। शौर्य ने चारों ओर देखा। "यह प्रशिक्षण क्षेत्र है?" कोई उत्तर नहीं। लेकिन अचानक सातों स्तंभ एक साथ चमक उठे। शौर्य चौंक गया। एक के बाद एक रोशनी फैलने लगी। पहले अग्नि। फिर जल। फिर हवा। फिर पृथ्वी। फिर प्रकाश। फिर छाया। और अंत में सातवाँ चिन्ह। सातों ऊर्जाएँ कुछ क्षण हवा में एक-दूसरे से जुड़ी रहीं। फिर सब कुछ शांत हो गया। शौर्य की प्रणाली सक्रिय हो गई। प्राचीन प्रशिक्षण क्षेत्र। प्रवेश स्थिति: स्वीकार। प्रशिक्षण चरण: प्रथम। उद्देश्य: ऊर्जा की स्थिरता। शौर्य ने संदेश पढ़ा। फिर धीरे से सांस ली। "तो यह वही है।" उसने अपनी हथेली खोली। उसके ऊपर छोटी नीली रोशनी बनी। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। जैसे ही रोशनी बनी, सातों स्तंभों में से सातवाँ स्तंभ और तेज चमकने लगा। शौर्य ने तुरंत ऊर्जा रोक दी। नीली रोशनी गायब हो गई। स्तंभ की चमक भी सामान्य हो गई। उसने कुछ क्षण सोचकर फिर प्रयास किया। इस बार उसने अपनी ऊर्जा बहुत कम मात्रा में बाहर भेजी। छोटी नीली रोशनी उसकी हथेली के ऊपर बनी। सातवाँ स्तंभ फिर चमका। लेकिन इस बार शौर्य ने ऊर्जा वापस नहीं ली। उसने केवल उसे स्थिर रखा। एक सांस। दो। तीन। चार। पाँच। रोशनी स्थिर रही। छठी सांस पर उसे लगा कि उसकी हथेली थोड़ी गर्म हो रही है। सातवीं सांस पर सातवाँ स्तंभ और चमक उठा। आठवीं सांस। शौर्य के शरीर के भीतर अचानक हल्का कंपन हुआ। उसने तुरंत ऊर्जा वापस खींच ली। रोशनी गायब हो गई। वह कुछ क्षण अपनी हथेली को देखता रहा। उसके हाथ में कोई चोट नहीं थी। लेकिन उसे एक अजीब अनुभव हुआ था। जैसे उसकी ऊर्जा किसी दूसरी ऊर्जा से जुड़ने की कोशिश कर रही थी। विशाल जीव अब भी उसे देख रहा था। शौर्य ने पूछा, "तुम जानते थे कि ऐसा होगा?" जीव शांत रहा। शौर्य उसके पास गया। इस बार वह उसके सीने के चिन्ह के करीब था। सातवाँ चिन्ह अब बहुत हल्का चमक रहा था। शौर्य ने हाथ आगे किया। लेकिन उसने उसे छुआ नहीं। उसने केवल कुछ इंच की दूरी पर हाथ रोक दिया। उसकी हथेली में हल्की नीली ऊर्जा बनी। जीव का चिन्ह चमक उठा। शौर्य ने धीरे से हाथ पीछे कर लिया। चिन्ह फिर मंद पड़ गया। अब उसे लगभग यकीन हो गया था। उसकी ऊर्जा और इस जीव के भीतर मौजूद ऊर्जा के बीच कोई संबंध था। लेकिन किस तरह का? यह अभी स्पष्ट नहीं था। उसी समय मैदान के बाहर से हल्की आवाज आई। किसी पत्थर के टूटने जैसी। शौर्य तुरंत मुड़ा। नीरिका भी उसकी तरफ देख रही थी। जलछाया जमीन के नीचे चला गया। विशाल जीव खड़ा हो गया। उसके चारों पैर जमीन पर मजबूत होकर टिक गए। शौर्य समझ गया। कोई मैदान के बाहर था। कुछ क्षण तक कोई दिखाई नहीं दिया। फिर एक पत्थर के पीछे से छोटी-सी छाया निकली। फिर दूसरी। फिर तीसरी। शौर्य ने ध्यान से देखा। वे वही पारदर्शी जीव नहीं थे जिन्हें उसने रास्ते में देखा था। ये कुछ अलग थे। उनके शरीर पतले थे। उनकी आँखें लाल थीं। और