Chapter 15 of 30

लाल छाया का सामना

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अध्याय 15 — लाल छाया का सामना लाल रोशनी अचानक पूरे मैदान में फैल गई। कुछ क्षणों के लिए शौर्य को कुछ भी दिखाई नहीं दिया। उसकी आँखों के सामने केवल लाल रंग था। गहरा। भारी। और इतना तीव्र कि उसे लगा जैसे कोई गर्म हवा उसके चेहरे से टकरा रही हो। उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं। उसका शरीर अपने आप पीछे हटने लगा। एक कदम। फिर आधा कदम। लेकिन उसने खुद को रोक लिया। उसने गहरी सांस ली। धीरे। बहुत धीरे। उसने अपने भीतर की ऊर्जा को महसूस करने की कोशिश की। उसकी ऊर्जा अभी भी मौजूद थी। लेकिन पहले जैसी सहज नहीं थी। लाल रोशनी के दबाव में उसका प्रवाह थोड़ा अस्थिर हो गया था। शौर्य ने अपने हाथों को ढीला किया। मुट्ठियाँ खोल दीं। कंधों का तनाव कम किया। फिर उसने आँखें खोलीं। सामने खड़ी आकृति अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसका शरीर मनुष्य जैसा था। लंबा। सीधा। शांत। लेकिन उसके शरीर के चारों ओर लाल ऊर्जा की पतली परत लगातार घूम रही थी। वह ऊर्जा आग जैसी नहीं थी। उसमें कोई लपट नहीं थी। फिर भी उसके आसपास की हवा उससे गर्म लग रही थी। आकृति का चेहरा आधा अंधेरे में था। आँखें दिखाई दे रही थीं। लाल। लेकिन उनमें क्रोध नहीं था। बल्कि एक अजीब शांति थी। ऐसी शांति जो शौर्य को और अधिक असहज कर रही थी। नीरिका धीरे-धीरे उसके सामने आ गई। उसकी छोटी-सी देह के चारों ओर पानी की पतली परत घूमने लगी। जलछाया जमीन के नीचे था। शौर्य उसकी ऊर्जा महसूस कर सकता था। वह तैयार था। लेकिन हमला नहीं कर रहा था। शौर्य ने सामने वाली आकृति से नजर नहीं हटाई। कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर आकृति ने धीरे से कहा, "तुमने कुछ सीखा है।" उसकी आवाज भारी नहीं थी। बहुत सामान्य थी। लेकिन मैदान की खामोशी में वह आवाज दूर तक फैल गई। शौर्य ने उत्तर नहीं दिया। आकृति ने अपना सिर थोड़ा झुकाया। "पहले तुम तुरंत हमला कर देते।" शौर्य ने शांत स्वर में पूछा, "तुम मुझे जानते हो?" आकृति कुछ क्षण चुप रही। उसने सीधे शौर्य की आँखों में देखा। फिर कहा, "मैं तुम्हारे बारे में उतना जानता हूँ जितना इस नगर को जानने वाले बहुत कम लोग जानते हैं।" शौर्य की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं। "कौन हो तुम?" आकृति ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने अपना दाहिना हाथ धीरे-धीरे उठाया। लाल ऊर्जा उसकी हथेली के ऊपर जमा होने लगी। पहले एक छोटी रोशनी बनी। फिर वह थोड़ी बड़ी हुई। फिर उसके चारों ओर ऊर्जा की पतली लहरें घूमने लगीं। शौर्य का शरीर तुरंत सतर्क हो गया। उसे खतरा महसूस हो रहा था। बहुत साफ। वह हमला करने वाला था। शौर्य ने नीरिका को संकेत दिया। नीरिका ने तुरंत अपने सामने पानी की पतली दीवार बना ली। जलछाया जमीन के भीतर और गहराई में चला गया। शौर्य ने अपनी ऊर्जा को हथेली में केंद्रित किया। लेकिन इस बार उसने उसे बाहर नहीं निकाला। वह केवल तैयार रहा। आकृति ने अपना हाथ आगे किया। अगले ही क्षण लाल ऊर्जा की एक सीधी लहर शौर्य की तरफ दौड़ी। शौर्य ने तुरंत बाईं तरफ छलांग लगाई। लाल ऊर्जा उसके शरीर से कुछ ही दूरी से गुजर गई। उसके पीछे जमीन पर जाकर