Chapter 12 of 30
उत्तर की राह
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रात धीरे-धीरे बीत रही थी।
शौर्य खिड़की के पास खड़ा समुद्र को देख रहा था।
दूर तक फैला अंधेरा।
लहरों की धीमी आवाज।
और बीच-बीच में समुद्र की सतह पर दिखाई देने वाली बहुत हल्की चमक।
वह काफी देर से वहीं खड़ा था।
उसके हाथ में प्रणाली की नीली रोशनी स्थिर थी।
दूसरा द्वार।
दिशा: उत्तर।
लेकिन बूढ़े मछुआरे की आवाज उसके कानों में अब भी गूँज रही थी।
उत्तर की तरफ मत जाना।
शौर्य ने धीरे से स्क्रीन बंद कर दी।
वह बिस्तर पर जाकर बैठ गया।
उसने दोनों हाथों को जोड़कर अपनी ठुड्डी उन पर रख दी।
उसके सामने कोई आसान फैसला नहीं था।
अगर वह प्रणाली की बात मानता, तो उसे उत्तर जाना था।
अगर वह बूढ़े की बात मानता, तो उसे उत्तर से दूर रहना था।
दोनों में से कौन सही था?
शौर्य के पास कोई प्रमाण नहीं था।
उसने अपनी आँखें बंद कीं।
नीरिका की ऊर्जा उसके भीतर महसूस हुई।
वह समुद्र में थी।
शांत।
जलछाया भी आसपास था।
उसकी ऊर्जा बहुत हल्की थी।
लगभग छिपी हुई।
शौर्य ने सह-अनुभूति के माध्यम से दोनों की स्थिति महसूस करने की कोशिश की।
नीरिका शांत थी।
लेकिन उसमें थोड़ी बेचैनी थी।
जलछाया बहुत सतर्क था।
जैसे वह किसी चीज की आहट सुन रहा हो।
शौर्य ने आँखें खोल दीं।
उसने धीरे से कहा, "तुम दोनों को भी कुछ महसूस हो रहा है?"
समुद्र से कोई आवाज नहीं आई।
लेकिन कुछ क्षण बाद पानी की सतह पर हल्की लहर बनी।
शौर्य समझ गया।
कुछ तो था।
उसने कमरे की लाइट बंद कर दी।
फिर बिस्तर पर लेट गया।
लेकिन नींद नहीं आई।
वह छत को देखता रहा।
कुछ देर बाद उसने करवट बदली।
फिर दूसरी तरफ।
फिर उसने आँखें बंद कर लीं।
उसके मन में वही सात निशान घूमने लगे।
पहला सक्रिय था।
दूसरा शायद उसका इंतजार कर रहा था।
और तीसरा।
वह क्यों चमका था?
क्या वह किसी और व्यक्ति के कारण सक्रिय हुआ था?
या फिर किसी ऐसी चीज के कारण जिसे वह अभी समझ नहीं पा रहा था?
बहुत देर बाद उसकी आँख लग गई।
लेकिन आज उसे कोई सपना नहीं आया।
सुबह होने से कुछ पहले उसकी नींद खुली।
इस बार कोई डर नहीं था।
कमरे में हल्की सुबह की रोशनी थी।
शौर्य उठकर बैठ गया।
कुछ सेकंड तक वह चुप रहा।
फिर उसके भीतर अचानक एक स्पष्ट विचार आया।
उसे उत्तर जाना ही होगा।
लेकिन सीधे नहीं।
वह पहले उस रास्ते को समझेगा।
उसने कपड़े बदले।
बैग तैयार किया।
कुछ ऊर्जा क्रिस्टल रखे।
पानी की बोतल।
कुछ भोजन।
एक छोटा चाकू।
और वह पुराना धातु का टुकड़ा, जिस पर वही सात निशान बने थे।
उसने उसे कुछ क्षण देखा।
फिर उसे बैग में रख दिया।
घर से निकलने से पहले उसने अनन्या के कमरे की तरफ देखा।
दरवाजा बंद था।
वह उसे जगाना नहीं चाहता था।
वह चुपचाप बाहर निकल गया।
समुद्र किनारे पहुँचते ही नीरिका उसके पास आ गई।
उसकी नीली चमक सुबह की हल्की रोशनी में साफ दिखाई दे रही थी।
जलछाया कुछ दूर पानी के भीतर था।
उसकी मौजूदगी केवल सह-अनुभूति से महसूस हो रही थी।
शौर्य ने दोनों को देखा।
"आज हम उत्तर की तरफ जाएँगे।"
नीरिका शांत रही।
जलछाया की भावना में हल्की सतर्कता आई।
शौर्य ने उसे महसूस किया।
"मुझे पता है।"
उसने धीरे से कहा।
"खतरा हो सकता है।"
वह कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला।
"लेकिन हमें दूसरे द्वार तक पहुँचना है।"
नीरिका पानी में आगे बढ़ी।
शौर्य उसके साथ चलने लगा।
सुबह का समय था।
समुद्र पर नावें कम थीं।
किनारे पर भी ज्यादा लोग नहीं थे।
कुछ मछुआरे अपने जाल ठीक कर रहे थे।
शौर्य ने उनकी तरफ देखा।
उसे बूढ़ा मछुआरा दिखाई नहीं दिया।
शायद वह अभी अपने घर पर था।
