Chapter 14 of 30

दूसरा परीक्षण

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नगर की गलियाँ पहले से अधिक शांत हो गई थीं। शौर्य धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसके कदमों की आवाज पत्थर की सड़क पर पड़ती और फिर आसपास की ऊँची इमारतों से टकराकर वापस आती। ठक। फिर कुछ क्षण की शांति। ठक। फिर वही आवाज। वह चलते हुए बार-बार पीछे देख रहा था। नगर अब भी वैसा ही था। पुराना। खामोश। और रहस्यमय। लेकिन अब उसे लग रहा था कि यह खामोशी खाली नहीं थी। जैसे इन टूटी हुई दीवारों के भीतर बहुत कुछ अभी भी जीवित था। बस जागने का इंतजार कर रहा था। नीरिका उसके दाईं तरफ पानी की एक पतली धारा में तैर रही थी। यहाँ समुद्र का पानी केवल जमीन के ऊपर नहीं था। नगर की गलियों के बीच भी छोटी-छोटी जलधाराएँ बह रही थीं। कहीं पानी पत्थरों के नीचे से निकलता। कहीं दीवारों के बीच से। और कहीं जमीन पर बने पतले रास्तों में धीरे-धीरे बहता हुआ आगे चला जाता। जलछाया उसी पानी में था। कभी दिखाई देता। कभी अचानक गायब हो जाता। शौर्य ने चलते हुए उसे महसूस किया। वह बहुत शांत था। लेकिन पूरी तरह निश्चिंत नहीं। शौर्य ने सह-अनुभूति को थोड़ा बढ़ाया। एक हल्की बेचैनी उसके भीतर आई। जैसे जलछाया किसी ऐसी चीज को महसूस कर रहा हो जो शौर्य को दिखाई नहीं दे रही थी। शौर्य रुक गया। उसने चारों तरफ देखा। कुछ नहीं। सामने खाली सड़क। बाईं तरफ टूटी इमारत। दाईं तरफ पत्थर की दीवार। ऊपर पानी की धीमी परत। उसने धीरे से पूछा, "क्या हुआ?" जलछाया की ओर से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं आया। सिर्फ एक भावना। ऊपर। शौर्य ने सिर उठाया। छत पर कुछ नहीं था। फिर उसने थोड़ा ध्यान लगाया। उसे एक बहुत हल्की ऊर्जा महसूस हुई। बहुत दूर नहीं। उसने नीरिका की तरफ देखा। नीरिका भी ऊपर देख रही थी। शौर्य ने तुरंत अपनी ऊर्जा कम कर ली। वह नहीं चाहता था कि अगर कोई वहाँ हो तो उसकी मौजूदगी महसूस कर सके। कुछ क्षण बाद छत के किनारे पर एक छोटी-सी परछाईं दिखाई दी। शौर्य ने ध्यान से देखा। वह एक पक्षी जैसा जीव था। लेकिन सामान्य पक्षी नहीं। उसके पंख पारदर्शी थे। उसका शरीर बहुत पतला था। और उसकी आँखों में हल्की पीली रोशनी थी। वह कुछ पल शौर्य को देखता रहा। फिर उड़कर दूसरी इमारत की छत पर चला गया। शौर्य ने राहत की सांस ली। "सिर्फ एक जीव।" लेकिन जलछाया की बेचैनी कम नहीं हुई। शौर्य ने उसे महसूस किया। कुछ और था। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अब सड़क थोड़ी संकरी हो गई थी। कुछ दूर जाने के बाद उसके सामने एक विशाल पत्थर का द्वार आया। द्वार बंद था। उसके ऊपर तीन गोल निशान बने थे। पहले पर हल्की नीली रोशनी थी। दूसरे पर सफेद। तीसरा पूरी तरह बुझा हुआ था। शौर्य उसके सामने जाकर रुक गया। उसने हाथ आगे बढ़ाया। पत्थर को छुआ। