Chapter 13 of 30

तीसरा धारक

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शौर्य ने अपना कदम रोक लिया। सामने वही विशाल नगर था। समुद्र की गहराई में बसा हुआ। लेकिन उसे सबसे ज्यादा परेशान नगर नहीं कर रहा था। उसकी नजर उस ऊँची इमारत पर थी, जहाँ कुछ क्षण पहले एक आकृति खड़ी थी। अब वहाँ कोई नहीं था। केवल हल्की लाल रोशनी। वह भी धीरे-धीरे बुझ रही थी। शौर्य कुछ देर तक उसी दिशा में देखता रहा। उसके पीछे दूसरा द्वार पूरी तरह बंद हो चुका था। उसने वापस मुड़कर देखा। जहाँ कुछ समय पहले एक विशाल गोलाकार द्वार था, वहाँ अब केवल चिकनी पत्थर की दीवार थी। न कोई दरार। न कोई निशान। न कोई रास्ता। शौर्य ने हाथ से दीवार को छुआ। पत्थर ठंडा था। बहुत ठंडा। उसने कुछ पल अपनी हथेली वहीं रखी। फिर धीरे से हाथ हटा लिया। "वापस जाने का रास्ता बंद हो गया।" उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। नीरिका उसके पास आकर रुक गई। जलछाया पानी के भीतर उसके पैरों के पास घूम रहा था। शौर्य ने दोनों की तरफ देखा। उसके मन में एक अजीब-सी शांति थी। डर भी था। लेकिन उस डर के साथ एक अलग तरह की तैयारी भी थी। अब वापस जाने का सवाल ही नहीं था। सामने जाना ही था। उसने नगर की तरफ देखा। बहुत दूर तक फैली हुई पत्थर की सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ ऊँची इमारतें थीं। कुछ इमारतें पूरी तरह टूट चुकी थीं। कुछ अब भी खड़ी थीं। उनकी दीवारों पर वही सात चिन्ह बने थे। कहीं पहला चिन्ह। कहीं दूसरा। और कुछ जगहों पर तीसरा। लेकिन तीसरे चिन्ह के नीचे एक और छोटा निशान बना हुआ था। शौर्य ने उसे पहले कभी नहीं देखा था। उसने प्रणाली खोली। कोई जानकारी नहीं। उसने फिर कोशिश की। कुछ नहीं। प्रणाली शांत रही। शौर्य ने हल्की सांस छोड़ी। "हर बार सब कुछ खुद समझना पड़ेगा।" नीरिका ने उसके हाथ को हल्के से छुआ। शौर्य मुस्कुराया। "हाँ। मुझे भी यही सीखना होगा।" वह आगे बढ़ा। उसके कदमों की आवाज खाली सड़क पर फैलने लगी। ठक। ठक। ठक। कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे देखा। नगर का प्रवेश द्वार अब बहुत छोटा दिखाई दे रहा था। सड़क आगे जाकर दो हिस्सों में बँट रही थी। बाईं तरफ पुरानी इमारतों की कतार थी। दाईं तरफ एक चौड़ा रास्ता था, जिसके बीच पत्थर की पट्टियाँ लगी थीं। शौर्य वहीं रुक गया। उसने दोनों रास्तों को देखा। कोई संकेत नहीं। उसने प्रणाली खोली। दूसरा द्वार। पूर्ण। तीसरा द्वार। प्रारंभिक सक्रियता। दिशा। अज्ञात। शौर्य ने स्क्रीन को कुछ क्षण देखा। "अज्ञात।" उसने शब्द दोहराया। पहली बार प्रणाली ने भी रास्ता बताने से इनकार कर दिया था। शायद यह नगर ही उसकी अगली परीक्षा था। शौर्य ने दाईं तरफ कदम बढ़ाया। कुछ कदम आगे जाने के बाद उसे महसूस हुआ कि नीरिका पीछे नहीं आ रही। वह पलटा। नीरिका सड़क के बीच खड़ी थी। वह बाईं तरफ देख रही थी। शौर्य ने उसकी भावना महसूस की। सावधानी। फिर डर। शौर्य वापस उसके पास आया। "उधर कुछ है?" नीरिका ने कोई आवाज नहीं