Chapter 20 of 20

टूटती झिझक और प्रभाव का घेरा

544 words

​दिन बीतने के साथ पेंटहाउस की शांत दिनचर्या में निशा धीरे-धीरे घुलने-मिलने लगी थी, हालाँकि उसके भीतर का द्वंद्व अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। कॉलेज की दुनिया से आई उन्नीस साल की निशा के लिए यहाँ का हर दृश्य एक नया अनुभव था। सुबह की शुरुआत माँ की पूजा और रसोई में नीरू के साथ चाय बनाने से होती। घर में कोई तल्खी, कोई बनावटी औपचारिकता या परायापन नहीं था। माँ अपनी परिपक्व ममता के साथ घर की धड़कन बनी हुई थीं, और नीरू अपनी गर्भावस्था के सहज अधिकार के साथ पूरे पेंटहाउस को संभाल रही थी। ​एक शाम, जब मुंबई के आसमान में काले बादल छाए थे और बालकनी में तेज़ ठंडी हवा चल रही थी, निशा अकेली खड़ी थी। वह अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार शहर की ऊंची इमारतों से टकराकर वापस घर के भीतर टिक जाती थीं। ​मैं कॉफी के दो मग लेकर बालकनी में पहुँचा और एक मग उसकी तरफ बढ़ा दिया। "हवा बहुत तेज़ है... और तुम्हारी सोच भी शायद उसी रफ्तार से भाग रही है।" ​निशा ने धीरे से मग थाम लिया। गर्म कॉफी की भाप उसके चेहरे को छू रही थी। "मामा, मैं जितना इस माहौल को समझने की कोशिश करती हूँ, उतना ही उलझ जाती हूँ। मेरे कॉलेज में, मेरी सहेलियों के बीच... रिश्तों की परिभाषा बहुत सीमित और बंधनों से भरी है। वहाँ सिर्फ शिकायतें हैं, टूटन है। लेकिन यहाँ... यहाँ सब कुछ अजीब होकर भी इतना शांत और स्थिर क्यों लगता है?" ​मैंने बालकनी की रेलिंग का सहारा लेते हुए कहा, "क्योंकि बाहर की दुनिया रिश्तों को समाज की शर्तों पर जीती है, और हमने अपने रिश्तों को अपनी शर्तों पर गढ़ा है। जब इंसान समाज के थोपे हुए मुखौटे उतार फेंकता है, तो सिर्फ सच बचता है। और सच हमेशा स्थिर होता है।" ​निशा ने अपनी पलकें उठाईं। उसकी आँखों में अब वह पहले दिन वाला खौफ नहीं था, बल्कि एक गहरा कौतूहल और समझने की ललक थी। "क्या आपको कभी डर नहीं लगा कि सब कुछ बिखर जाएगा?" ​"डर सिर्फ कमज़ोरियों से पैदा होता है, निशा," मैंने उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा। "जब इरादा किसी को बाँधने का नहीं, बल्कि उसे एक मुकम्मल पनाह देने का हो, तो बिखरने का सवाल ही नहीं उठता। माँ ने भी यही सोचा था, नीरू ने भी यही कशमकश झेली थी... पर आज वे दोनों जानती हैं कि इस छत के बाहर जो कुछ है, वह सिर्फ एक छलावा है।" ​उसी समय नीरू हाथ में गर्म शॉल लिए बालकनी में आई। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के शॉल निशा के कंधों पर डाल दी। "हवा में ठंडक बढ़ गई है, निशा। कॉलेज की पढ़ाई और दुनिया के हिसाब-किताब अपनी जगह हैं, पर अपनी सेहत का ख्याल रखना सबसे पहला नियम है।" ​निशा ने चौंककर नीरू को देखा। उस स्पर्श में मौसी का परायापन नहीं, बल्कि एक बड़ी बहन और इस घर की मालकिन का साधिकार स्नेह था। निशा के होठों पर एक हल्की, अनकही मुस्कान तैर गई। उसकी उन्नीस साल की उम्र का संकोच और पारंपरिक दीवारें अब धीरे-धीरे इस अटूट आत्मीयता के सामने दरकने लगी थीं। वह समझ रही थी कि जिस दुनिया को वह असामान्य मान रही थी, वही दुनिया दरअसल उसके जीवन की सबसे ठोस और सुरक्षित ज़मीन साबित होने वाली थी।

End of Chapter 20