उनके चारों ओर हल्की काली ऊर्जा घूम रही थी। एक। दो। तीन। फिर पाँच। फिर आठ। शौर्य ने अपनी ऊर्जा तैयार की। नीरिका ने पानी की पतली धाराएँ बना लीं। जलछाया जमीन के भीतर फैल गया। विशाल जीव ने धीमी गर्जना की। छोटे जीव पीछे नहीं हटे। वे धीरे-धीरे मैदान में प्रवेश करने लगे। शौर्य ने महसूस किया कि उनके भीतर की ऊर्जा बहुत कम थी। लेकिन उनकी संख्या अधिक थी। उसने एक कदम पीछे लिया। फिर रुक गया। उसे लाल आकृति की बात याद आई। कमजोर शक्ति। लेकिन निर्णय महत्वपूर्ण। शौर्य ने अपनी हथेली खोली। इस बार उसने तुरंत हमला नहीं किया। उसने सातों स्तंभों को देखा। फिर मैदान में फैली ऊर्जा को महसूस किया। अग्नि। जल। वायु। पृथ्वी। प्रकाश। छाया। और सातवाँ। उसे अचानक समझ आया कि यह स्थान केवल शक्ति बढ़ाने के लिए नहीं था। यह संतुलन सिखाने के लिए था। शौर्य ने नीरिका की तरफ देखा। "पानी को रोकना मत।" नीरिका ने उसकी ओर देखा। "उसे घूमने दो।" नीरिका ने अपनी जलधारा को सीधा रखने के बजाय गोलाकार घुमाना शुरू किया। पानी धीरे-धीरे पूरे मैदान के किनारे फैल गया। छोटे जीवों की गति धीमी हो गई। उसी समय जलछाया जमीन से निकलकर दूसरी दिशा में फैल गया। शौर्य ने अपनी हथेली की नीली ऊर्जा को स्थिर किया। इस बार उसने उसे हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया। उसने उसे सातवें स्तंभ की तरफ उठाया। स्तंभ से एक बहुत पतली ऊर्जा की किरण निकली। वह शौर्य की हथेली से जुड़ गई। शौर्य का शरीर हल्का कांपा। लेकिन उसने ऊर्जा को टूटने नहीं दिया। उसने सांस नियंत्रित की। छोटे जीव अचानक रुक गए। उनकी लाल आँखें सातवें स्तंभ की तरफ मुड़ गईं। शौर्य ने मौका देखा। उसने अपनी हथेली धीरे से नीचे की। ऊर्जा की पतली लहर जमीन पर फैल गई। उसने किसी जीव पर सीधा प्रहार नहीं किया। लेकिन जैसे ही ऊर्जा उनके पास पहुँची, वे पीछे हटने लगे। एक। फिर दूसरा। फिर तीसरा। कुछ ही क्षण में सभी छोटे जीव मैदान से बाहर चले गए। शौर्य ने राहत की सांस ली। उसने अपनी ऊर्जा वापस खींच ली। सातवाँ स्तंभ फिर शांत हो गया। विशाल जीव ने उसे देखा। इस बार उसकी आँखों में पहले से अलग भाव था। शायद स्वीकृति। शायद चेतावनी। शायद दोनों। शौर्य ने धीरे से पूछा, "अब क्या?" विशाल जीव ने मैदान के दूसरे छोर की तरफ देखा। वहाँ पत्थर की एक बंद दीवार थी। शौर्य ने पहले उसे देखा नहीं था। अब वह स्पष्ट दिखाई दे रही थी। दीवार के बीच एक दरवाजा था। उस पर सात ताले बने थे। हर ताले के ऊपर अलग चिन्ह। पहले छह स्पष्ट थे। लेकिन सातवाँ खाली था। शौर्य उस दरवाजे के पास गया। उसने पहला चिन्ह छुआ। कुछ नहीं हुआ। दूसरा। कुछ नहीं। तीसरा। कुछ नहीं। छठा। कुछ नहीं। फिर उसने सातवें खाली स्थान को देखा। वहाँ किसी चिन्ह की जगह केवल एक गहरी गोल आकृति थी। उसने अपनी हथेली उसके ऊपर रखी। कुछ नहीं हुआ। शौर्य ने हाथ हटा लिया। फिर उसे कुछ याद आया। लाल