Chapter 1 of 30

लहरों के उस पार

2.8k words

सागरपुर. महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर बसा यह शहर दिन में जितना खूबसूरत दिखाई देता था, रात होते ही उतना ही रहस्यमयी लगने लगता था. शहर के एक ओर ऊँची इमारतें थीं, चमकते हुए बाजार थे, महंगे रेस्तरां थे और समुद्र की तरफ खुलने वाली आलीशान बालकनियाँ थीं. दूसरी ओर छोटी- छोटी गलियाँ थीं, पुराने मकान थे, जंग लगे लोहे के दरवाजे थे और ऐसे घर थे जिनकी दीवारों पर समय ने अपनी कई परतें छोड दी थीं. इन दोनों दुनियाओं के बीच एक ही चीज समान थी. समुद्र. दिन हो या रात, उसकी लहरें बिना रुके किनारे से टकराती रहती थीं. कभी शांत. कभी बेचैन. और कभी इतनी उग्र कि ऐसा लगता, जैसे उसके भीतर कोई बहुत पुरानी शक्ति जागकर करवट ले रही हो. उस रात भी समुद्र शांत नहीं था. आसमान में बादल जमा थे. हवा में नमक की गंध थी. दूर समुद्र के ऊपर बिजली चमकती और कुछ क्षणों के लिए पूरा तट सफेद रोशनी में नहा जाता. फिर सब कुछ दोबारा अंधेरे में डूब जाता. सागरपुर की एक पुरानी बस्ती से थोडी दूर एक संकरी सडक समुद्र की तरफ जाती थी. उस सडक के आखिरी मोड पर एक छोटा- सा घर था. घर बहुत बडा नहीं था. एक छोटा कमरा. उससे जुडा एक दूसरा कमरा. सामने लोहे की पुरानी खिडकी. और बाहर एक छोटा- सा बरामदा. बरामदे में रखी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा एक युवक समुद्र की तरफ देख रहा था. उसका नाम शौर्य था. उम्र कम थी. लेकिन चेहरे पर उम्र से कहीं ज्यादा थकान दिखाई देती थी. वह दोनों हाथों को आपस में बांधकर चुपचाप बैठा था. उसकी नजर सामने नहीं थी. वह समुद्र को देख रहा था, लेकिन शायद उसके भीतर कुछ और चल रहा था. कुछ देर बाद कमरे के अंदर से बर्तनों की हल्की आवाज आई. शौर्य ने सिर घुमाकर देखा. फिर उसकी नजर घडी पर गई. रात के करीब दस बज चुके थे. वह कुर्सी से उठा. धीरे- धीरे कमरे के अंदर गया. छोटे से कमरे में उसकी छोटी बहन अनन्या फर्श पर बैठी अपनी किताबें व्यवस्थित कर रही थी. उसने शौर्य को देखते ही सिर उठाया. भैया, आप फिर बाहर बैठे थे? शौर्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, हाँ। इतनी देर तक? नींद नहीं आ रही थी। अनन्या ने उसकी तरफ कुछ पल देखा. फिर उसने अपनी किताब बंद कर दी. आपको आज भी बहुत देर तक काम करना पडा? शौर्य ने तुरंत जवाब नहीं दिया. वह कमरे के एक कोने में रखे छोटे से स्टूल पर बैठ गया. थोडा। अनन्या ने उसकी आँखों में देखा. वह समझ गई कि जवाब पूरा सच नहीं था. आपने खाना खाया? शौर्य ने मुस्कुराने की कोशिश की. तुमने खाया? अनन्या ने सिर हिलाया. मैंने पूछ लिया था। तो मैंने भी पूछ लिया। भैया। इस बार शौर्य थोडा हँस पडा. ठीक है. नहीं खाया। अनन्या ने तुरंत उठकर रसोई की तरफ कदम बढाए. मैं गरम कर देती हूँ। रहने दो। क्यों? तुम पढाई करो. मैं कर लूँगा। अनन्या ने पलटकर उसकी तरफ देखा. आप हर चीज खुद करने की कोशिश क्यों करते रहते हैं? शौर्य कुछ क्षण चुप रहा. उसके पास इस सवाल का आसान जवाब नहीं था. क्योंकि बचपन से उसने यही सीखा था. पहले माता- पिता चले गए. फिर घर में दादी ही उनका सहारा बनीं. और कुछ साल पहले दादी भी उन्हें छोडकर चली गईं. उसके बाद घर में