की। लेकिन उसकी ऊर्जा लगातार बाईं ओर जा रही थी। शौर्य ने बाईं तरफ देखा। वहाँ केवल एक पुरानी इमारत थी। इमारत का दरवाजा आधा खुला था। उसके ऊपर एक बहुत पुराना चिन्ह बना था। पहला चिन्ह। शौर्य ने उसे ध्यान से देखा। फिर उसने दरवाजे के पास जाकर दीवार को छुआ। अचानक उसके भीतर एक बहुत हल्की ठंडक दौड़ी। जैसे किसी ने दूसरी तरफ से उसकी हथेली को छुआ हो। वह तुरंत पीछे हट गया। नीरिका उसके सामने आ गई। जलछाया पानी से बाहर आया और शौर्य के पास तैरने लगा। शौर्य ने दरवाजे को देखा। "अंदर कोई है।" इस बार उसने प्रश्न नहीं किया। उसे यकीन था। उसने धीरे से दरवाजा धकेला। कर्कश आवाज के साथ दरवाजा खुल गया। अंदर अंधेरा था। लेकिन कुछ ही क्षण बाद नीली रोशनी धीरे-धीरे दीवारों पर फैलने लगी। कमरा बहुत बड़ा नहीं था। बीच में एक गोलाकार पत्थर की मेज थी। मेज पर कई पुराने पत्थर रखे थे। हर पत्थर पर अलग चिन्ह। शौर्य धीरे-धीरे मेज के पास गया। उसने पहला पत्थर उठाया। कुछ नहीं हुआ। दूसरा। कुछ नहीं। तीसरा। उसकी हथेली अचानक गर्म हो गई। शौर्य ने पत्थर तुरंत नीचे रख दिया। उस पर तीसरा चिन्ह बना था। और उसके नीचे वही छोटा निशान था जिसे उसने बाहर देखा था। शौर्य झुककर उसे देखने लगा। इस बार प्रणाली सक्रिय हुई। तीसरा धारक। शौर्य की सांस कुछ पल के लिए रुक गई। वह सीधा खड़ा हो गया। "तीसरा धारक यहाँ है?" कमरे में कोई उत्तर नहीं आया। लेकिन पीछे से धीमी आवाज सुनाई दी। "था।" शौर्य का शरीर तुरंत तन गया। उसने धीरे-धीरे पीछे देखा। दरवाजे के पास कोई खड़ा था। वही व्यक्ति। लंबा। काले कपड़े। चेहरा आधा छाया में। और दाहिने हाथ में लाल रोशनी की हल्की परत। शौर्य उसे कुछ क्षण देखता रहा। वह व्यक्ति भी कुछ नहीं बोल रहा था। नीरिका शौर्य के आगे आ गई। जलछाया गायब हो गया। शौर्य ने अपनी ऊर्जा तैयार की। लेकिन उसने हमला नहीं किया। वह व्यक्ति धीरे-धीरे आगे आया। उसके कदमों की आवाज कमरे में गूँज रही थी। एक। फिर दूसरा। फिर तीसरा। वह शौर्य से कुछ ही कदम दूर आकर रुक गया। उसकी आँखें शांत थीं। बहुत शांत। उसने शौर्य को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर नीरिका को। फिर जलछाया की छिपी हुई ऊर्जा की दिशा को। उसके चेहरे पर पहली बार हल्का बदलाव आया। "दो बंधन।" शौर्य चुप रहा। उस व्यक्ति ने कहा, "तुम बहुत जल्दी यहाँ पहुँच गए।" शौर्य ने पूछा, "तुम कौन हो?" वह कुछ क्षण शांत रहा। फिर उसने अपना नाम बताया। "अर्जुन।" बस इतना। शौर्य ने पूछा, "तुम तीसरे धारक हो?" अर्जुन ने सिर हिलाया। "हाँ।" शौर्य की नजर उसके हाथ पर गई। लाल रोशनी अभी भी उसकी हथेली के आसपास थी। उसने पूछा, "तुम्हारा बंधन क्या है?" अर्जुन की आँखें थोड़ी बदल गईं। "तुम्हें इतनी जल्दी सब कुछ जानने की जरूरत नहीं है।" शौर्य ने कुछ नहीं कहा। अर्जुन आगे बढ़ा। "तुम्हें यह भी नहीं पूछना चाहिए कि मेरा तीसरा बंधन कहाँ है।