आकृति ने कहा था कि शक्ति को शरीर के बाहर स्थिर करना सीखो। उसने फिर अपनी ऊर्जा बाहर निकाली। छोटी नीली रोशनी बनी। उसने उसे सातवें स्थान के सामने रखा। इस बार दरवाजे के भीतर से हल्की आवाज आई। टक। शौर्य स्थिर हो गया। एक छोटा ताला घूम गया। उसने धीरे से पीछे देखा। विशाल जीव अब भी वहीं था। नीरिका शांत थी। जलछाया दरवाजे की छाया में फैल चुका था। शौर्य ने दूसरी बार ऊर्जा केंद्रित की। नीली रोशनी थोड़ी बड़ी हुई। दूसरी आवाज। टक। दूसरा ताला खुल गया। शौर्य की सांस थोड़ी तेज हो गई। उसने ऊर्जा को और स्थिर किया। तीसरा ताला। टक। फिर चौथा। टक। पाँचवाँ। टक। छठा। टक। शौर्य ने रुककर सांस ली। अब केवल सातवाँ ताला बचा था। उसने अपनी पूरी शक्ति लगाने के बजाय ऊर्जा को और शांत किया। उसने सांस अंदर ली। फिर बाहर छोड़ी। उसने अपने मन को खाली करने की कोशिश की। न डर। न जल्दबाजी। न लालच। केवल नियंत्रण। उसने हथेली आगे की। नीली रोशनी स्थिर हुई। सातवाँ ताला चमका। लेकिन इस बार दरवाजा नहीं खुला। उसकी जगह पूरे मैदान में एक आवाज गूँजी। "जिस शक्ति को तुम खोलना चाहते हो, उसका मूल्य जानते हो?" शौर्य ने चारों तरफ देखा। आवाज कहीं से नहीं आ रही थी। शायद दरवाजा बोल रहा था। उसने उत्तर दिया, "नहीं।" कुछ क्षण शांति रही। फिर आवाज आई। "अच्छा।" शौर्य चौंका। आवाज ने कहा, "जो अपने उत्तर के बारे में निश्चित नहीं होता, वही सीखने के योग्य होता है।" शौर्य कुछ नहीं बोला। "लेकिन शक्ति पाने से पहले तुम्हें यह तय करना होगा कि तुम उसे क्यों चाहते हो।" शौर्य ने आँखें बंद कर लीं। यह प्रश्न उसके लिए नया नहीं था। वह पहले भी खुद से पूछ चुका था। लेकिन इस बार उत्तर अलग था। उसने कहा, "मैं दूसरों से ऊपर उठने के लिए शक्ति नहीं चाहता।" उसकी आवाज शांत थी। "मैं इसलिए शक्ति चाहता हूँ क्योंकि जब मेरे सामने कोई खतरा आए, तो मैं केवल दूसरों के बचाने का इंतजार न करूँ।" "मैं अपने साथियों की रक्षा कर सकूँ।" "और अगर किसी दिन मेरे सामने ऐसा रास्ता आए जहाँ मुझे शक्ति और सही निर्णय में से एक चुनना पड़े, तो मैं सही निर्णय चुन सकूँ।" मैदान में शांति छा गई। फिर सातवाँ ताला चमकने लगा। शौर्य ने अपनी आँखें खोलीं। दरवाजे पर बना खाली स्थान अब नीली रोशनी से भर गया था। सातवाँ चिन्ह धीरे-धीरे उभरने लगा। वही चिन्ह। जो विशाल जीव के सीने पर था। जो नगर के स्तंभ पर था। और जो अब इस दरवाजे पर था। शौर्य पीछे हट गया। दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा। अंदर से कोई तेज रोशनी नहीं आई। कोई आवाज नहीं। सिर्फ अंधेरा। बहुत गहरा अंधेरा। विशाल जीव दरवाजे के पास आया। उसने अंदर देखा। फिर शौर्य की तरफ। शौर्य ने कुछ क्षण अंधेरे को देखा। उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी। लेकिन इस बार वह पीछे नहीं हटा। उसने नीरिका की तरफ देखा। फिर जलछाया की तरफ। दोनों उसके