टकराई। एक भारी आवाज हुई। धड़ाम। पत्थर की जमीन में गहरी दरार बन गई। कुछ छोटे पत्थर हवा में उछले। फिर धीरे-धीरे जमीन पर गिरने लगे। शौर्य कुछ दूर जाकर रुका। उसने पीछे देखा। उसके चेहरे की गंभीरता और बढ़ गई। एक ही हमला। और जमीन इतनी आसानी से टूट गई। अगर वह उस हमले के सामने खड़ा रहता तो परिणाम अच्छा नहीं होता। उसने तुरंत समझ लिया कि सामने वाला उससे बहुत अधिक शक्तिशाली था। लेकिन उसने डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उसने अपने पैरों को स्थिर किया। सांस नियंत्रित की। और फिर सामने देखा। लाल आकृति अब भी उसी जगह खड़ी थी। जैसे उसने कोई बड़ा प्रयास किया ही न हो। उसने शौर्य की तरफ देखा। "तुम तेज हो।" शौर्य ने उत्तर नहीं दिया। आकृति ने कहा, "लेकिन केवल गति से तुम नहीं बच सकते।" उसने फिर हाथ उठाया। इस बार लाल ऊर्जा एक गोले की तरह उसके चारों ओर बनने लगी। शौर्य ने नीरिका को संकेत किया। नीरिका ने तुरंत पानी की धारा उठाई। एक लंबी जलधारा हवा में घूमती हुई सामने गई। शौर्य उसी धारा के साथ आगे बढ़ा। उसने अपने शरीर की ऊर्जा को पैरों में केंद्रित किया। उसकी गति अचानक बढ़ गई। वह सीधे आकृति के सामने पहुँचने की कोशिश कर रहा था। आकृति ने केवल अपनी हथेली आगे की। जलधारा उसके सामने रुक गई। कुछ क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे समय रुक गया हो। पानी हवा में स्थिर था। उसके पीछे शौर्य खड़ा था। उसने पूरी ताकत से ऊर्जा आगे धकेली। लेकिन पानी आगे नहीं बढ़ा। आकृति की लाल ऊर्जा उसे रोक रही थी। शौर्य के पैरों के नीचे की जमीन धीरे-धीरे टूटने लगी। उसने दाँत भींच लिए। उसने और शक्ति लगाई। लेकिन सामने वाली ऊर्जा बहुत भारी थी। वह एक कदम पीछे खिसका। फिर दूसरा। उसने खुद को रोकने की कोशिश की। लेकिन तीसरे कदम पर उसका संतुलन थोड़ा बिगड़ गया। उसी क्षण जमीन के नीचे से जलछाया बाहर आया। उसकी छाया फैलती हुई लाल आकृति के पैरों तक पहुँची। आकृति पहली बार सचमुच रुकी। उसने नीचे देखा। जलछाया की छाया उसके पैरों के चारों ओर फैल चुकी थी। आकृति ने अपनी ऊर्जा बढ़ाई। लेकिन जलछाया ने उसी क्षण अपनी दिशा बदल दी। छाया जमीन से उठकर दूसरी तरफ चली गई। आकृति का ध्यान एक पल के लिए भटका। बस एक पल। लेकिन शौर्य के लिए इतना पर्याप्त था। उसने पानी की धारा को अचानक ऊपर नहीं, बल्कि नीचे मोड़ दिया। पानी जमीन पर फैल गया। आकृति का संतुलन थोड़ा बिगड़ा। शौर्य ने उसी क्षण छलांग लगाई। उसने अपनी पूरी ऊर्जा मुट्ठी में केंद्रित की। उसका हाथ लाल ऊर्जा की परत से टकराया। एक तेज कंपन पूरे मैदान में फैल गया। शौर्य को लगा जैसे उसने पत्थर की दीवार पर प्रहार किया हो। अगले ही क्षण उसकी पूरी देह पीछे की तरफ फेंक दी गई। वह हवा में घूमता हुआ जमीन पर गिरा। उसके कंधे में तेज दर्द हुआ। वह कुछ क्षण हिला नहीं। नीरिका तुरंत उसके पास आ गई। उसकी पानी जैसी ऊर्जा शौर्य के आसपास फैल गई। शौर्य ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। "मैं ठीक हूँ।" उसने धीरे से कहा। वह खुद भी जानता था कि चोट बहुत गंभीर नहीं थी। लेकिन दर्द था। उसने जमीन पर हाथ रखा और धीरे-धीरे उठ गया। सामने आकृति अब भी खड़ी थी। उसके हाथ पर कोई चोट नहीं थी। उसने अपनी हथेली को देखा। फिर शौर्य को। "तुम्हारी