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "मैंने पूछा भी नहीं।" अर्जुन पहली बार हल्का मुस्कुराया। "अच्छा है।" कुछ क्षण दोनों के बीच शांति रही। फिर अर्जुन ने कहा, "तुम्हें पता है तुम कहाँ हो?" "समुद्र के नीचे बने पुराने नगर में।" "नहीं।" अर्जुन ने धीरे से सिर हिलाया। "यह केवल एक नगर नहीं है।" वह कमरे की दीवार की तरफ गया। वहाँ एक बहुत बड़ा नक्शा बना था। उसने हाथ उठाया। लाल रोशनी की एक पतली रेखा उसके हाथ से निकलकर नक्शे पर फैल गई। शौर्य उसके पास जाकर खड़ा हो गया। नक्शे में केवल यही नगर नहीं था। बहुत बड़ा क्षेत्र था। समुद्र। पर्वत। जंगल। रेगिस्तान। और उनके बीच सात विशाल क्षेत्र। हर क्षेत्र के ऊपर एक अलग चिन्ह। शौर्य की आँखें धीरे-धीरे फैलने लगीं। अर्जुन ने कहा, "यह केवल सात द्वारों का रास्ता नहीं है।" "तो क्या है?" "सात क्षेत्रों का केंद्र।" शौर्य ने नक्शे को ध्यान से देखा। "केंद्र?" "हाँ।" अर्जुन ने लाल रोशनी एक बिंदु पर रोकी। "यहाँ।" शौर्य ने उस स्थान को देखा। वहाँ सातों क्षेत्रों की रेखाएँ मिल रही थीं। अर्जुन बोला। "जिसने भी इन सात बंधनों की व्यवस्था बनाई थी, उसने उन्हें अलग-अलग जगह नहीं रखा।" "उन्हें एक केंद्र से जोड़ा गया।" शौर्य के मन में पहला द्वार याद आया। फिर दूसरा। और वह नीली आकृति। वह धीरे से बोला। "तो यह सब पहले से बनाया गया था।" अर्जुन ने कहा। "बहुत पहले।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "कितने साल पहले?" अर्जुन कुछ पल चुप रहा। "किसी को नहीं पता।" "तुम्हें भी नहीं?" "मुझे जो पता है, वह इतना है कि यह नगर हमारे जन्म से बहुत पहले से यहाँ था।" शौर्य ने फिर नक्शे को देखा। "और तीसरा धारक?" अर्जुन की आँखें कुछ पल के लिए नीचे झुक गईं। "पहले एक और था।" कमरे की हवा अचानक भारी लगने लगी। शौर्य ने पूछा, "कहाँ है?" अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया। शौर्य समझ गया। वह जीवित नहीं था। अर्जुन ने कुछ देर बाद कहा। "इस नगर में धारक आते रहे हैं।" "लेकिन सभी आगे नहीं जा सके।" "कुछ ने रास्ता छोड़ दिया।" "कुछ ने शक्ति के पीछे खुद को खो दिया।" "और कुछ..." वह रुक गया। शौर्य ने पूछा, "कुछ?" अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। "कुछ को द्वार ने स्वीकार नहीं किया।" शौर्य के मन में पहला द्वार याद आया। वह धीमे से बोला। "तो द्वार खुद चुनते हैं?" अर्जुन ने सिर हिलाया। "हम सोचते हैं कि हम उन्हें खोलते हैं।" "असल में वे हमें खोलते हैं।" शौर्य कुछ नहीं बोला। उसका मन इस बात को समझने की कोशिश कर रहा था। अर्जुन ने अपनी हथेली खोली। लाल रोशनी थोड़ी तेज हुई। "तुम्हें अपने power level के बारे में पता है?" शौर्य ने सिर हिलाया। "नहीं।" अर्जुन ने पहली बार आश्चर्य से उसे देखा। "तुम्हें कुछ भी नहीं बताया गया?" "सिर्फ इतना कि मेरी शक्ति बढ़ रही है।" अर्जुन कुछ क्षण सोचता रहा। फिर उसने कहा। "तो तुम्हें शुरुआत से समझना होगा।" उसने अपनी हथेली शौर्य की तरफ की। लाल रोशनी धीरे-धीरे हवा में फैल गई। एक गोलाकार संरचना बनी। चार छोटे