या फिर कहीं और गया था।
शौर्य ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
वह आगे बढ़ता रहा।
लगभग एक घंटे तक कोई असामान्य बात नहीं हुई।
समुद्र सामान्य था।
हवा भी सामान्य थी।
नीरिका बीच-बीच में पानी के नीचे जाकर वापस आती।
जलछाया कभी दिखाई देता।
कभी गायब हो जाता।
शौर्य को धीरे-धीरे लगने लगा कि शायद उसकी चिंता बेकार थी।
लेकिन फिर।
समुद्र का रंग बदलने लगा।
पहले हल्का नीला।
फिर गहरा।
फिर लगभग नीला-काला।
शौर्य रुक गया।
उसने पानी की तरफ देखा।
यह बदलाव बहुत धीरे-धीरे हुआ था।
इतना धीरे कि शायद कोई दूसरा व्यक्ति इसे सामान्य गहराई का बदलाव समझता।
लेकिन शौर्य अब समुद्र की ऊर्जा को महसूस कर सकता था।
यहाँ ऊर्जा अलग थी।
भारी।
ठंडी।
और थोड़ी पुरानी।
उसने नीरिका की तरफ देखा।
वह भी रुक गई।
जलछाया पूरी तरह गायब हो गया।
शौर्य ने सह-अनुभूति सक्रिय की।
वह उसे महसूस कर सकता था।
बहुत नीचे।
चट्टानों के बीच।
वह छिपा हुआ था।
"क्या हुआ?"
जलछाया की तरफ से एक भावना आई।
खतरा।
शौर्य का शरीर तन गया।
उसने पानी के भीतर देखने की कोशिश की।
कुछ नहीं।
फिर।
बहुत नीचे।
एक हल्की चमक।
शौर्य ने आँखें सिकोड़कर देखा।
चमक फिर गायब हो गई।
उसने प्रणाली सक्रिय की।
अज्ञात ऊर्जा।
दूरी: मध्यम।
दिशा: नीचे।
शौर्य ने सांस रोक ली।
उसे याद आया कि पहला द्वार किस तरह खुला था।
शायद दूसरा द्वार भी इसी तरह किसी गहराई में था।
लेकिन वह बिना तैयारी के नीचे नहीं जाना चाहता था।
उसने पहले नीरिका को नीचे जाने का संकेत दिया।
नीरिका धीरे-धीरे नीचे गई।
कुछ सेकंड बाद उसकी ऊर्जा शौर्य से काफी दूर हो गई।
शौर्य ने सह-अनुभूति से उसकी स्थिति महसूस की।
वह शांत थी।
लेकिन तभी।
नीरिका की ऊर्जा अचानक तेज हो गई।
शौर्य का चेहरा बदल गया।
"नीरिका।"
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
उसने तुरंत पानी में छलांग लगा दी।
वह नीचे तैरने लगा।
जल प्रवाह की क्षमता सक्रिय हुई।
पानी उसके आसपास से पीछे हटने लगा।
उसकी गति बढ़ गई।
नीचे जाते हुए उसे धीरे-धीरे चट्टानें दिखाई देने लगीं।
कुछ ही सेकंड बाद उसे नीरिका दिखाई दी।
वह एक बड़ी चट्टान के सामने रुकी थी।
चट्टान के पीछे एक लंबा दरारनुमा रास्ता था।
उसमें हल्की नीली रोशनी थी।
शौर्य ने उसके पास जाकर देखा।
वही चिन्ह।
सात निशान।
लेकिन इस बार दूसरा निशान चमक रहा था।
उसकी धड़कन तेज हो गई।
यही दूसरा द्वार था।
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
लेकिन तभी पीछे से पानी का तेज दबाव आया।
शौर्य अचानक आगे की तरफ धकेला गया।
उसने तुरंत चट्टान पकड़ ली।
नीरिका भी पीछे हट गई।
शौर्य ने मुड़कर देखा।
कुछ नहीं था।
लेकिन उसे किसी की मौजूदगी महसूस हुई।
उसने सह-अनुभूति के माध्यम से जलछाया को खोजा।
वह कहीं आसपास था।
बहुत करीब।
फिर एक भावना आई।
छिपो।
शौर्य तुरंत समझ गया।
उसने खुद को चट्टान के पीछे कर लिया।
नीरिका भी अंधेरे में चली गई।
कुछ सेकंड बाद सामने की गहराई में एक आकृति दिखाई दी।
बहुत बड़ी।
धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई।
शौर्य ने उसे देखते ही सांस रोक ली।
वह कोई सामान्य समुद्री जीव नहीं था।
उसका शरीर लंबा था।
उसकी पीठ पर कई कठोर परतें थीं।
और उसकी आँखों से हल्की लाल रोशनी निकल रही थी।
वह चट्टान के पास आया।
शौर्य बिल्कुल स्थिर रहा।
नीरिका की ऊर्जा बहुत शांत थी।
जलछाया पूरी तरह गायब था।
वह विशाल जीव कुछ देर चट्टान के आसपास घूमता रहा।
फिर उसने सिर उठाया।
सीधे उस दिशा में देखा जहाँ शौर्य छिपा था।
शौर्य के भीतर एक पल के लिए डर की लहर दौड़ी।
क्या उसने उन्हें देख लिया था?