शक्ति कमजोर है।" शौर्य ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर शांत स्वर में कहा, "मुझे पता है।" आकृति की आँखों में पहली बार हल्का बदलाव आया। "फिर भी तुम लड़ रहे हो?" शौर्य ने नीरिका की तरफ देखा। फिर उस जगह जहाँ जलछाया छिपा था। उसने कहा, "हाँ।" "क्यों?" शौर्य कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, "क्योंकि मुझे अभी हारना नहीं है।" आकृति कुछ देर तक उसे देखती रही। मैदान फिर शांत हो गया। नीरिका की ऊर्जा धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। जलछाया फिर शौर्य के पीछे दिखाई दिया। उसकी आँखों में हल्की नीली चमक थी। आकृति ने अचानक पूछा, "तुम्हें डर नहीं लग रहा?" शौर्य ने सच बोलने का फैसला किया। "लग रहा है।" आकृति शांत रही। शौर्य ने आगे कहा, "लेकिन डर लगने का मतलब यह नहीं कि मैं भाग जाऊँ।" कुछ क्षण तक कोई आवाज नहीं हुई। फिर आकृति के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। बहुत छोटी। लेकिन शौर्य ने उसे देख लिया। "अच्छा उत्तर।" शौर्य ने अपनी सांस सामान्य की। वह अब भी समझ नहीं पा रहा था कि सामने वाला वास्तव में चाहता क्या है। लेकिन एक बात स्पष्ट थी। यह लड़ाई साधारण नहीं थी। सामने वाला उसे मारना नहीं चाहता था। वह उसे देख रहा था। जाँच रहा था। उसकी क्षमता से ज्यादा उसके निर्णय को। आकृति ने अपना हाथ नीचे कर दिया। लाल ऊर्जा धीरे-धीरे कम होने लगी। शौर्य ने भी अपनी ऊर्जा ढीली कर दी। "तुमने हमला रोक दिया।" आकृति ने कहा, "क्योंकि मुझे जो देखना था, वह मैंने देख लिया।" "क्या?" "तुम्हारा निर्णय।" शौर्य चुप रहा। आकृति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी। अब उसके कदमों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। एक। फिर दूसरा। फिर तीसरा। वह शौर्य से कुछ कदम दूर आकर रुक गई। "तुम्हारे पास अभी पर्याप्त शक्ति नहीं है।" "लेकिन तुमने अपनी कमजोरियों को पहचानना शुरू कर दिया है।" उसने नीरिका की तरफ देखा। "तुमने अपने पहले बंधन को केवल रक्षा के लिए इस्तेमाल नहीं किया।" फिर उसने जमीन की तरफ देखा। "और दूसरे को केवल हमला करने के लिए नहीं।" शौर्य ने ध्यान से उसकी बात सुनी। आकृति ने कहा, "तुम दोनों को अलग-अलग शक्ति की तरह देखते हो।" "अभी यही तुम्हारी सीमा है।" "लेकिन अगर तुमने इनके बीच सही तालमेल बनाना सीख लिया, तो तुम्हारी शक्ति तुम्हारे वर्तमान स्तर से कई गुना बढ़ सकती है।" शौर्य ने पूछा, "कैसे?" आकृति ने सीधे उत्तर नहीं दिया। उसने अपनी हथेली खोली। लाल रोशनी धीरे-धीरे उसके हाथ के ऊपर जमा होने लगी। इस बार वह हमला नहीं थी। वह एक छोटा लाल क्रिस्टल था। क्रिस्टल हवा में कुछ क्षण स्थिर रहा। फिर धीरे-धीरे शौर्य की तरफ बढ़ा। शौर्य ने हाथ आगे किया। लेकिन क्रिस्टल उसकी हथेली तक पहुँचने से पहले रुक गया। "इसे लो।" शौर्य ने उसे देखा। "यह क्या है?" "ऊर्जा का टुकड़ा।" "किसलिए?" "तुम्हारे अगले चरण के लिए।" शौर्य ने तुरंत उसे नहीं लिया। उसने क्रिस्टल को ध्यान से देखा। उसमें कोई स्पष्ट शत्रुता नहीं थी। लेकिन उसमें शक्ति थी। बहुत अधिक शक्ति। शौर्य ने पूछा, "अगर मैंने इसे अभी इस्तेमाल किया तो?" आकृति ने कहा, "तो तुम्हारा शरीर इसे सह नहीं पाएगा।" शौर्य ने अपनी हथेली नीचे