अगर कोई रिश्ता बचा था, तो वह केवल अनन्या थी. शौर्य के लिए अनन्या सिर्फ उसकी छोटी बहन नहीं थी. वह उसकी जिम्मेदारी थी. उसकी वजह थी. उसके संघर्ष का कारण भी वही थी और उसकी ताकत भी. शौर्य ने धीरे से कहा, तुम्हें बस पढाई पर ध्यान देना है. बाकी सब मैं देख लूँगा। अनन्या ने कुछ नहीं कहा. वह रसोई में चली गई. कुछ ही देर बाद बर्तनों की आवाज फिर सुनाई देने लगी. शौर्य वहीं बैठा रहा. उसकी नजर मेज पर रखे कुछ कागजों पर चली गई. College की फीस. बिजली का बिल. घर का किराया. और एक छोटा- सा कागज जिस पर अगले महीने की फीस की तारीख लिखी थी. शौर्य ने वह कागज उठाया. कुछ देर तक उसे देखता रहा. फिर धीरे से वापस रख दिया. उसकी उंगलियाँ अनजाने में मुट्ठी में बदल गईं. उसे गुस्सा नहीं आया था. उसे बस एक बार फिर वही पुरानी बेबसी महसूस हुई थी. वह मेहनत कर रहा था. सुबह कॉलेज. दोपहर में छोटे- मोटे काम. शाम को डिलीवरी. और रात में जो काम मिल जाए, वह. लेकिन पैसे फिर भी कम पड जाते थे. हर महीने किसी न किसी खर्च को पीछे करना पडता. कभी अपनी जरूरत. कभी घर की. और जब कुछ भी पीछे करने के लिए नहीं बचता, तब शौर्य अपनी नींद कम कर देता. उसे लगता था कि शायद यही तरीका है. थोडा और काम. थोडा और संघर्ष. थोडा और इंतजार. शायद किसी दिन जिंदगी बदल जाएगी. लेकिन उस रात उसे पहली बार लग रहा था कि शायद जिंदगी खुद नहीं बदलती. उसे बदलना पडता है. तभी उसका फोन बजा. शौर्य ने स्क्रीन देखी. एक संदेश था. वह कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखता रहा. फिर संदेश खोला. रिया. नाम देखते ही उसके चेहरे की मुस्कान पूरी तरह गायब हो गई. कुछ समय पहले तक यही नाम उसके चेहरे पर मुस्कान ले आता था. अब वही नाम उसके भीतर एक अजीब- सी बेचैनी पैदा करता था. संदेश छोटा था. हमें बात करनी है। शौर्य ने कई सेकंड तक कोई जवाब नहीं दिया. उसने फोन नीचे रख दिया. फिर उठाया. फिर दोबारा रख दिया. आखिर उसने केवल इतना लिखा. कब? कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया. फिर स्क्रीन पर एक और संदेश आया. कल। शौर्य ने फोन बंद कर दिया. उसने अनन्या की तरफ देखा. वह अभी भी रसोई में थी. शौर्य ने कुछ नहीं बताया. उस रात उसने खाना खाया. अनन्या ने भी उसके साथ बैठकर थोडा खाना खाया. दोनों के बीच सामान्य बातें हुईं. कॉलेज. पढाई. अगले सप्ताह की परीक्षा. घर के कुछ छोटे खर्च. लेकिन रिया का नाम नहीं आया. शौर्य ने भी नहीं पूछा. वह जानता था कि अगले दिन क्या होने वाला है. बस वह यह नहीं जानता था कि वह बातचीत उसके जीवन का आखिरी सामान्य दिन साबित होने वाली है. अगली सुबह सागरपुर पर हल्की धूप थी. रात के बाद बादल कुछ छंट गए थे. समुद्र पहले की तुलना में शांत था. शौर्य सुबह जल्दी उठ गया. उसने चाय बनाई. अनन्या के लिए नाश्ता तैयार किया. फिर दोनों college के लिए निकल गए. सडक पर हमेशा की तरह भीड थी. कुछ लोग काम पर जा रहे थे. कुछ दुकानें खोल रहे थे. कुछ मछुआरे रात की पकड लेकर बाजार की तरफ जा रहे थे. शौर्य की नजर उन मछुआरों पर कुछ पल के लिए ठहर गई. समुद्र से लौटे लोगों के चेहरों पर थकान थी. लेकिन उनके कदमों में एक अलग तरह का आत्मविश्वास था. वे समुद्र को जानते थे. उसकी लहरों