स्तर। पहला। शरीर। दूसरा। ऊर्जा। तीसरा। बंधन। चौथा। क्षेत्र। शौर्य ध्यान से देखता रहा। अर्जुन ने कहा। "पहले चरण में शरीर ऊर्जा को सहना सीखता है।" "दूसरे में ऊर्जा को नियंत्रित करना।" "तीसरे में अपने बंधित प्राणियों के साथ तालमेल बनाना।" "चौथे में अपनी ऊर्जा का क्षेत्र बनाना।" शौर्य ने पूछा, "और उसके बाद?" अर्जुन ने लाल संरचना को बंद कर दिया। "उसके बाद की जानकारी हर किसी को नहीं मिलती।" शौर्य ने हल्की सांस ली। "फिर तुम मुझे इतना ही क्यों बता रहे हो?" अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा। "क्योंकि तुम्हें जानना चाहिए कि तुम अभी कितने कमजोर हो।" शौर्य चुप हो गया। यह बात उसे अच्छी नहीं लगी। लेकिन उसने विरोध नहीं किया। अर्जुन ने कहा। "तुम्हारी ऊर्जा अभी शुरुआती स्तर पर है।" "लेकिन तुम्हारे दो बंधन हैं।" "इसका मतलब तुम्हारी growth सामान्य धारकों से अलग हो सकती है।" शौर्य ने पूछा, "क्यों?" अर्जुन ने कहा। "क्योंकि तुम्हारे दोनों बंधन एक-दूसरे की क्षमता बढ़ा सकते हैं।" उसने नीरिका की तरफ देखा। "जल प्रवाह।" फिर जलछाया की तरफ। "छाया प्रवाह।" अर्जुन ने धीरे से कहा। "अगर इन दोनों का सही तालमेल बना, तो तुम अपनी वर्तमान सीमा से कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकते हो।" शौर्य की आँखों में उत्सुकता आई। लेकिन अर्जुन ने तुरंत कहा। "लेकिन अभी नहीं।" उत्सुकता थोड़ी कम हुई। अर्जुन बोला। "शक्ति का सबसे बड़ा खतरा यही है।" "जो व्यक्ति अपनी सीमा से पहले अपनी शक्ति को बढ़ा लेता है, वह खुद अपने शरीर को नुकसान पहुँचाता है।" शौर्य ने पूछा, "तो मुझे क्या करना चाहिए?" अर्जुन ने जवाब दिया। "शरीर मजबूत करो।" "ऊर्जा को स्थिर करो।" "बंधनों को गहरा करो।" "और सबसे महत्वपूर्ण।" वह कुछ पल रुका। "अपने मन को नियंत्रित करो।" शौर्य ने कुछ नहीं कहा। अर्जुन के शब्द उसके भीतर उतर रहे थे। उसने अपने दोनों साथियों की तरफ देखा। उसे समझ आया कि वह केवल शक्ति इकट्ठा नहीं कर रहा था। वह खुद को बदल रहा था। अर्जुन अचानक पीछे हट गया। "अब तुम्हें जाना चाहिए।" शौर्य ने उसकी तरफ देखा। "कहाँ?" अर्जुन ने नक्शे के ऊपर एक जगह दिखाई। नगर के उत्तर में एक छोटा क्षेत्र। "दूसरा परीक्षण।" शौर्य ने पूछा, "यहाँ?" "हाँ।" "और तुम?" अर्जुन ने कहा। "मैं अपने रास्ते पर जाऊँगा।" शौर्य कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर पूछा। "क्या हम फिर मिलेंगे?" अर्जुन ने हल्की मुस्कान दी। "अगर तुम तीसरे द्वार तक पहुँच गए।" फिर उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए। शौर्य ने पीछे से पूछा। "अर्जुन।" वह रुक गया। "तुमने पहले धारक के बारे में जो कहा।" अर्जुन ने पीछे नहीं देखा। "क्या हुआ था उसके साथ?" कुछ सेकंड तक कोई उत्तर नहीं आया। फिर अर्जुन ने कहा। "उसने अपने बंधन को तोड़ने की कोशिश की थी।" शौर्य के चेहरे पर गंभीरता आ गई। "क्यों?" अर्जुन ने बहुत धीमी आवाज में कहा। "क्योंकि उसे लगा था कि साथी उसकी कमजोरी है।" फिर वह कमरे से बाहर चला