कर ली। "फिर मुझे इसे अभी क्यों लेना चाहिए?" आकृति ने कहा, "लेना और इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।" शौर्य चुप रहा। आकृति ने आगे कहा, "इसे अपने पास रखो।" "जब तुम्हारा शरीर तैयार होगा, तब इसका उपयोग करना।" शौर्य ने कुछ क्षण सोचा। फिर उसने हाथ आगे किया। क्रिस्टल उसकी हथेली पर आकर ठहर गया। जैसे ही उसने उसे छुआ, उसके शरीर में गर्म ऊर्जा की हल्की लहर दौड़ी। शौर्य ने तुरंत सांस रोक ली। ऊर्जा उसकी हथेली से आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन उसने उसे नियंत्रित किया। धीरे-धीरे वह वापस क्रिस्टल में लौट गई। शौर्य ने राहत की सांस ली। प्रणाली अपने आप सक्रिय हो गई। लाल ऊर्जा क्रिस्टल। उपयोग: ऊर्जा नियंत्रण। स्थिति: अस्थिर। अनुशंसित स्तर: वर्तमान स्तर से ऊपर। शौर्य ने संदेश कुछ क्षण देखा। फिर प्रणाली बंद कर दी। उसने क्रिस्टल सुरक्षित तरीके से अपने बैग में रख लिया। आकृति ने सिर हिलाया। "अच्छा।" शौर्य ने पूछा, "तुम्हें कैसे पता कि मैं इसका इस्तेमाल अभी नहीं करूँगा?" आकृति ने कहा, "क्योंकि तुमने अभी दूसरा परीक्षण पार किया है।" "तुम्हें लालच दिखाया गया था।" "तुमने उसे ठुकराया।" "अब तुम उसी गलती को दोहराओगे नहीं।" शौर्य कुछ पल चुप रहा। उसने महसूस किया कि सामने वाला उसके बारे में उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक जानता था। उसने पूछा, "तुम उस परीक्षण के बारे में कैसे जानते हो?" आकृति ने कोई उत्तर नहीं दिया। शौर्य ने फिर पूछा, "तुम कौन हो?" इस बार आकृति कुछ क्षण तक शांत रही। फिर उसने कहा, "तुम्हें अभी मेरा नाम जानने की आवश्यकता नहीं है।" शौर्य के मन में तुरंत अर्जुन की याद आई। उसने कहा, "अर्जुन ने भी यही कहा था।" आकृति की आँखों में हल्की चमक आई। "तुम उससे मिल चुके हो।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "तुम उसे जानते हो?" "जानता हूँ।" "कौन है वह?" आकृति ने सिर थोड़ा घुमाया। "तीसरा धारक।" "और तुम?" कुछ क्षण की शांति। फिर उसने कहा, "मैं उसका पीछा करने वाला हूँ।" शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया। "क्यों?" आकृति ने उत्तर दिया, "क्योंकि तीसरा धारक अकेला नहीं है।" शौर्य ने तुरंत पूछा, "उसके साथ कौन है?" आकृति ने उसकी तरफ देखा। "अभी तुम उसके लिए तैयार नहीं हो।" "लेकिन मुझे जानना होगा।" "जानना और समझना अलग चीजें हैं।" शौर्य चुप हो गया। आकृति ने आगे कहा, "अगर तुम अभी उसके पीछे गए, तो शायद तुम उससे पहले ही हार जाओगे।" "लेकिन अगर तुम अपनी शक्ति को नियंत्रित करना सीखते रहे, तो एक दिन तुम उसके सामने खड़े हो सकोगे।" शौर्य ने उसकी आँखों में देखा। "क्या वह मेरा दुश्मन है?" आकृति ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। काफी देर बाद उसने कहा, "अभी नहीं।" शौर्य ने इस उत्तर को ध्यान से सुना। अभी नहीं। इसका मतलब आगे कुछ बदल सकता था। आकृति ने नगर के उत्तर की तरफ देखा। "अब तुम्हें यहाँ से जाना होगा।" "कहाँ?" उसने दूर दिखाई दे रही ऊँची दीवार की तरफ इशारा किया। "नगर के उत्तर में एक पुराना प्रशिक्षण क्षेत्र है।" शौर्य ने उस दिशा में देखा। "वहाँ क्या है?" "तुम्हारी अगली सीढ़ी।" "किस तरह की?" आकृति ने कहा, "ऊर्जा को शरीर के बाहर स्थिर