को. उसकी चाल को. उसके बदलते स्वभाव को. शौर्य ने कई बार सोचा था कि समुद्र के साथ काम करना शायद अच्छा रहेगा. लेकिन उसके पास न नाव थी. न पैसा. न कोई बडा संपर्क. इसलिए वह केवल किनारे से समुद्र को देख सकता था. College पहुँचने के बाद अनन्या अपनी कक्षा की तरफ चली गई. शौर्य दूसरी तरफ बढ गया. उसका ध्यान पढाई पर होना चाहिए था. लेकिन उसका मन बार- बार फोन की तरफ जा रहा था. रिया से उसकी मुलाकात दोपहर में तय थी. दोपहर करीब एक बजे वह college के पीछे बने पुराने कैफेटेरिया में पहुँचा. रिया पहले से वहाँ बैठी थी. शौर्य कुछ कदम दूर रुक गया. उसने उसे देखा. रिया पहले जैसी ही लग रही थी. लेकिन आज उसके चेहरे पर वह अपनापन नहीं था, जो कभी शौर्य को दिखाई देता था. शौर्य धीरे से उसके सामने जाकर बैठ गया. बहुत देर से बैठी हो? रिया ने सिर हिलाया. नहीं। दोनों कुछ क्षण चुप रहे. आसपास कई छात्र बातें कर रहे थे. किसी की हँसी सुनाई दे रही थी. किसी मेज पर चाय के कप रखे जा रहे थे. लेकिन शौर्य को ऐसा लग रहा था जैसे उसके आसपास की सारी आवाजें धीरे- धीरे दूर जा रही हों. रिया ने आखिरकार कहा, शौर्य, मुझे तुमसे कुछ कहना है। शौर्य ने उसकी तरफ देखा. कहो। रिया ने अपनी नजरें नीचे कर लीं. हमारा रिश्ता. वह रुक गई. शौर्य ने इंतजार किया. कुछ सेकंड. फिर कुछ और सेकंड. हमारा रिश्ता अब पहले जैसा नहीं रहा। शौर्य ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. रिया ने आगे कहा, तुम जानते हो कि मैं तुम्हारी परिस्थितियों को समझती हूँ। शौर्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, समझती हो? रिया ने उसकी तरफ देखा. हाँ। तो फिर? रिया कुछ पल चुप रही. मुझे अपने भविष्य के बारे में सोचना है। शौर्य की मुस्कान धीरे- धीरे गायब हो गई. और? रिया ने गहरी सांस ली. मैंने किसी और के साथ आगे बढने का फैसला किया है। शौर्य बिल्कुल शांत बैठा रहा. जैसे उसने कुछ सुना ही न हो. उसने आसपास देखा. एक लडका सामने वाली मेज पर बैठकर हँस रहा था. एक लडकी फोन पर बात कर रही थी. वेटर किसी टेबल पर चाय रख रहा था. सब कुछ सामान्य था. सिर्फ उसकी दुनिया सामान्य नहीं थी. शौर्य ने धीरे से पूछा, कौन है? रिया ने जवाब दिया, तुम उसे जानते हो। शौर्य ने कुछ नहीं कहा. रिया ने नाम बताया. शहर के एक बडे व्यापारी का बेटा. पैसे वाला. अपना कारोबार. अपनी कार. अपना घर. शौर्य ने सिर झुका लिया. उसे अचानक अपने कपडों का एहसास हुआ. सस्ती शर्ट. पुराने जूते. घिसी हुई घडी. उसने पहली बार नहीं देखा था कि वह गरीब है. लेकिन पहली बार उसे लगा कि कोई और भी उसकी गरीबी को उसके सामने रखकर उसे माप रहा है. रिया ने धीरे से कहा, शौर्य, तुम बुरे इंसान नहीं हो। वह वाक्य शौर्य के भीतर कहीं गहराई तक उतर गया. क्योंकि लोग अक्सर यही कहते हैं जब वे किसी रिश्ते को खत्म करना चाहते हैं. तुम अच्छे हो. तुम बुरे नहीं हो. लेकिन. शौर्य ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा, ठीक है। रिया ने उसकी तरफ देखा. बस? और क्या कहूँ? रिया चुप रही. शौर्य ने कुर्सी पीछे खिसकाई. वह उठने लगा. रिया ने धीमे स्वर में कहा, शौर्य। वह रुक गया. लेकिन पीछे नहीं मुडा. हाँ? मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम समझोगे। शौर्य ने कुछ क्षण आँखें बंद रखीं. फिर कहा, मैं समझ गया। और वह वहाँ से चला गया. बाहर धूप पहले से तेज थी. शौर्य सडक पर चलता रहा. उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जा रहा है. उसके कदम अपने आप बढ रहे थे. College की मुख्य इमारत पीछे छूट गई. सडक खत्म हुई. फिर एक छोटी गली आई. वह गली भी पीछे छूट गई. आखिरकार उसके सामने समुद्र था. शौर्य रुक गया. वह कुछ देर तक पानी को देखता रहा. लहरें किनारे से टकरा रही थीं. एक. फिर दूसरी. फिर तीसरी. हर लहर आती. टूटती. और वापस चली जाती. शौर्य ने धीरे से कहा, शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने सोचा था मेहनत काफी होती है। हवा ने उसके शब्द अपने साथ उडा दिए. समुद्र ने कोई जवाब नहीं दिया. शौर्य वहीं खडा रहा. उस दिन पहली बार उसके भीतर एक सवाल पैदा हुआ. अगर मेहनत करने के बाद भी जिंदगी नहीं बदलती, तो फिर उसे बदलने के लिए करना क्या होगा? उसे उस सवाल का जवाब नहीं मिला. लेकिन समुद्र की तरफ देखते हुए उसे एक अजीब- सी अनुभूति हुई. बहुत हल्की. इतनी हल्की कि वह उसे महसूस करके भी अनदेखा कर सकता था. जैसे समुद्र की गहराई से किसी ने उसका नाम पुकारा हो. शौर्य ने तुरंत पीछे देखा. वहाँ कोई नहीं था. उसने फिर समुद्र की तरफ देखा. सब कुछ सामान्य था. दूर कुछ नावें थीं. लहरें थीं. हवा थी. और आसमान में धीरे- धीरे फिर से बादल जमा होने लगे थे. शौर्य ने कुछ क्षण और वहाँ खडे रहने के बाद घर की तरफ लौटने का फैसला किया. उसे नहीं पता था कि कुछ ही घंटों बाद वही समुद्र उसके सामने एक ऐसा दरवाजा खोलने वाला था, जिसके बारे में सागरपुर की किसी किताब में नहीं लिखा था. और उसे यह भी नहीं पता था कि उस दरवाजे के दूसरी तरफ उसकी पूरी जिंदगी उसका इंतजार कर रही थी. शाम होते- होते मौसम बदल गया. हवा तेज होने लगी. अनन्या घर पर थी. शौर्य ने दरवाजा खोला तो उसने तुरंत उसकी तरफ देखा. भैया? शौर्य ने सामान्य रहने की कोशिश की. हाँ? आज आप बहुत चुप हैं। थका हुआ हूँ। अनन्या कुछ कहने वाली थी, लेकिन रुक गई. वह अपने भाई को बचपन से जानती थी. वह उसकी आवाज से भी समझ सकती थी कि उसके भीतर क्या चल रहा है. लेकिन उसने उस समय कुछ नहीं पूछा. शायद इसलिए कि उसे लगा, जब शौर्य तैयार होगा, तब खुद बताएगा. रात करीब नौ बजे बिजली चली गई. पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया. बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी. पहले बूंदें हल्की थीं. फिर धीरे- धीरे तेज होती गईं. शौर्य खिडकी के पास खडा होकर बारिश देखने लगा. अनन्या मोमबत्ती की रोशनी में पढ रही थी. कुछ देर बाद शौर्य ने कहा, अनन्या। जी? अगर कभी. वह रुक गया. अनन्या ने किताब से नजर उठाई. क्या? शौर्य ने सिर हिलाया. कुछ नहीं। अनन्या ने उसे कुछ क्षण देखा. फिर दोबारा किताब खोल ली. शौर्य खिडकी के पास ही खडा रहा. बाहर समुद्र दिखाई नहीं दे रहा था. लेकिन उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी. हर कुछ सेकंड में एक भारी लहर की आवाज आती. फिर कुछ क्षण की शांति. फिर दूसरी लहर. शौर्य को अचानक दोपहर की बात याद आई. रिया. उसकी आवाज. उसका फैसला. उसके बाद समुद्र के