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। उसने फिर हाथ रखा। इस बार बहुत हल्की कंपन हुई। फिर एक आवाज सुनाई दी। "दूसरा परीक्षण।" शौर्य का शरीर स्थिर हो गया। उसने चारों तरफ देखा। आवाज कहीं बाहर से नहीं आई थी। वह सीधे उसके मन में सुनाई दी थी। "प्रवेश करो।" द्वार धीरे-धीरे खुलने लगा। शौर्य ने नीरिका की तरफ देखा। फिर जलछाया की तरफ। दोनों उसके साथ थे। वह अंदर चला गया। जैसे ही उसने सीमा पार की, द्वार बंद हो गया। कमरे के भीतर रोशनी बहुत कम थी। लेकिन कुछ कदम आगे जाने के बाद जमीन पर हल्की सफेद रेखाएँ दिखाई देने लगीं। वे रेखाएँ एक गोलाकार रास्ता बना रही थीं। शौर्य ने धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू किया। कुछ ही कदम बाद उसे महसूस हुआ कि उसकी ऊर्जा बदल रही है। उसकी छाती भारी होने लगी। सांस थोड़ी गहरी हो गई। नीरिका की ऊर्जा भी धीमी हो गई। जलछाया की ऊर्जा लगभग गायब हो गई। शौर्य तुरंत रुक गया। "क्या हो रहा है?" कोई उत्तर नहीं। उसने अपनी ऊर्जा को सक्रिय करने की कोशिश की। लेकिन इस बार ऊर्जा बाहर नहीं आई। जैसे उसके शरीर के भीतर कोई दीवार बन गई हो। उसने दोबारा कोशिश की। कुछ नहीं। शौर्य ने भौंहें सिकोड़ लीं। यह पहली बार था जब उसकी शक्ति पूरी तरह रुक गई थी। उसने नीरिका को महसूस किया। वह भी अपने जल प्रवाह का उपयोग नहीं कर पा रही थी। जलछाया भी अपनी छाया प्रवाह क्षमता सक्रिय नहीं कर सकता था। शौर्य कुछ पल चुप रहा। फिर उसने समझा। यही परीक्षण था। यहाँ शक्ति का उपयोग ही संभव नहीं था। उसने चारों तरफ देखा। गोलाकार रास्ता आगे बढ़ रहा था। उसके किनारे कई छोटे-छोटे पत्थर रखे थे। हर पत्थर पर एक शब्द लिखा था। भय। क्रोध। अहंकार। लालच। अकेलापन। संदेह। और सबसे अंत में। विश्वास। शौर्य की नजर आखिरी शब्द पर जाकर रुक गई। उसने धीरे से वह शब्द पढ़ा। "विश्वास।" उसे अचानक अर्जुन की बात याद आई। अपने बंधन को गहरा करो। अपने मन को नियंत्रित करो। शौर्य आगे बढ़ा। पहला पत्थर। भय। जैसे ही वह उसके पास पहुँचा, कमरे का वातावरण बदल गया। उसके आसपास अंधेरा फैल गया। शौर्य ने आँखें झपकाईं। अचानक उसे लगा कि वह समुद्र में अकेला खड़ा है। चारों तरफ काला पानी। ऊपर कोई रोशनी नहीं। नीचे कोई जमीन नहीं। नीरिका नहीं। जलछाया नहीं। वह अकेला था। शौर्य ने हाथ आगे बढ़ाया। "नीरिका?" कोई उत्तर नहीं। उसने दूसरी तरफ देखा। कुछ नहीं। फिर बहुत दूर एक हल्की लाल चमक दिखाई दी। शौर्य ने उसे देखा। वह धीरे-धीरे उसकी तरफ आने लगी। उसका आकार बढ़ता गया। एक विशाल जीव। लाल आँखें। उसी तरह का जैसा उसने नगर के बाहर देखा था। शौर्य पीछे हट गया। उसका दिल तेज धड़कने लगा। जीव उसके सामने आ गया। उसने अपना सिर नीचे किया। फिर अचानक उसकी ओर झपटा। शौर्य ने बचने की कोशिश की। लेकिन उसके शरीर ने प्रतिक्रिया नहीं