करना।" शौर्य कुछ क्षण चुप रहा। वह क्षमता उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। अभी कुछ समय पहले उसने मैदान में अभ्यास करते हुए अपनी हथेली के ऊपर केवल एक छोटी नीली रोशनी कुछ क्षण के लिए स्थिर की थी। अगर वह उसे पूरी तरह नियंत्रित करना सीख जाए, तो शायद वह अपनी ऊर्जा को लंबे समय तक इस्तेमाल कर सके। आकृति ने कहा, "लेकिन वहाँ जाना आसान नहीं होगा।" शौर्य ने पूछा, "क्यों?" "क्योंकि रास्ते में तुम्हें ऐसे जीव मिलेंगे जो इस नगर की ऊर्जा पर जीवित हैं।" "वे तुम्हें देखते ही हमला कर सकते हैं।" शौर्य ने पूछा, "कितने?" आकृति ने उसकी तरफ देखा। "इतने कि गिनना संभव नहीं।" शौर्य ने कुछ क्षण आँखें बंद कर लीं। फिर उसने धीरे से सांस छोड़ी। उसे लगा था कि नगर में आने के बाद चीजें कुछ आसान होंगी। लेकिन शायद असली कठिनाई अब शुरू हो रही थी। उसने आँखें खोलीं। "और तुम?" आकृति की लाल रोशनी धीरे-धीरे कम होने लगी। "मैं अपना रास्ता देखूँगा।" शौर्य ने कहा, "हम फिर मिलेंगे?" आकृति ने कुछ पल उसे देखा। "अगर तुम तीसरे द्वार तक पहुँच गए।" शौर्य ने इस उत्तर को याद रख लिया। आकृति धीरे-धीरे पीछे हटने लगी। लाल ऊर्जा उसके शरीर के चारों ओर फैलने लगी। कुछ ही क्षण में उसका शरीर रोशनी में बदलने लगा। शौर्य ने उसे रोकना चाहा। "रुको।" आकृति ठहर गई। शौर्य ने पूछा, "तुम्हारा नाम सच में अर्जुन नहीं है?" कुछ क्षण तक कोई उत्तर नहीं आया। फिर आकृति ने कहा, "जिस अर्जुन से तुम मिले थे, वह मैं नहीं हूँ।" शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया। "तो वह कौन है?" "तीसरा धारक।" "और तुम?" लाल आकृति ने पहली बार अपना चेहरा पूरी तरह उठाया। उसकी आँखों में गहरी लाल चमक थी। "मुझे अभी नाम से मत खोजो।" "जब समय आएगा, तुम खुद मुझे पहचान लोगे।" इसके बाद लाल रोशनी धीरे-धीरे हवा में घुल गई। आकृति गायब हो गई। मैदान फिर शांत हो गया। कुछ समय तक शौर्य वहीं खड़ा रहा। वह सोचता रहा। तीसरा धारक। अर्जुन। उसका पीछा करने वाला। और अब उत्तर में स्थित प्रशिक्षण क्षेत्र। बहुत सारे प्रश्न थे। लेकिन कोई स्पष्ट उत्तर नहीं। नीरिका धीरे-धीरे उसके पास आई। उसने शौर्य की हथेली को छुआ। शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "हमें जाना होगा।" नीरिका की ऊर्जा शांत थी। जलछाया भी जमीन के नीचे से निकल आया। शौर्य ने दोनों को देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। "हम साथ चलेंगे।" वह मैदान से बाहर निकलने लगा। नगर का रास्ता अब पहले से अधिक लंबा लग रहा था। लेकिन इस बार उसकी चाल में पहले जैसी हड़बड़ी नहीं थी। वह धीरे-धीरे चल रहा था। हर कदम सोचकर। हर मोड़ देखकर। किसी भी ऊर्जा को अनदेखा किए बिना। कुछ देर बाद उसे एक पुरानी इमारत दिखाई दी। उसकी दीवार आधी टूटी थी। ऊपर पानी की हल्की परत जमा थी। अंदर से कुछ आवाज आई। शौर्य रुक गया। नीरिका भी रुक गई। जलछाया जमीन में समा गया। कुछ सेकंड तक कोई हलचल नहीं हुई। फिर दीवार के पीछे से एक छोटा जीव बाहर आया। वह देखने में किसी लोमड़ी जैसा था। लेकिन उसका शरीर पानी जैसा पारदर्शी था। उसकी आँखें सफेद थीं। वह कुछ क्षण शौर्य को देखता रहा। शौर्य ने हाथ नीचे रखा। उसने हमला नहीं किया। जीव ने भी हमला नहीं किया। वह धीरे-धीरे पीछे