गया। शौर्य वहीं खड़ा रह गया। उसने नीरिका की तरफ देखा। नीरिका उसकी ओर देख रही थी। जलछाया भी पानी की एक छोटी धारा से बाहर आ गया। शौर्य ने दोनों को देखा। उसने बहुत धीरे से कहा। "मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।" कमरे की दीवार पर तीसरा चिन्ह अचानक चमक उठा। शौर्य ने ऊपर देखा। इस बार कोई आकृति नहीं थी। लेकिन दीवार पर एक नया संदेश दिखाई दिया। तीसरे धारक से संपर्क स्थापित। दूसरा परीक्षण आरंभ। शौर्य कुछ क्षण उस संदेश को देखता रहा। फिर उसने बैग उठाया। वह कमरे से बाहर निकला। सड़क अब पहले से अलग लग रही थी। जैसे नगर जाग रहा हो। दूर कहीं पत्थर गिरने की आवाज आई। फिर किसी बहुत बड़े जीव की धीमी गर्जना। नीरिका तुरंत शौर्य के पास आ गई। जलछाया पानी में गायब हो गया। शौर्य ने सड़क के अंत की तरफ देखा। वहाँ अब लाल रोशनी दिखाई दे रही थी। वही लाल रोशनी जो अर्जुन की हथेली में थी। लेकिन इस बार वह रोशनी बहुत दूर से आ रही थी। जैसे किसी ने रास्ते पर निशान छोड़ दिया हो। शौर्य ने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। उसके पीछे दूसरा द्वार बंद था। सामने तीसरा धारक अपनी राह पर जा चुका था। और अब शौर्य के सामने केवल एक रास्ता था। दूसरा परीक्षण। लेकिन वह नहीं जानता था कि यह परीक्षण उसकी शक्ति को परखेगा। या उसके मन को। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। नगर की गलियाँ लंबी थीं। हर मोड़ के बाद एक नया रास्ता। हर रास्ते के बाद एक नया चिन्ह। और हर चिन्ह के पीछे एक ऐसा रहस्य, जो अभी उसके लिए बंद था। काफी देर चलने के बाद वह एक विशाल चौक में पहुँचा। चौक के बीच एक टूटी हुई मूर्ति थी। मूर्ति एक योद्धा की थी। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था। दोनों हथेलियाँ खाली थीं। शौर्य उसके सामने जाकर रुक गया। मूर्ति के नीचे केवल एक वाक्य लिखा था। "जिसे शक्ति चाहिए, पहले उसे खोने का साहस रखो।" शौर्य ने वह वाक्य पढ़ा। उसके भीतर हल्की बेचैनी हुई। उसे लगा जैसे यह केवल कोई पुराना संदेश नहीं था। यह सीधे उसी से कहा गया था। नीरिका ने उसकी हथेली छुई। जलछाया पानी के भीतर से उसकी ऊर्जा महसूस करा रहा था। शौर्य ने आँखें बंद कर लीं। उसने दोनों की उपस्थिति को महसूस किया। फिर उसने धीरे से कहा। "चलो।" और वह चौक के आगे बढ़ गया। उसे नहीं पता था कि अगला परीक्षण कहाँ है। उसे यह भी नहीं पता था कि वह उसमें सफल होगा या नहीं। लेकिन पहली बार उसे इस बात की चिंता नहीं थी। क्योंकि अब उसके पास रास्ता अकेले तय करने की जरूरत नहीं थी। उसके साथ दो साथी थे। एक ऐसा बंधन था जिसे वह खोना नहीं चाहता था। और सामने एक ऐसा संसार था, जिसकी गहराई शायद समुद्र से भी अधिक थी। दूर कहीं। नगर के सबसे पुराने हिस्से में। एक बंद कक्ष के भीतर। तीसरा चिन्ह फिर चमका। और उसी के साथ किसी ने बहुत धीरे से कहा। "दूसरा धारक आ चुका है।" फिर अंधकार में एक और आवाज आई। "तो अब तीसरे द्वार का समय भी दूर नहीं है।"

End of Chapter 13