दी। अगले ही क्षण सब कुछ अंधकार में डूब गया। शौर्य ने आँखें खोलीं। वह फिर उसी कमरे में था। पहला पत्थर उसके पीछे था। उसने गहरी सांस ली। उसके माथे पर पसीना था। नीरिका उसके पास थी। वह उसकी ऊर्जा को महसूस कर सकता था। शांत। लेकिन चिंतित। शौर्य ने उसके सिर पर हाथ रखा। "मैं ठीक हूँ।" नीरिका की ऊर्जा थोड़ी शांत हुई। शौर्य ने उस पत्थर को देखा। भय। वह समझ गया। परीक्षण उसे उसके डर से लड़ने के लिए नहीं कह रहा था। वह केवल उसे दिखा रहा था कि उसका डर क्या है। वह डरता था। अकेले होने से। अपने साथियों को खोने से। और शायद सबसे ज्यादा इस बात से कि वह अपने सामने आने वाली शक्ति के सामने कमजोर साबित होगा। शौर्य ने धीरे से आगे कदम बढ़ाया। अगला पत्थर। क्रोध। इस बार कमरे में आवाजें गूँजने लगीं। किसी ने उसे कमजोर कहा। किसी ने उसका मजाक उड़ाया। किसी ने कहा कि वह इस यात्रा के लायक नहीं है। आवाजें एक के बाद एक आती रहीं। शौर्य की मुट्ठियाँ बंद हो गईं। उसके भीतर गुस्सा बढ़ने लगा। लेकिन उसने आँखें बंद कर लीं। उसने सांस ली। धीरे। फिर छोड़ी। आवाजें अब भी थीं। लेकिन वह उन्हें सुनते हुए भी प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था। कुछ देर बाद आवाजें बंद हो गईं। कमरा फिर शांत हो गया। शौर्य ने आँखें खोलीं। दूसरा पत्थर बुझ चुका था। अगला। अहंकार। इस बार उसके सामने एक अलग दृश्य आया। वह खुद को बहुत शक्तिशाली देख रहा था। उसके आसपास विशाल ऊर्जा थी। उसके पीछे नीरिका और जलछाया थे। लोग उसके सामने झुक रहे थे। दूर तक उसका नाम लिया जा रहा था। वह सातों द्वार पार कर चुका था। उसके पास ऐसी शक्ति थी जिसे कोई रोक नहीं सकता था। दृश्य इतना वास्तविक था कि कुछ पल के लिए शौर्य उसमें खो गया। फिर उसे एक बात महसूस हुई। वहाँ नीरिका की भावना नहीं थी। न जलछाया की। वे केवल उसके पीछे खड़े थे। जैसे उसके साथी नहीं। उसकी शक्ति का हिस्सा हों। शौर्य की आँखें खुल गईं। दृश्य टूट गया। उसने खुद को फिर उसी कमरे में पाया। उसने बहुत धीरे से कहा। "नहीं।" अगला पत्थर। लालच। इस बार उसके सामने कई चमकते हुए ऊर्जा क्रिस्टल दिखाई दिए। इतने सारे कि वह जितना चाहे उतना ले सकता था। हर क्रिस्टल में शक्ति थी। हर एक उसके वर्तमान स्तर को कई गुना बढ़ा सकता था। उसने एक क्रिस्टल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। फिर रुक गया। उसे अर्जुन की बात याद आई। अपनी सीमा से पहले शक्ति बढ़ाना शरीर को नुकसान पहुँचा सकता है। शौर्य ने हाथ पीछे कर लिया। क्रिस्टल गायब हो गए। अगला पत्थर। अकेलापन। इस बार कमरे में कोई दृश्य नहीं था। सिर्फ खालीपन। शौर्य ने चारों तरफ देखा। नीरिका नहीं। जलछाया नहीं। कोई आवाज नहीं। कोई ऊर्जा नहीं। कुछ भी नहीं। वह आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन उसके कदम भारी हो गए। उसे लगा