गया। फिर मुड़ा और भाग गया। शौर्य ने उसे जाते देखा। "यह हमें देख रहा था।" नीरिका की ऊर्जा में हल्की जिज्ञासा थी। शौर्य आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने के बाद उसे दूसरा जीव दिखाई दिया। फिर तीसरा। लेकिन कोई भी तुरंत हमला नहीं कर रहा था। यह बात शौर्य को अजीब लगी। जैसे नगर के जीव पहले उसे देख रहे हों। फिर उसके बारे में निर्णय ले रहे हों। वह आगे बढ़ता रहा। कुछ देर बाद उसे सामने एक विशाल पत्थर का पुल दिखाई दिया। पुल के नीचे गहरा पानी बह रहा था। उसकी गहराई दिखाई नहीं दे रही थी। शौर्य ने पुल पर पहला कदम रखा। उसी क्षण पीछे से आवाज आई। "रुक जाओ।" शौर्य तुरंत पलटा। कोई नहीं था। उसने चारों तरफ देखा। खाली सड़क। टूटी हुई इमारतें। धीमी पानी की आवाज। कुछ नहीं। फिर आवाज आई। इस बार बहुत करीब से। "बाईं तरफ मत जाना।" शौर्य ने बाईं तरफ देखा। वहाँ पुल के नीचे जाने वाली एक संकरी सीढ़ी थी। उसे पहले वह दिखाई ही नहीं दी थी। शौर्य कुछ देर उसे देखता रहा। फिर उसने पूछा, "क्यों?" कोई उत्तर नहीं आया। जलछाया अचानक बेचैन हो गया। उसकी ऊर्जा सीढ़ियों की दिशा में चली गई। शौर्य समझ गया। वह रास्ता सुरक्षित नहीं था। उसने दाईं तरफ कदम बढ़ाया। पुल पार करते हुए उसने पीछे नहीं देखा। लेकिन उसके मन में एक नया सवाल पैदा हो चुका था। उसे चेतावनी किसने दी थी? अर्जुन? कोई दूसरा धारक? या इस नगर की अपनी चेतना? उसने उस प्रश्न को फिलहाल अपने मन में रहने दिया। पुल के दूसरी तरफ एक खुला मैदान था। मैदान के बीच कई पुराने पत्थर लगे थे। हर पत्थर पर एक अलग शब्द लिखा था। पहले पर। "श्वास।" दूसरे पर। "धैर्य।" तीसरे पर। "नियंत्रण।" और चौथे पर। "संतुलन।" शौर्य चौथे पत्थर के सामने जाकर रुक गया। उसे लगा जैसे यह पूरा स्थान उसी के लिए बनाया गया हो। उसने अपनी हथेली खोली। लाल क्रिस्टल बैग के भीतर सुरक्षित था। फिर उसने अपनी हथेली को देखा। वह छोटी नीली ऊर्जा अब भी उसके मन में थी। उसने धीरे से जमीन पर बैठने का फैसला किया। नीरिका उसके पास पानी के एक छोटे घेरे में चली गई। जलछाया उसकी छाया के पास फैल गया। शौर्य ने आँखें बंद कर लीं। पहली सांस। धीरे। बहुत धीरे। उसने अपनी सांस को सुनने की कोशिश की। पहले उसे केवल अपने दिल की धड़कन सुनाई दी। धक। धक। धक। कुछ देर बाद उसकी सांस और धड़कन एक लय में आने लगी। उसने अपनी ऊर्जा को महसूस किया। पहले वह बिखरी हुई थी। कुछ छाती में। कुछ कंधों के पास। कुछ हाथों में। कुछ पैरों में। और कुछ ऐसी जगहों पर जिन्हें वह ठीक से पहचान भी नहीं पा रहा था। उसने ऊर्जा को खींचने की कोशिश नहीं की। केवल उसे महसूस किया। कुछ देर तक। फिर धीरे-धीरे उसने उसे अपनी हथेली की तरफ लाना शुरू किया। पहली कोशिश असफल हुई। ऊर्जा हाथ तक आई। लेकिन तुरंत बिखर गई। दूसरी कोशिश। इस बार थोड़ी बेहतर। तीसरी। ऊर्जा कुछ क्षण हथेली में रुकी। फिर गायब। शौर्य ने आँखें नहीं खोलीं। वह बैठा रहा। समय धीरे-धीरे बीतता गया। एक घंटा। शायद उससे भी अधिक। उसे समय का ध्यान नहीं रहा। उसके शरीर में थकान बढ़ती गई। लेकिन उसने अभ्यास नहीं छोड़ा। कई बार ऊर्जा बिखरी। कई बार वह पूरी तरह समाप्त हो गई। फिर उसने दोबारा शुरुआत की। श्वास। धैर्य। नियंत्रण। संतुलन। चारों शब्द उसके मन में घूमते रहे। बहुत