जीव आगे बढ़ा।
उसका सिर चट्टान से कुछ ही दूरी पर था।
शौर्य ने अपनी सांस रोक ली।
फिर अचानक जलछाया दूसरी तरफ दिखाई दिया।
बहुत दूर।
उसने अपनी छाया प्रवाह क्षमता सक्रिय कर दी थी।
विशाल जीव का ध्यान तुरंत उसकी तरफ चला गया।
वह जलछाया के पीछे बढ़ा।
शौर्य समझ गया कि जलछाया जानबूझकर उसे दूसरी तरफ ले जा रहा था।
उसने नीरिका को देखा।
फिर उस दरार की तरफ।
उसे तुरंत निर्णय लेना था।
लेकिन वह जलछाया को छोड़ना नहीं चाहता था।
उसने सह-अनुभूति के माध्यम से जलछाया को पुकारा।
वापस आओ।
जलछाया की भावना आई।
अभी नहीं।
शौर्य चौंका।
उसने फिर कहा।
वापस आओ।
इस बार उत्तर आया।
तुम जाओ।
शौर्य की आँखें फैल गईं।
जलछाया खुद उस विशाल जीव को दूर ले जा रहा था।
शौर्य ने तुरंत मना किया।
नहीं।
जलछाया ने कोई उत्तर नहीं दिया।
वह और दूर चला गया।
विशाल जीव उसके पीछे था।
शौर्य ने नीरिका की तरफ देखा।
फिर दरार की तरफ।
उसका मन उसे आगे जाने को कह रहा था।
लेकिन उसका दूसरा हिस्सा जलछाया के पीछे जाना चाहता था।
वह कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने एक फैसला किया।
वह दरार की तरफ नहीं जाएगा।
वह अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ेगा।
शौर्य ने नीरिका को संकेत दिया।
दोनों जलछाया की दिशा में गए।
कुछ दूरी पर उन्हें विशाल जीव दिखाई दिया।
जलछाया तेजी से तैर रहा था।
लेकिन उसकी ऊर्जा कमजोर हो रही थी।
शौर्य ने अपनी ऊर्जा सक्रिय की।
नीरिका ने पानी की धारा को मोड़ा।
जलछाया अचानक उस धारा में आ गया।
उसकी गति बढ़ गई।
वह सीधे शौर्य की तरफ लौट आया।
शौर्य ने उसे अपने पास खींच लिया।
उसके शरीर में थकान थी।
लेकिन वह सुरक्षित था।
विशाल जीव उनके सामने रुक गया।
अब शौर्य उसके बिल्कुल सामने था।
उसने अपनी ऊर्जा महसूस की।
बहुत शक्तिशाली।
लेकिन उसमें कोई स्पष्ट शत्रुता नहीं थी।
वह केवल क्षेत्र की रक्षा कर रहा था।
शौर्य ने धीरे से हाथ आगे किया।
नीरिका और जलछाया उसके पास थे।
उसने अपनी ऊर्जा नीचे कर दी।
कोई हमला नहीं।
कोई डराने की कोशिश नहीं।
विशाल जीव कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रहा।
फिर उसने अपना सिर नीचे किया।
शौर्य को अचानक एक भावना महसूस हुई।
जिज्ञासा।
वह जीव उन्हें देख रहा था।
शौर्य ने प्रणाली खोली।
अज्ञात प्रजाति।
ऊर्जा स्तर: उच्च।
क्षेत्रीय संरक्षक।
शौर्य की आँखें बड़ी हो गईं।
"संरक्षक?"