जैसे वह बहुत दूर आ चुका है। जैसे उसकी पूरी यात्रा का कोई अर्थ नहीं। उसने आँखें बंद कर लीं। पहले नीरिका की ऊर्जा याद की। फिर जलछाया की। उनका उसके साथ होना। उनका उस पर भरोसा करना। उसने धीरे से कहा। "मैं अकेला नहीं हूँ।" कमरे में हल्की नीली रोशनी जली। अकेलापन वाला पत्थर बुझ गया। अब केवल एक पत्थर बचा था। संदेह। शौर्य उसके सामने जाकर रुक गया। इस बार कुछ भी नहीं हुआ। वह इंतजार करता रहा। एक क्षण। दो। तीन। फिर उसके सामने दो रास्ते दिखाई दिए। बाईं तरफ लिखा था। प्रणाली पर विश्वास। दाईं तरफ। अपने निर्णय पर विश्वास। शौर्य कुछ देर तक दोनों को देखता रहा। यह सबसे कठिन था। क्योंकि उसे सच में पता नहीं था कि सही क्या है। उसने पहला द्वार प्रणाली के संकेत पर पार किया था। दूसरे द्वार तक भी प्रणाली के निर्देश से पहुँचा। लेकिन अब अर्जुन ने उसे बताया था कि प्रणाली सब कुछ नहीं बताती। तो उसे किस पर भरोसा करना चाहिए? शौर्य ने धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने किसी उत्तर की तलाश नहीं की। उसने केवल अपने भीतर की शांति को महसूस किया। फिर उसे नीरिका की ऊर्जा महसूस हुई। बहुत हल्की। फिर जलछाया की। और उसके बाद उसे अपनी खुद की ऊर्जा महसूस हुई। उसने समझा। प्रणाली रास्ता दिखा सकती है। दूसरे लोग सलाह दे सकते हैं। लेकिन कदम उसे खुद उठाना होगा। शौर्य ने दाईं तरफ कदम बढ़ाया। अपने निर्णय पर विश्वास। जैसे ही उसने वह रास्ता चुना, दोनों रास्ते गायब हो गए। सफेद रोशनी पूरे कमरे में फैल गई। उसकी ऊर्जा वापस लौट आई। नीरिका तुरंत उसके पास आ गई। जलछाया भी दिखाई दिया। शौर्य ने दोनों को देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। "हमने कर लिया।" कमरे के बीच एक नया चिन्ह दिखाई दिया। दूसरा परीक्षण पूर्ण। शौर्य कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर उसके सामने एक नई स्क्रीन खुली। प्रारंभिक मानसिक स्थिरता प्राप्त। ऊर्जा नियंत्रण में सुधार। बंधन समन्वय में वृद्धि। दूसरे द्वार का अगला चरण खुला। शौर्य ने संदेश पढ़ा। इस बार कोई नया power level नहीं दिया गया था। कोई बड़ी क्षमता नहीं। लेकिन उसे अपने भीतर बदलाव महसूस हो रहा था। उसकी सांस पहले से स्थिर थी। ऊर्जा पहले से शांत थी। और सबसे महत्वपूर्ण। उसे अब अपनी शक्ति को लेकर पहले जैसी जल्दबाजी नहीं थी। कमरे की पिछली दीवार धीरे-धीरे खुली। एक नया रास्ता सामने आया। लेकिन इस रास्ते से बाहर जाने से पहले शौर्य ने कुछ देखा। दीवार पर एक छोटा चित्र था। एक मनुष्य। उसके पीछे सात प्रकाश वृत्त। और उसके सामने तीन प्राणी। एक जल से। एक अग्नि से। और तीसरा अंधकार से। शौर्य उस चित्र के सामने रुक गया। तीन बंधन। उसने धीरे से कहा। "तो क्या हर धारक को तीन बंधन चाहिए?" इस बार प्रणाली ने उत्तर दिया। नहीं। शौर्य चौंका। फिर दूसरा