देर बाद। उसकी हथेली के ऊपर एक छोटी नीली रोशनी दिखाई दी। इतनी छोटी कि पहली नजर में वह केवल एक चमक लगती। लेकिन वह स्थिर थी। शौर्य ने धीरे से आँखें खोलीं। उसने अपनी हथेली को देखा। नीली रोशनी कुछ सेकंड तक वहीं रही। फिर थोड़ी बड़ी हुई। फिर स्थिर। शौर्य ने सांस रोकने के बजाय सामान्य सांस ली। इस बार रोशनी नहीं टूटी। उसने बहुत धीरे से मुस्कुराया। वह सफल हुआ था। बहुत छोटे स्तर पर। लेकिन उसने अपनी ऊर्जा को शरीर के बाहर स्थिर कर दिया था। कुछ क्षण बाद रोशनी धीरे-धीरे गायब हो गई। शौर्य ने हथेली बंद कर ली। उसने नीरिका की तरफ देखा। नीरिका की ऊर्जा में हल्की खुशी थी। जलछाया भी उसके पास आ गया। शौर्य ने दोनों को देखा। "यह सिर्फ शुरुआत है।" उसी क्षण दूर उत्तर दिशा से भारी कंपन आया। पूरा मैदान हल्का-सा हिल गया। शौर्य तुरंत खड़ा हो गया। नीरिका पानी से बाहर आ गई। जलछाया जमीन के नीचे गायब हो गया। दूर की विशाल दीवार के ऊपर नीली रोशनी तेज हो गई। फिर एक। दो। तीन। तीन रोशनियाँ एक साथ जल उठीं। शौर्य ने उन्हें ध्यान से देखा। उसकी प्रणाली अपने आप सक्रिय हो गई। नया क्षेत्र सक्रिय। प्रशिक्षण क्षेत्र। स्थिति: खुला। शौर्य ने राहत की सांस ली। लेकिन संदेश वहीं खत्म नहीं हुआ। उसके नीचे एक और पंक्ति दिखाई दी। अज्ञात ऊर्जा स्रोत। निकट। शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया। वह धीरे-धीरे सामने देखने लगा। धुंध के भीतर कुछ हिल रहा था। पहले बहुत दूर। फिर थोड़ा पास। पानी की सतह में हल्की लहरें उठीं। फिर जमीन हिली। एक बार। फिर दूसरी बार। शौर्य ने अपने पैर मजबूत किए। नीरिका उसके बाईं तरफ आ गई। जलछाया उसके पीछे फैल गया। शौर्य ने अपनी हथेली खोली। इस बार उसने ऊर्जा को बाहर निकाला। एक छोटी नीली रोशनी उसकी हथेली के ऊपर बनी। उसने उसे स्थिर किया। एक सांस। दो सांस। तीन। रोशनी बनी रही। उसने उसे देखकर मन में एक बात कही। वह अभी शक्तिशाली नहीं था। लेकिन अब वह अपनी शक्ति को नियंत्रित करना सीख रहा था। अचानक धुंध के भीतर से दो बड़ी आँखें दिखाई दीं। फिर चार। शौर्य की सांस रुक गई। विशाल आकृति धीरे-धीरे आगे आई। उसका शरीर पत्थर जैसी मोटी परतों से ढका था। उसके चार पैर थे। उसकी पीठ पर पुराने पत्थर जैसे उभरे हुए भाग थे। और उसके सीने के बीच एक चिन्ह चमक रहा था। वही सातवाँ चिन्ह। शौर्य की नजर उस चिन्ह पर जम गई। प्रणाली ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। अज्ञात जीव। ऊर्जा स्तर: निर्धारित नहीं। खतरा स्तर: उच्च। बंधन स्थिति: अज्ञात। शौर्य ने अपनी हथेली की नीली रोशनी को स्थिर रखा। उसने हमला नहीं किया। विशाल जीव धीरे-धीरे आगे आया। उसकी हर चाल से जमीन काँपती। एक कदम। फिर दूसरा। फिर तीसरा। वह अब इतना करीब था कि शौर्य उसके शरीर की ऊर्जा स्पष्ट महसूस कर सकता था। उस ऊर्जा में केवल शक्ति नहीं थी। उसमें बहुत पुरानी थकान भी थी। जैसे वह लंबे समय से इस स्थान की रक्षा कर रहा हो। शौर्य ने अपनी ऊर्जा थोड़ी कम कर दी। नीरिका ने भी अपनी जलधारा नीचे कर दी। जलछाया पूरी तरह छाया में बदल गया। विशाल जीव उनके सामने आकर रुक गया। उसने अपना विशाल सिर नीचे किया। उसकी चारों आँखें शौर्य पर टिक गईं। शौर्य ने उसकी आँखों में देखा। कुछ क्षण तक दोनों के बीच कोई हलचल नहीं