प्रणाली ने आगे कोई जानकारी नहीं दी।
विशाल जीव धीरे-धीरे मुड़ा।
वह उसी दरार की तरफ गया।
फिर उसने पीछे मुड़कर देखा।
कुछ क्षण शौर्य उसे देखता रहा।
फिर उसे समझ आया।
वह उन्हें रोक नहीं रहा था।
वह उन्हें रास्ता दिखा रहा था।
शौर्य ने नीरिका और जलछाया की तरफ देखा।
"चलो।"
तीनों उस जीव के पीछे बढ़े।
दरार के भीतर जाते ही समुद्र की ऊर्जा और भारी हो गई।
दीवारों पर दूसरा चिन्ह चमक रहा था।
पहले द्वार की तरह यहाँ कोई सीधा रास्ता नहीं था।
बल्कि चट्टानों के बीच एक विशाल गुफा थी।
उस गुफा की छत दिखाई नहीं दे रही थी।
नीचे भी केवल अंधकार था।
संरक्षक जीव गुफा के बीच पहुँचा।
फिर रुक गया।
उसने अपना सिर ऊपर उठाया।
और एक धीमी ध्वनि निकाली।
उस ध्वनि से पूरी गुफा काँप गई।
शौर्य ने चारों तरफ देखा।
दीवारों पर बने कई पुराने चिन्ह एक-एक करके चमकने लगे।
पहला।
दूसरा।
फिर तीसरा।
शौर्य की सांस रुक गई।
तीसरा चिन्ह।
वही तीसरा चिन्ह जो उसने पिछली रात दूर समुद्र के भीतर देखा था।
लेकिन अब वह पहले से ज्यादा चमक रहा था।
शौर्य ने प्रणाली खोली।
तीसरा द्वार।
स्थिति: प्रारंभिक सक्रियता।
शौर्य कुछ क्षण कुछ समझ नहीं पाया।
उसका लक्ष्य तो दूसरा द्वार था।
फिर तीसरा क्यों सक्रिय हो रहा था?
तभी गुफा के भीतर एक आवाज गूँजी।
"क्योंकि तुम्हें केवल रास्ता नहीं दिया गया है।"
शौर्य ने तुरंत चारों तरफ देखा।
वही नीली आकृति उसके सामने दिखाई दी।
लेकिन इस बार वह पहले से अलग थी।
उसका आकार बड़ा था।
उसकी रोशनी भी ज्यादा स्पष्ट थी।
शौर्य ने पूछा, "तुम यहाँ भी हो?"
आकृति ने उत्तर दिया।
"मैं वहाँ हूँ जहाँ द्वार हैं।"
शौर्य ने पूछा, "यह जीव कौन है?"
आकृति ने संरक्षक की तरफ देखा।
"वह द्वार का रक्षक है।"
शौर्य ने पूछा, "क्या यह मेरा दूसरा साथी बन सकता है?"
आकृति कुछ क्षण शांत रही।
फिर उसने कहा।
"नहीं।"
शौर्य ने आश्चर्य से पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि उसका बंधन पहले से है।"
शौर्य ने संरक्षक को देखा।
"किसके साथ?"
आकृति ने कोई उत्तर नहीं दिया।
शौर्य कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने पूछा, "तो यह हमें यहाँ क्यों लाया?"
आकृति ने कहा।
"क्योंकि तुम्हारे भीतर दूसरा द्वार स्वीकार करने की क्षमता आ चुकी है।"
शौर्य ने अपना हाथ देखा।
नीली रोशनी उसकी हथेली पर हल्की-सी दिखाई दे रही थी।
आकृति ने कहा।
"दूसरा द्वार तुम्हें शक्ति से नहीं मिलेगा।"
"तो किससे?"