संदेश आया। बंधन की संख्या शक्ति निर्धारित नहीं करती। बंधन की गुणवत्ता निर्धारित करती है। शौर्य कुछ देर तक उस संदेश को देखता रहा। उसे पहली बार समझ आया कि आगे जाकर केवल अधिक साथी इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे अपने साथियों के साथ संबंध मजबूत करना होगा। वह आगे बढ़ा। नए रास्ते पर। कुछ दूर चलने के बाद उसे सामने एक विशाल खुला मैदान दिखाई दिया। मैदान के बीच पत्थर का एक स्तंभ था। उसके ऊपर एक छोटी नीली लौ जल रही थी। शौर्य उसके पास गया। जैसे ही वह कुछ कदम दूर पहुँचा, लौ अचानक लाल हो गई। नीरिका पीछे हट गई। जलछाया पानी में गायब हो गया। शौर्य ने तुरंत रुककर सामने देखा। लाल लौ धीरे-धीरे एक आकृति में बदल रही थी। वही लाल रोशनी। वही ऊर्जा। अर्जुन। लेकिन इस बार वह अर्जुन नहीं था। आकृति ने अपना चेहरा उठाया। शौर्य की आँखें फैल गईं। उसके सामने अर्जुन की तरह दिखने वाला कोई व्यक्ति खड़ा था। लेकिन ऊर्जा अलग थी। बहुत अधिक आक्रामक। उसने कहा। "तुम यहाँ तक पहुँच गए।" शौर्य ने पूछा। "तुम कौन हो?" आकृति मुस्कुराई। "तुम्हें अभी मेरा नाम जानने की आवश्यकता नहीं है।" शौर्य की मुट्ठी बंद हो गई। यह वही वाक्य था जो उसे पहले भी सुनने को मिला था। आकृति ने आगे कहा। "लेकिन अब तुम्हें यह जानना होगा कि दूसरा परीक्षण केवल शुरुआत था।" शौर्य ने शांत स्वर में पूछा। "तुम मुझे रोकने आए हो?" कुछ पल की शांति। फिर आकृति ने कहा। "नहीं।" उसने अपना हाथ उठाया। लाल ऊर्जा पूरे मैदान में फैल गई। "मैं तुम्हें परखने आया हूँ।" शौर्य ने नीरिका की तरफ देखा। फिर जलछाया की तरफ। दोनों तैयार थे। लेकिन शौर्य ने उन्हें तुरंत आगे नहीं भेजा। उसने सामने खड़ी आकृति को देखा। उसने महसूस किया कि इस बार उसका सामना किसी परीक्षा से नहीं। किसी जीवित शक्ति से होने वाला था। आकृति ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया। पत्थर की जमीन उसके नीचे हल्की-सी टूट गई। शौर्य ने अपनी ऊर्जा सक्रिय की। नीली रोशनी उसके शरीर के चारों ओर फैलने लगी। पहली बार। उसने अपनी दोनों शक्तियों को एक साथ महसूस किया। जल प्रवाह। छाया प्रवाह। लेकिन उसने उन्हें तुरंत इस्तेमाल नहीं किया। उसने प्रतीक्षा की। क्योंकि अब वह समझ चुका था। शक्ति का अर्थ हमेशा हमला करना नहीं होता। कभी-कभी सही समय तक इंतजार करना भी शक्ति होती है। आकृति ने दूसरा कदम बढ़ाया। फिर तीसरा। और उसके साथ ही पूरा मैदान लाल रोशनी में डूब गया। शौर्य की आँखें उस रोशनी में स्थिर थीं। नीरिका उसके बाईं ओर थी। जलछाया उसके पैरों के नीचे पानी में छिपा था। तीनों के बीच कोई शब्द नहीं हुआ। लेकिन बंधन सक्रिय था। शौर्य ने बहुत धीमी आवाज में कहा। "इस बार हम साथ लड़ेंगे।" लाल रोशनी और तेज हुई। और अगले ही क्षण। उस रहस्यमयी आकृति ने हमला कर दिया।

End of Chapter 14