किनारे खडे होकर उसके भीतर उठी बेचैनी. उसने आँखें बंद कर लीं. उसी समय दूर कहीं बिजली चमकी. एक पल के लिए पूरा आकाश चमक उठा. और उस रोशनी में शौर्य ने समुद्र की दिशा में कुछ देखा. बहुत दूर. बहुत छोटा. जैसे पानी के ऊपर कोई हल्की नीली रोशनी तैर रही हो. उसने आँखें खोलीं. रोशनी गायब थी. शौर्य कुछ क्षण वहीं खडा रहा. फिर उसने खुद से कहा, शायद बिजली की चमक थी। वह मुडा. लेकिन तभी फिर वही नीली चमक दिखाई दी. इस बार कुछ ज्यादा स्पष्ट. शौर्य की नजरें उस पर टिक गईं. नीली रोशनी समुद्र की सतह पर नहीं थी. वह जैसे पानी के भीतर से आ रही थी. एक पल. फिर अंधेरा. फिर चमक. शौर्य का दिल तेज धडकने लगा. वह बरामदे में आया. बारिश अब बहुत तेज हो चुकी थी. अनन्या ने पीछे से आवाज दी, भैया, बाहर मत जाइए. बहुत बारिश हो रही है। शौर्य ने जवाब दिया, बस देख रहा हूँ। लेकिन इस बार उसकी नजर समुद्र से हट नहीं रही थी. वह नीली रोशनी धीरे- धीरे किनारे से दूर जा रही थी. जैसे किसी अदृश्य धारा के साथ समुद्र की गहराई में उतर रही हो. शौर्य ने एक कदम आगे बढाया. फिर दूसरा. बरामदे से नीचे उतरते हुए बारिश उसके चेहरे पर पडने लगी. उसने पीछे मुडकर घर की तरफ देखा. अनन्या दरवाजे पर खडी थी. भैया? शौर्य ने कहा, मैं थोडी देर में आता हूँ। कहाँ जा रहे हैं? शौर्य ने कोई जवाब नहीं दिया. वह आगे बढ गया. उसके कदम समुद्र की तरफ जा रहे थे. हर कदम के साथ बारिश तेज होती जा रही थी. हवा उसके कपडों को पीछे खींच रही थी. लेकिन उसके सामने अब सिर्फ एक चीज थी. वह नीली रोशनी. जो धीरे- धीरे समुद्र की ओर बढ रही थी. शौर्य को नहीं पता था कि वह Kiss चीज का पीछा कर रहा है. उसे यह भी नहीं पता था कि उसे रुक जाना चाहिए या नहीं. लेकिन उसके भीतर कोई चीज उसे आगे बढने के लिए कह रही थी. वह समुद्र के किनारे पहुँच गया. लहर उसके पैरों से टकराई. ठंडा पानी उसके टखनों तक आया. शौर्य वहीं रुक गया. सामने समुद्र था. अंधेरा. गहरा. और अंतहीन. फिर अचानक उसके सामने पानी के भीतर से वही नीली रोशनी उभरी. इस बार इतनी करीब कि शौर्य उसके भीतर कुछ देख सकता था. एक चमकता हुआ आकार. जैसे किसी प्राचीन कमल की आकृति. शौर्य की साँस रुक गई. उसने एक कदम पीछे हटना चाहा. लेकिन तभी समुद्र की एक विशाल लहर उसकी तरफ बढी. शौर्य संभल पाता, उससे पहले लहर उससे टकराई. उसका संतुलन बिगड गया. और अगले ही क्षण उसका शरीर समुद्र के भीतर जा चुका था. पानी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया. उसने ऊपर आने की कोशिश की. लेकिन तेज धार ने उसे नीचे खींच लिया. उसने हाथ- पैर चलाए. उसकी आँखों के सामने अंधेरा फैल गया. फिर उसी अंधेरे में एक नीली रोशनी दिखाई दी. वही रोशनी. वही कमल. और उसके भीतर से जैसे किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा. उत्तराधिकारी. शौर्य ने आँखें खोलने की कोशिश की. लेकिन इस बार समुद्र की गहराई में उसके सामने सिर्फ अंधेरा नहीं था. वहाँ एक ऐसी दुनिया थी, जिसका अस्तित्व उसकी पूरी जिंदगी से छिपा हुआ था. और उस दुनिया के दरवाजे पर अब उसका इंतजार कोई और नहीं कर रहा था. वह खुद वहाँ पहुँच चुका था.

End of Chapter 1

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