हुई। फिर जीव ने बहुत धीमी आवाज में गर्जना की। आवाज इतनी भारी थी कि शौर्य की छाती तक कंपन पहुँच गया। लेकिन उसने पीछे कदम नहीं लिया। उसने केवल अपनी सांस नियंत्रित की। विशाल जीव ने फिर अपना सिर थोड़ा झुकाया। उसके सीने का सातवाँ चिन्ह अचानक चमक उठा। शौर्य की प्रणाली ने एक नया संदेश दिखाया। सातवें क्षेत्र की ऊर्जा से संपर्क। शौर्य की आँखें फैल गईं। यह केवल एक साधारण जीव नहीं था। इसका संबंध सातवें क्षेत्र से था। और शायद उसी कारण से वह यहाँ था। शौर्य ने धीरे से अपनी हथेली नीचे कर दी। नीली रोशनी बुझ गई। विशाल जीव ने उसे देखा। कुछ क्षण बाद उसने भी अपनी ऊर्जा कम कर दी। लेकिन वह वहाँ से गया नहीं। शौर्य ने बहुत धीमी आवाज में कहा। "तुम मुझसे लड़ना चाहते हो?" जीव शांत रहा। "या तुम मुझे कुछ दिखाना चाहते हो?" इस बार जीव ने अपना सिर घुमाया। उसने उत्तर दिशा की तरफ देखा। फिर वापस शौर्य को देखा। शौर्य समझ नहीं पाया। लेकिन उसके भीतर एक अजीब एहसास आया। शायद यह हमला करने नहीं आया था। शायद यह उसे किसी रास्ते की ओर बुला रहा था। उसने एक कदम आगे बढ़ाया। जीव पीछे नहीं हटा। शौर्य ने दूसरा कदम बढ़ाया। नीरिका उसके साथ चली। जलछाया भी। विशाल जीव मुड़ा। और धीरे-धीरे उत्तर की तरफ चलने लगा। शौर्य कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसने नीरिका की तरफ देखा। "चलो।" वह उसके पीछे बढ़ गया। इस बार उसके सामने कोई स्पष्ट रास्ता नहीं था। लेकिन पहली बार उसे लगा कि शायद उसे हर रास्ता खुद खोजने की जरूरत नहीं। कभी-कभी रास्ता खुद भी सामने आ सकता है। और इस बार। वह रास्ता उसे एक ऐसे रहस्य की तरफ ले जा रहा था। जिसका संबंध केवल दूसरे परीक्षण से नहीं। बल्कि सातवें क्षेत्र से था। शौर्य ने चलते हहुए पीछे देखा। दूर नगर की ऊँची दीवारें दिखाई दे रही थीं। उनके ऊपर सात स्तंभ। पहला। दूसरा। तीसरा। और बाकी चार अब भी अंधेरे में। लेकिन आज। पहली बार। सातवें स्तंभ के नीचे एक बहुत छोटी रोशनी दिखाई दी थी। शौर्य कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसकी नजर आगे चल रहे विशाल जीव पर गई। उसने धीरे से कदम बढ़ाया। उसे नहीं पता था कि आगे क्या मिलेगा। लेकिन अब उसे यह समझ आने लगा था कि इस दुनिया में हर शक्ति के पीछे एक कीमत थी। हर बंधन के पीछे एक जिम्मेदारी। और हर द्वार के पीछे केवल नई शक्ति नहीं। एक नया सत्य भी छिपा था। शौर्य ने अपने कदम तेज नहीं किए। वह उसी धीमी गति से चलता रहा। क्योंकि अब उसे जल्दी नहीं थी। उसे रास्ते को समझना था। उसे अपनी शक्ति को समझना था। और सबसे अधिक। उसे खुद को समझना था। दूर आगे विशाल जीव धीरे-धीरे धुंध में गायब होने लगा। शौर्य उसके पीछे चलता रहा। और उसी समय। बहुत दूर नगर के एक बंद कक्ष में। एक लाल रोशनी फिर से जली। किसी ने धीरे से आँखें खोलीं। और बहुत धीमी आवाज में कहा। "दूसरा परीक्षण पूरा हो गया।" कुछ क्षण की शांति रही। फिर दूसरी आवाज आई। "और उसने सातवें चिन्ह को देख लिया?" पहली आवाज ने उत्तर दिया। "हाँ।" दूसरी आवाज कुछ देर शांत रही। फिर उसने कहा। "तो अब समय कम है।" लाल रोशनी धीरे-धीरे बुझ गई। लेकिन उससे पहले एक आखिरी वाक्य अंधेरे में गूँजा। "अगर वह तीसरे द्वार तक पहुँच गया, तो उसे रोकना आसान नहीं होगा।"

End of Chapter 15