"त्याग से।"
शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।
आकृति ने आगे कहा।
"तुमने अभी अपने साथी को बचाने के लिए रास्ता छोड़ा।"
शौर्य ने जलछाया की तरफ देखा।
"लेकिन वह तो मेरा साथी है।"
"यही कारण है कि तुम आगे बढ़ सके।"
गुफा में कुछ क्षण शांति रही।
फिर सामने की चट्टान खुलने लगी।
उसके पीछे एक विशाल गोलाकार द्वार दिखाई दिया।
द्वार के ऊपर दूसरा चिन्ह चमक रहा था।
शौर्य धीरे-धीरे उसके पास गया।
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
लेकिन इस बार उसने तुरंत उसे नहीं छुआ।
उसने पहले नीरिका को देखा।
फिर जलछाया को।
दोनों उसके पास थे।
वह मुस्कुराया।
"इस बार हम तीनों साथ चलेंगे।"
उसने अपना हाथ द्वार पर रख दिया।
नीली रोशनी अचानक पूरे क्षेत्र में फैल गई।
द्वार खुलने लगा।
लेकिन अंदर कोई अंधकार नहीं था।
अंदर एक विशाल मैदान दिखाई दे रहा था।
समुद्र के नीचे।
एक ऐसा मैदान जहाँ पानी के बावजूद हवा थी।
पत्थर के पेड़।
नीली घास।
और दूर तक फैली हुई प्राचीन संरचनाएँ।
शौर्य कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि समुद्र की गहराई में ऐसी जगह हो सकती है।
नीरिका आगे बढ़ी।
जलछाया भी उसके पीछे गया।
शौर्य ने एक कदम अंदर रखा।
जैसे ही उसने सीमा पार की।
उसके पीछे द्वार बंद हो गया।
शौर्य ने पलटकर देखा।
अब वापस जाने का रास्ता नहीं था।
उसने कुछ क्षण आँखें बंद कीं।
फिर गहरी सांस ली।
उसने खुद को शांत किया।
सामने एक बहुत लंबा रास्ता था।
रास्ते के अंत में एक विशाल नगर दिखाई दे रहा था।
नगर के बीच सात ऊँचे स्तंभ थे।
पहले स्तंभ पर नीली रोशनी थी।
दूसरे पर सफेद।
तीसरे पर हल्की लाल चमक।
बाकी चार अंधेरे थे।
शौर्य ने उन स्तंभों को देखा।
उसके भीतर एक अजीब एहसास पैदा हुआ।
जैसे वह इस जगह को पहले देख चुका हो।
फिर उसे समझ आया।
यह वही नगर था जो उसने पहले द्वार के भीतर आकृति द्वारा दिखाए गए चित्र में देखा था।
सात द्वारों का नगर।
लेकिन चित्र में नगर खाली था।
यहाँ नहीं।
यहाँ कहीं दूर हलचल थी।
शौर्य ने ध्यान से देखा।
नगर की एक ऊँची इमारत के ऊपर एक छोटी-सी आकृति खड़ी थी।
बहुत दूर।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन वह उनकी तरफ देख रही थी।
शौर्य ने नीरिका को महसूस किया।
उसमें चिंता थी।
जलछाया भी बेचैन था।
शौर्य ने अपनी ऊर्जा बढ़ाई।
उसने उस आकृति को ध्यान से देखने की कोशिश की।
अचानक प्रणाली सक्रिय हुई।
मानव उपस्थिति।
शौर्य की सांस अटक गई।
"यहाँ कोई इंसान है?"
प्रणाली ने उत्तर दिया।
हाँ।
शौर्य ने एक कदम आगे बढ़ाया।
उस आकृति ने भी एक कदम आगे बढ़ाया।
फिर उसने अपना हाथ उठाया।
उसकी हथेली में एक लाल रोशनी चमकी।
शौर्य के सामने प्रणाली में एक नया संदेश आया।
अज्ञात धारक की पहचान।
तीसरा बंधन सक्रिय।
शौर्य वहीं रुक गया।
तीसरा बंधन।
किसी और के पास।
इसका मतलब था कि वह अकेला नहीं था।
कोई दूसरा धारक पहले से इस नगर में मौजूद था।
और वह उसे देख रहा था।
दूर खड़ी आकृति ने धीरे-धीरे अपना हाथ नीचे किया।
फिर उसने मुड़कर नगर के भीतर कदम रखा।
शौर्य ने नीरिका और जलछाया को देखा।
उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि अब उसे पता चल चुका था।
दूसरे द्वार तक पहुँचना उसकी यात्रा का अंत नहीं था।
बल्कि किसी दूसरे धारक से पहली मुलाकात की शुरुआत थी।
और उस मुलाकात का परिणाम शायद तय करेगा कि आगे के सात द्वारों में उसके साथ कौन खड़ा होगा।
शौर्य ने धीरे-धीरे उस नगर की ओर कदम बढ़ाया।
एक कदम।
फिर दूसरा।
और फिर तीसरा।
उसके पीछे समुद्र का रास्ता बंद था।
सामने अज्ञात नगर था।
और उस नगर के भीतर।
एक ऐसा व्यक्ति उसका इंतजार कर रहा था।
जिसके पास तीसरा बंधन था।