साथ थे। उसने पहला कदम दरवाजे की तरफ बढ़ाया। तभी पीछे से विशाल जीव की गर्जना सुनाई दी। शौर्य रुक गया। उसने पीछे देखा। जीव दरवाजे के बाहर ही खड़ा था। वह अंदर नहीं आ रहा था। शौर्य ने पूछा, "तुम अंदर नहीं आओगे?" जीव ने सिर हिलाया। शौर्य ने समझ लिया। आगे का रास्ता उसे अकेले तय करना था। उसने धीरे से सिर झुकाया। "ठीक है।" वह दरवाजे के भीतर चला गया। नीरिका उसके साथ थी। जलछाया उसकी छाया में। दरवाजा उनके पीछे धीरे-धीरे बंद होने लगा। बाहर खड़ा विशाल जीव अंतिम बार उन्हें देख रहा था। दरवाजा पूरी तरह बंद हो गया। अंधेरा। कुछ क्षण तक शौर्य कुछ नहीं देख पाया। उसने हाथ आगे किया। नीली रोशनी पैदा की। इस बार वह पहले से अधिक स्थिर थी। उस छोटी रोशनी ने उसके आसपास की दीवारों को उजागर किया। दीवारों पर सातों चिन्ह बने थे। लेकिन अब वे उलटे क्रम में थे। सात। छह। पाँच। चार। तीन। दो। एक। शौर्य ने उन्हें देखा। फिर उसकी नजर दीवार के सबसे नीचे लिखे एक छोटे वाक्य पर गई। वह धीरे-धीरे आगे झुका। शब्द पुराने थे। लेकिन पढ़े जा सकते थे। उसने बहुत धीमी आवाज में पढ़ा। "पहला द्वार शक्ति सिखाता है।" नीचे दूसरी पंक्ति थी। "दूसरा द्वार नियंत्रण।" तीसरी। "तीसरा द्वार चुनाव।" शौर्य की नजर वहीं रुक गई। तीसरा द्वार। अचानक उसे लाल आकृति की बात याद आई। अगर वह तीसरे द्वार तक पहुँच गया। शौर्य ने अंधेरे में सामने देखा। दूर बहुत हल्की लाल रोशनी दिखाई दे रही थी। उसे लगा जैसे कोई वहाँ उसका इंतजार कर रहा हो। उसने कदम बढ़ाया। एक। फिर दूसरा। उसकी नीली रोशनी दीवारों पर पड़ती रही। हर कदम के साथ अंधेरा थोड़ा कम होता गया। लेकिन उसी के साथ। बहुत दूर से किसी के चलने की आवाज आने लगी। एक कदम। फिर दूसरा। फिर तीसरा। शौर्य रुक गया। आवाज भी रुक गई। उसने आगे देखा। कोई दिखाई नहीं दिया। फिर आवाज आई। इस बार बहुत पास से। "आखिर तुम यहाँ पहुँच ही गए।" शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया। वह आवाज वह पहचानता था। लाल आकृति की। लेकिन इस बार उसमें पहले जैसी शांति नहीं थी। उसमें एक अजीब गंभीरता थी। शौर्य ने अपनी ऊर्जा तैयार की। नीरिका उसके पास आ गई। जलछाया फैल गया। अंधेरे के भीतर लाल रोशनी धीरे-धीरे तेज होने लगी। और फिर। एक आकृति सामने दिखाई दी। वही लाल आँखें। वही शांत चेहरा। लेकिन इस बार उसके पीछे एक और छाया खड़ी थी। शौर्य की नजर उस दूसरी छाया पर गई। उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उसकी ऊर्जा पहचान में आ रही थी। वही ऊर्जा। जो उसने नगर के पुराने हिस्से में महसूस की थी। शौर्य की सांस रुक गई। लाल आकृति ने बहुत धीरे से कहा। "अब तुम्हें सच का पहला हिस्सा जानने का समय आ गया है।" और उसी क्षण। अंधेरे में सातवाँ चिन्ह पूरी तरह जाग उठा।

End of Chapter 16

Chapter 16: सातवें चिन्ह का रहस्य - समंदर का Sikandar | Novel AI Studio